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क्यों श्रेष्ठतम है संस्कृत?

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संस्कृत भारत की एक शास्त्रीय भाषा है। यह दुनिया की सबसे पुरानी उल्लिखित भाषाओं में से एक है। संस्कृत को श्रेष्ठतम कहने के बहुत से कारण है, जैसे सर्वश्रेष्ठ व्याकरण, त्रुटिहीन व्याकरण, सरल एवं वैज्ञानिक, और प्राचीनता| यहाँ पर संस्कृत की कुछ विशेषताओ को बताना चाहता हूँ जो कि इसे एक विशिष्ट स्थान प्रदान करते है|

संस्कृत हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की हिन्द-ईरानी शाखा की हिन्द-आर्य उपशाखा में शामिल है। लेकिन कुछ विद्वान इसे ग्रीक और लैटिन के साथ रखने पर आपत्ति करते है| आपत्ति भी ध्यान देने योग्य है| यह एक स्थापित तथ्य है कि इन प्राचीन भाषाओं मे संस्कृत के अपभ्रंश मिलते है| निश्चित रूप से संस्कृत इन भाषाओ से पुरानी होनी चाहिये| इस प्रकार संस्कृत सबसे प्राचीन भाषा है| ये आदिम-हिन्द-यूरोपीय भाषा से बहुत ज़्यादा मेल खाती है। आधुनिक भारतीय भाषाएँ जैसे हिन्दी, उर्दू, कश्मीरी, उड़िया, बांग्ला, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, नेपाली, असमी आदि इसी से उत्पन्न हुई हैं। इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है।

संस्कृत में हिन्दू धर्म के लगभग सभी धर्मग्रन्थ लिखे हुए हैं। आज भी हिन्दू धर्म के ज़्यादातर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही होती हैं। संस्कृत का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है जो हिन्दू धर्म की प्रमुख किताब वेद की भाषा है। अधिकांश लोग पाणिनि की अष्टाध्यायी से काव्य संस्कृत की शुरुआत मानते हैं। रामायण, महाभारत और पुराण, काव्य संस्कृत में लिखे गये हैं।

संस्कृत शब्द दो शब्दों “सम्” (अर्थात्, सम्पूर्ण) और “कृतम्” (अर्थात्, किया गया) से मिलकर बना है| इस शब्द का अर्थ होता है- सम्पूर्ण, त्रुटिहीन| संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। बहुत प्राचीन काल से ही अनेक व्याकरणाचार्यों ने संस्कृत व्याकरण पर बहुत कुछ लिखा है। किन्तु पाणिनि का संस्कृत व्याकरण पर किया गया कार्य सबसे प्रसिद्ध है। उनका अष्टाध्यायी किसी भी भाषा के व्याकरण का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।

ध्वनि-तन्त्र और लिपि

संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन विशेष रूप से यह देवनागरी मे लिखी जाती रही है|। देवनागरी शब्द वस्तुतः “देवनाम गरिही” से व्युत्पन्न हुआ है और इसका अर्थ है “देवों की भाषा”| देवनागरी लिपि असल में संस्कृत के लिये ही बनी है, इसलिये इसमें हरेक चिह्न के लिये एक और सिर्फ़ एक ही ध्वनि है। देवनागरी में 16 (10+6) स्वर और 34 व्यंजन हैं। देवनागरी से रोमन लिपि में लिप्यन्तरण के लिये दो पद्धतियाँ अधिक प्रचलित हैं : IAST और ITRANS. शून्य, एक या अधिक व्यंजनों और एक स्वर के मेल से एक अक्षर बनता है।

स्वर

ये स्वर संस्कृत के लिये दिये गये हैं। हिन्दी में इनके उच्चारण थोड़े अलग होते हैं।

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संस्कृत में ऐ दो स्वरों का युग्म होता है और “अ-इ” या “आ-इ” की तरह बोला जाता है। इसी तरह औ “अ-उ” या “आ-उ” की तरह बोला जाता है।
इसके अलावा हिन्दी और संस्कृत में ये वर्णाक्षर भी स्वर माने जाते हैं :
•    ऋ — आधुनिक हिन्दी में “रि” की तरह, संस्कृत में American English syllabic / r / की तरह
•    ॠ — केवल संस्कृत में (दीर्घ ऋ)
•    ऌ — केवल संस्कृत में (syllabic retroflex l)
•    ॡ — केवल संस्कृत में (दीर्घ ऌ)
•    अं — आधे न्, म्, ङ्, ञ्, ण् के लिये या स्वर का नासिकीकरण करने के लिये
•    अँ — स्वर का नासिकीकरण करने के लिये (संस्कृत में नहीं उपयुक्त होता)
•    अः — अघोष “ह्” (निःश्वास) के लिये

व्यंजन

जब किसी स्वर प्रयोग नहीं हो, तो वहाँ पर ‘अ’ माना जाता है । स्वर के न होने को हलन्त्‌ अथवा विराम से दर्शाया जाता है । जैसे कि क्‌ ख्‌ ग्‌ घ्‌ ।

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नोट करें :
•    इनमें से ळ (मूर्धन्य पार्विक अन्तस्थ) एक अतिरिक्त वयंजन है जिसका प्रयोग हिन्दी में नहीं होता है। मराठी और वैदिक संस्कृत में इसका प्रयोग किया जाता है।
•    संस्कृत में ष का उच्चारण ऐसे होता था : जीभ की नोक को मूर्धा (मुँह की छत) की ओर उठाकर श जैसी आवाज़ करना। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनि शाखा में कुछ वाक़्यात में ष का उच्चारण ख की तरह करना मान्य था। आधुनिक हिन्दी में ष का उच्चारण पूरी तरह श की तरह होता है।
•    हिन्दी में ण का उच्चारण ज़्यादातर ड़ँ की तरह होता है, यानि कि जीभ मुँह की छत को एक ज़ोरदार ठोकर मारती है। हिन्दी में क्षणिक और क्शड़िंक में कोई फ़र्क नहीं । पर संस्कृत में ण का उच्चारण न की तरह बिना ठोकर मारे होता था, फ़र्क सिर्फ़ इतना कि जीभ ण के समय मुँह की छत को कोमलता से छूती है।

संस्कृत भाषा की विशेषताएं-

1- अक्षरों का स्वर-व्यंजन उच्चारण-

यह सबसे विशिष्ट बात है संस्कृत की, कि इसमें कोई भी व्यंजन तभी पूर्ण अक्षर बनता है, जबकि उसे किसी स्वर से मिलाया जाता है| 16 स्वर, वस्तुतः विभिन्न ध्वनियो के नमूने (‘voice pattern’) है और 34  व्यंजन इन ध्वनियों के प्रकार (‘form’ of the ‘voice pattern’ of the sound)| अतः एक व्यंजन (जैसे – क्, ख्, ट्, इत्यादि) अकेले उच्चारित नहीं किया जा सकता| लेकिन स्वरो का स्वतंत्र उच्चारण किया जा सकता है|
इस व्यवस्था को विश्व की अन्य भाषा मे नही पाया जाता है| इसलिये उन भाषाओ के अक्षरो के उच्चारण मे समानता नही दिखती| जैसे come (कम) और coma(कोमा) मे ‘co’ के दो भिन्न उच्चारण देखने को मिलते है| अंग्रेजी मे इस प्रकार के अनेक उदाहरण मिलते है|
ग्रीक भाषा ने संस्कृत के पाँच स्वरो को ग्रहण किया, और कुछ दैनिक प्रयोग के अपभ्रंश शब्दो और संख्याओ को भी| जैसे-त्रय (trias) और पंच (pente)| यह शब्द उनके पास भारत और ग्रीस के मध्य व्यापार के समय व्यापारियो के मध्य संवाद के द्वारा पहुँचे| बाद मे अंग्रेजी का जन्म हुआ| लेकिन अभी भी इन भाषाओ मे स्वरो की संख्या बहुत कम है| यही कारण है कि एक ही स्वर का कई प्रकार से प्रयोग किया जाता है|

2- संस्कृत शब्दो का निर्माण-

संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग्, और सन्धियो की सहायता से नये शब्दो का निर्माण भी सरल है| संस्कृत मे शब्दो का निर्माण पूर्णतः वैज्ञानिक तरीके किया जाता है| संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द-रूप बनाये जाते हैं, जो व्याकरणिक अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूलशब्द के अन्त में प्रत्यय लगाकर बनाये जाते हैं। शब्दो के आरम्भ मे उपसर्ग लगाकर भी नये शब्द बनाये जा सकते है|  विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 शब्द-रूप होते हैं। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।  संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। इस तरह ये कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अन्त-श्लिष्टयोगात्मक भाषा है। संस्कृत के व्याकरण को वागीश शास्त्री ने वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है।

3- विराट् शब्दावली-

संस्कृत की शब्दावली सबसे विराट् है| किसी अन्य भाषा मे इतनी बडी शब्दावली नही मिलती| यहाँ तक कि संसार की लगभग सभी प्रमुख भाषाओ मे संस्कृत से लिये गये शब्द मिलते है| उनके अपने शब्दकोश भी संस्कृत के शब्दो के बिना अधूरे है| अंग्रेजी मे बहुत से शब्द संस्कृत से लिये गये है, यह तथ्य तो आज सभी जानते है|
इसके अलावा, संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग्, और सन्धियो की सहायता से नये शब्दो का निर्माण भी सरल है|

4- व्याकरण-

इसके सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है। प्राचीन काल हो या आधुनिक काल, उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, संस्कृत का व्याकरण अपरिवर्तित रहा है| यजुर्वेद का एक उदाहरण लीजिये-
ताँस्ते प्रेताभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ||(ई.)
यहाँ एक संज्ञा है- जनः, और एक क्रिया है- गच्छन्ति जो कि गम् धातु से बना है| गम् धातु के सभी 90 रूप और, जन् संज्ञा के सभी 21 रूप बिना किसी परिवर्तन के, एक ही प्रकार से, वेदो मे, पुराणो मे और अन्य संस्कृत साहित्यो मे किया गया है| ध्यान देने योग्य बात है कि ये सभी ग्रन्थ अलग अलग समय मे अलग अलग लेखको द्वारा लिखे गये है| अन्य भाषाओ का रूप समय के साथ बदलता जाता है|

5- प्राचीनता

वैदिक संस्कृत का परिष्कृत रूप हजारो वर्ष पहले से विद्यमान है, यहाँ तक कि ग्रीक, लैटिन, और हीब्रू के आरम्भिक विकास से भी बहुत पहले|  वेद संसार के पहले साहित्य है, यह अब एक निर्विवाद तथ्य है| संस्कृत दुनिया की पहली पुस्तक की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं कोई संशय की गुंजाइश नहीं हैं।

6- प्रचुर साहित्य-

सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी हाने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है। यद्यपि संस्कृत आधुनिक विश्व मे उतनी प्रचलित नही है जितनी कि इसे होना चाहिये, फिर भी इस भाषा मे पर्याप्त साहित्य प्राचीनकाल से ही वर्तमान है| चारो वेदो की भाषा तो संस्कृत है ही, अठ्ठारह पुराण और 108 उपनिषद भी इसी संस्कारित भाषा मे लिखे गये है| श्रीमदभागवद्गीता, रामायण, महाभारत भी संस्कृत मे लिखे है| महाभारत को तो संसार का सबसे बडा महाकाव्य माना जाता है|

7- संस्कारित भाषा-

संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं वल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं वल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है ।

8- सरल भाषा-

संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे – अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।

9- त्रुटिहीन भाषा-

इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।  संस्कृत व्याकरण तर्कशास्त्र पर पूरी तरह से खरी उतरती है, और मशीनो की भाषा के लिये पूरी तरह से उपयुक्त है| 1985 मे Rick Briggs ने अपने एक लेख “Knowledge Representation in Sanskrit and Artificial Intelligence” मे इस प्रकार के विचार प्रस्तुत किये| Forbes magazine, (July, 1987) के अनुसार “Sanskrit is the most convenient language for computer software programming.” [ref - http://www.stephen-knapp.com/indian_contributions_to_american_progress.htm]

10- मष्तिष्क विकास

आधुनिक शोधो मे पाया गया है कि संस्कृत के अध्ययन से मानसिक दृढता और स्मरणशक्ति का विकास होता है और यह सर्वश्रेष्ठ अल्जाइमर-प्रतिरोधी दवाओ (anti-Alzeimer drugs) मे से एक है| [ref-http://www.galendobbs.com/theck/sanskrit.html]

भारत और विश्व के लिए संस्कृत का महत्त्व

•    संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की माता है। इनकी अधिकांश शब्दावली या तो संस्कृत से ली गयी है या संस्कृत से प्रभावित है। पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक एकरूपता आयेगी जिससे भारतीय एकता बलवती होगी। यदि इच्छा-शक्ति हो तो संस्कृत को हिब्रू की भाँति पुनः प्रचलित भाषा भी बनाया जा सकता है।
•    हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में हैं।
•    हिन्दुओं के सभी पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कार की भाषा संस्कृत ही है।
•    हिन्दुओं, बौद्धों और जैनों के नाम भी संस्कृत पर आधारित होते हैं।
•    भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली भी संस्कृत से ही व्युत्पन्न की जाती है।
•    संस्कृत, भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है। भारत की लगभग सभी भाषाएं संस्कृत से ही उत्पन्न हुई है|
•    संस्कृत का प्राचीन साहित्य अत्यन्त प्राचीन, विशाल और विविधतापूर्ण है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, और साहित्य का खजाना है। इसके अध्ययन से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति को बढावा मिलेगा। संस्कृत को कम्प्यूटर के लिये (कृत्रिम बुद्धि के लिये) सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।

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4 Responses to “क्यों श्रेष्ठतम है संस्कृत?”

  1. मनोज says:

    संस्कृत के हजारों शब्द ग्रीक और लेटिन ने लिए हैं उनमें थोड़ा फेर-बदल कर उसे अंग्रेजी में लिया गया है.
    ग्रीक-लैटिन की वाक्य संचरना भी संस्कृत जैसी है

    reads- पठति- पढ़ता है
    goes- गच्छति- जाता है

    हिंदी को सरल करने की सहज प्रवृति इसे संस्कृति से दूर ले जा रही है, जो इस भाषा के लिए घातक साबित होगा.

  2. thats y we r demanding it should be national languages. so that everyone can read the VEDAS

  3. Raj says:

    बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख|

  4. बहुत ही सारगर्भित आलेख |

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