जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने…..
मनोज कुमार की प्रसिद्ध फिल्म (चलचित्र) का यह गीत तो सभी ने सुना होगा| भारत के गौरवगाथा को कहता यह गीत सबसे पहले ज़ीरो की महत्ता बताता है| अब यह तो सभी मानते है कि ज़ीरो (शून्य) भारत ने ही संसार को दिया| परन्तु कब? शून्य का अविष्कार कब हुआ था? कैसे इसका प्रचार सारे संसार मे हुआ? क्या केवल भारतीय ही थे जिन्हे रिक्त को व्यक्त करने का विचार सूझा? आइये कुछ चर्चा करें इस बात पर|

शून्य का प्रयोग दो तरीको से किया जाता है| प्रथमतः यह एक संख्या है जो कि “कुछ नहीं” को प्रदर्शित करती है| यदि आपके पास 5 रुपये है और वह आपने मुझे दे दिये तो आपके पास कितने रुपये बचे? कुछ नही| गणित की भाषा मे इसे शून्य कहा जाता है| शून्य का दूसरा प्रयोग दाशमिक स्थानमान संख्या पद्धति मे खाली स्थान को दिखाने के लिये किया जाता है| उदाहरण के लिये एक संख्या 304 को देखते है| इकाई स्थान पर 4 है, और सैकड़ा के स्थान पर 3 है, परन्तु दहाई के स्थान पर कुछ नही है| 304 को हम 3X10X10+0X10+4 भी लिख सकते है| अतः हम कह सकते है कि शून्य को दाशमिक आधार दिखाने के लिये प्रयोग किया जाता है|
अब आते है इतिहास पर| अंग्रेजी मे शून्य को ज़ीरो (zero) कहते है, जो कि अरबी शब्द शिफ्र से आया है| शून्य का इतिहास कुछ ऐसा नहीं है कि किसी को इसका विचार आया और फिर सभी उसका प्रयोग करने लगे| इसका इतिहास बहुत ही अस्पष्ट और विस्तृत है| प्रथम विचार भारतीय धर्म-ग्रन्थो मे मिलता है, जहाँ बताया गया है कि सृष्टि की रचना शून्य से हुई है| परन्तु यह इसका आध्यात्मिक रूप है, गणितीय नही| ऐसा भी नही है कि पहले स्थानमान संख्या पद्धति अस्तित्व मे आया फिर शून्य| क्योकि स्थानमान संख्या पद्धति का अस्तित्व तो बिना शून्य के भी विभिन्न रूपो मे था|
सबसे पहले स्थानमान संख्या-पद्धति का आविष्कार लगभग 3100 BC मे बेबीलोन मे माना जाता है| बेबीलोन मे आधार-60 (sexagesimal) वाली एक संख्या पद्धति विकसित थी| आरम्भ मे 60 से उपर की संख्याओ के लिये इसमे कुछ समस्यायें थी| आधार-60 प्रदर्शित करने के लिये कोई चिन्ह नही था, अतः 23, 23X60, 23X60X60, इत्यादि संख्यायें एक ही प्रतीत होती थी| लगभग 400 BC के आसपास बेबीलोन के विद्वानो ने इसके लिये एक चिन्ह का उपयोग करना आरम्भ किया| लगभग 700 BC मे मेसोपोटामिया मे भी इस रिक्त स्थान को दिखाने के लिये चिन्ह का प्रयोग किया जाता था| बेबीलोन की यह आधार-60 वाली संख्या पद्धति का उपयोग आज भी किया जाता है, कोण के माप मे| एक अंश को o से, 1/60 अंश को ” से तथा (1/60)” को ‘ से प्रदर्शित करते है|

लगभग इसी समय ग्रीक विद्वानो ने भी खाली स्थान को एक संकेत से दिखाना आरम्भ किया, परन्तु उन्होने बेबीलोन कि स्थानमान संख्या पद्धति को नही लिया, क्योंकि उनका मुख्य ध्यान संख्या पद्धति पर नही बल्कि ज्यामिति पर था| ग्रीक विद्वानो ने शून्य के लिये जिस चिन्ह का प्रयोग किया वह था “O” | यह संकेत कहाँ से लिया गया, इसके बारे मे अलग-अलग मत है| कुछ का कहना है कि यह ग्रीक शब्द “ouden” (जिसका अर्थ होता है “कुछ नही”) का पहला अक्षर “omicron” है, और कुछ का कहना है कि यह लगभग शून्य मूल्य वाले सिक्के “obol” के लिये है| ऐसे भी संकेत मिलते है कि ग्रीक दार्शनिक शून्य की स्थिति के बारे मे भ्रमित थे| वह स्वयं से पूछते थे “कैसे कुछ नहीं कुछ हो सकता है?”|
दक्षिण-मध्य मैक्सिको और मध्य अमेरिका मे विकसित मेसोमेरिकन कैलेन्डर मे भी शून्य का प्रयोग किया गया था| इसमे आधार-20 (vigesimal) माया संख्या पद्धति का प्रयोग किया गया था| हालांकि इस पद्धति का उदगम स्थल कहाँ है, यह अभी विवाद का विषय है|

भारतीय गणित मे 400 BCE के आसपास गणनाओं के लिये एक गणना पटल का प्रयोग किया जाता था| इसमे भी शून्य के उपयोग के प्रमाण मिलते है| चीन मे 400BC से गणना के लिये दण्डो (counting rods) का प्रयोग किया जाता था| चीनी गणित मे शून्य के साथ-साथ ऋणात्मक संख्याओ के भी प्रमाण मिलते है, परन्तु शून्य के लिये वे किसी चिन्ह का प्रयोग नही करते थे| 13वीं
शताब्दी मे चीनी विद्वानो ने शून्य के लिये “O” का प्रयोग शुरु किया| कुछ विद्वानो का मत है यह चिन्ह भारत से 718 AD मे एक विद्वान गौतम सिद्ध (Chinese: Qútán Xīdá, fl. 8th century) द्वारा चीन मे पहुँचा| यह ध्यान देने की बात है कि चीनी संख्या पद्धति भी दाशमिक संख्या पद्धति थी, परन्तु उतनी परिष्कृत नही जितनी भारतीय संख्या पद्धति|
रोमन
अंको मे शून्य के लिये किसी चिन्ह का नही बल्कि एक शब्द null (जिसका अर्थ “कुछ नहीं” होता है) का प्रयोग करते थे|
भारत मे इसका इतिहास बहुत प्राचीन है| जैसा कि ऊपर बताया गया है, भारतीय धर्म-ग्रन्थो मे लिखा मिलता है कि सृष्टि की रचना शून्य से हुई है| जैसा कि श्री मुखर्जी (Discovery of Zero and its impact on India के लेखक) कहते है-
… the mathematical conception of zero … was also present in the spiritual form from 17 000 years back in India.
हड्प्पा की सभ्यता मे भी दाशमिक पद्धति के संकेत मिले है| हड़प्पा मे प्राप्त वस्तुओं के भारो के अनुपात 0.05, 0.1, 0.2, 0.5, 1, 2, 5, 10, 20, 50, 100, 200, और 50 मिले है, यह सभी दाशमिक भाज्य है|
शून्य का वर्तमान रूप भारत द्वारा दिया गया है| हालांकि चीनी भी दाशमिक आधार वाले संख्या पद्धति का प्रयोग कर रहे थे, उनकी पद्धति मे बहुत कमियां थी| यह भारतीय संख्या पद्धति है जो कि अरब के रास्ते पश्चिम मे पहुँची और आज वैश्विक रूप से स्वीकार की गयी है| प्रसिद्ध फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास के शब्दो मे- “प्रत्येक संभव संख्या को केवल दस प्रतीको के समूह से दर्शाने (प्रत्येक प्रतीक का एक स्थानीय मान तथा एक निरपेक्ष मान होता है) की सरल विधि भारत मे विकसित हुई| देखने मे यह विचार इतना सरल लगता है कि आज इसके महत्व की सराहना नही की जा रही है| इसकी सरलता इस बात मे है कि इसके कारण गणनाये सरल हो गयी और अंकगणित आविष्कारो मे अग्रणी हो गया|”
जहाँ पश्चिम मे बोझिल रोमन अंक प्रणाली मे संख्याओ की अधिकता एक प्रमुख बाधा के रूप में सामने थी, वहीं चीन के सचित्र संख्याओं की जटिलता एक अन्य बाधा थी| परन्तु भारत की संख्या पद्धति मे सब कुछ व्यवस्थित और सरल था| शून्य के व्यापक उपयोग के साथ दाशमिक संख्या पद्धति ने वैज्ञानिक प्रगति मे बहुत बड़ा योगदान दिया|
भारत मे किन-किन गणितज्ञो ने शून्य के विकास मे योगदान दिया तथा यह संसार मे किस प्रकार फैली, इसकी चर्चा हम इस लेख के अगले अंक मे करेंगे| अपने विचारो से हमे अवश्य अवगत करायें|
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Bahut badiya jaankari….
Bahut hi sarthak lekh,
acchi jankaari di aapne..
yah pryas srvatha bahut sundar hai
humari sanskriti aur sabhyata ke liye isi tarh ke pryas kiye jane cahiye
charcha ke samst sadsy iske liye bdhai ke patr hai
awesome post…
बहुत सुन्दर प्रयास। बधाई।
आपका ब्लोग पहली बार देखा बहुत ही ग्यान्वर्धक और सार्थक प्रयास है मैने इसे सहेज लिया है और पिछला भी पढ्ना चाहती हूं -3-4 दिन मे फ्रीहो कर देखूँगी आपका बहुत बहुत धन्यवाद अगली हर पोस्ट का इन्तज़ार रहेगा
सुंदर प्रस्तुति। भारत ने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया को बहुत कुछ दिया है।
बहुत अच्छा, सुन्दर ब्लोग…