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आर्यभटीय और गणित (भाग-2)

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2.  ज्यामिति और ठोस ज्यामिति

आर्यभट ने sine के मानो की एक पूरी सूची दी जिसमे कि sine के सभी मान 90°/24 = 3° 45′ के अन्तराल पर दिये गये है| इसकी गणना के लिये उन्होने sin(n+1)x – sin nx का sin nx और sin (n-1)x के पदो मे एक सूत्र का प्रयोग किया| उन्होने versine (versin = 1 – cosine) को भी ज्यामिति मे शामिल किया|

वस्तुत: sine का यह नाम भी आर्यभट द्वारा दिये गये नाम का अपभ्रंश है| आर्यभट ने sine को अर्ध्-ज्या कहा, जिसे कि लोगों ने सरलता के लिये केवल ज्या (jya) कहना आरम्भ किया| जब उनके संस्कृत मे लिखी पुस्तक का अरबी मे अनुवाद हुआ तो इसे जिबा (jiba), ध्वन्यात्मक समानता के कारण, लिखा गया| हालांकि अरबी मे स्वरो का उच्चारण हटा दिया गया और इसे ज़्ब (jb) कहा जाने लगा| बाद के लेखको को लगा कि ज़्ब केवल एक लघुरूप है तो उन्होने इसे जाइब (jaib) कहा, क्योकि जिबा (jiba) का अरबी मे कोई अर्थ नहीं होता और जाइब का अर्थ होता है वक्र, अथवा कपड़े मे लिपटा हुआ (bundle, bosom, fold in a garment)| बाद मे 12 शताब्दी मे जब Gherardo of Cremona ने इन अरबी पुस्तकों को लैटिन मे अनुवाद किया तो उन्होने जाइब का लैटिन अनुवाद sinus से किया, जिसका लैटिन मे वही अर्थ होता है जो कि अरबी मे जाइब का| और सबसे अन्त मे लटिन का यह शब्द sinus अंग्रेजी मे sine बन गया| (http://www.etymonline.com/index.php?search=jaib&searchmode=none)

ज्यामिति मे आर्यभट का योगदान यहीं तक सीमित नहीं है| त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने के लिये वह स्पष्ट रूप से सूत्र देते है| गणितपाद मे उन्होने लिखा है-

आर्य२.६क/ त्रि-भुजस्य फल-शरीरम् सम-दल-कोटी-भुजा-अर्ध-संवर्गस्/

(for a triangle, the result of a perpendicular with the half-side is the area.)

आर्यभट ने जो सूत्र त्रिभुज और वृत्त का क्षेत्रफल निकालने के लिये दिये, वे तो पूर्णतः सही है, लेकिन, एक गोले और पिरामिड के आयतन के लिये दिये गये सूत्र को कई विद्वानो ने गलत बताया है| उदाहरण के लिये, गणितपाद (15) मे आर्यभट ने पिरामिड के आयतन के लिये V = Ah/2 सूत्र दिया है, जहाँ V = आयतन, A = त्रिकोणीय आधार का क्षेत्रफल, और, h = उँचाई| सही सूत्र V = Ah/3 है| इसी प्रकार गोले के आयतन के लिये भी उनका दिया सूत्र गलत लगता है| हालांकि, जैसा कि प्रायः होता है, कुछ भी सीधे सीधे नही कह कर, आर्यभट ने सब कुछ सुसज्जित श्लोको के माध्यम से कहा है, और K Elfering के अनुसार,आर्यभट ने सही सूत्र दिया था और उनके गलत होने का भ्रम गलत अनुवाद के कारण है| (K Elfering, The area of a triangle and the volume of a pyramid as well as the area of a circle and the surface of the hemisphere in the mathematics of Aryabhata I, Indian J. Hist. Sci. 12 (2) (1977), 232-236.)

3. बीजगणित: अनिश्चित समीकरण (Indeterminate Equations) -

भारतीय गणित मे प्राचीन काल से ही एक समस्या उच्च प्राथमिकता पर थी, और वह है ax+b=cy के प्रकार के समीकरणो का हल| इन्हे डायोफैंटीय समीकरण (diophantine euations) भी कहते है| Diophantine equation एक ऐसा अज्ञात पदो का बहुपदीय समीकरण है जिसमे पदो का मान केवल पूर्णांक ही हो सकता है| डायोफैंटस नामक यूनानी गणितज्ञ ने, जो संभवत: ईसा के पश्चात् तीसरी शताब्दी में रहा, बहुत से बहुपदीय अनिर्धारित समीकरणों (Undetermined Equations) का अध्ययन किया तथा पूर्णांकों में उनके हलों को ज्ञात किया। नीचे आर्यभटीय पर भास्कर की टिप्पणी का एक उदाहरण दिया गया है-

“ऐसी संख्या ज्ञात करे जिससे कि, जब उसे 8 से भाग दिया जाय तो 5 शेष बचे, और, जब 9 से भाग दिया जाय तो 4 शेष बचे, और, जब 7 से भाग दिया जाय तो 1 शेष बचे|”

उपरोक्त समस्या को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है- N = 8x+5 = 9y+4 = 7z+1. इससे निकाला जा सकता है कि N का छोटा से छोटा से मान 85 है| सामान्यतः डायोफैंटीय समीकरणो को बहुत ही कठिन माना जाता है| इनका भारतीय प्राचीन गणित मे विशेष रूप से अध्ययन किया गया| शुल्व-सूत्रो मे भी इन्हे देखा जा सकता है, जो कि आर्यभट से भी प्राचीन माने जाते है, लगभग 800 BCE के आसपास| आर्यभट ने इन समीकरणो को हल करने के लिये कुक्कुट विधि दी| कुक्कुट का अर्थ होता है छोटे छोटे भागो मे विभक्त करना| यह विधि, आर्यभट के, गणित मे सर्वश्रेष्ठ योगदानो मे से एक है| आर्यभट ने इस विधि का प्रयोग एक घात वाले डायोफैंटीय समीकरणो को हल करने मे किया, जो कि खगोल विज्ञान मे बहुत ही आवश्यक है| यही विधि, 6ठीं शताब्दी मे भास्कर के विस्तार के बाद, आज, डायोफैंटीय समीकरणो को हल करने के लिये संसार मे मानक विधि है, और इसे कई स्थानो पर Aryabhata algorithm (http://en.wikipedia.org/wiki/Aryabhata_algorithm) भी कहा जाता है|

4. खगोल विज्ञान:

ऊपर आर्यभटीय मे दिये गये गणित के बारे मे बताया गया है, परन्तु आर्यभटीय वस्तुतः खगोल विज्ञान का एक ग्रन्थ है, अतः इसमे दिये गये खगोल विज्ञान की भी चर्चा आवश्यक है| हालांकि इसके बारे मे विस्तार से पिछले लेख मे चर्चा की गयी है|
आर्यभट्ट ने अंतरिक्ष मे ग्रहो की स्थिति का एक व्यवस्थित तरीका दिया। उन्होने पृथ्वी की परिधि 24835 मील बताया, जो कि लगभग सही (वास्तविक मान 24902 मील है) बताया| पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष पर घूमती है, यह तथ्य गैलीलियो और कापरनिकस के बहुत पहले ही उन्होने आर्यभटीय मे लिख दिया|

आर्यभट्ट ने ग्रहो की कक्षाओ की त्रिज्याओ को भी पृथ्वी/सूर्य के कक्षा के त्रिज्या के पदो मे निकाल। उनका विश्वास था कि चन्द्रमा और ग्रह परावर्तित सूर्य-किरणो के कारण चमकते है, आश्चर्यजनक रूप से उन्हे विश्वास था कि ग्रहो की कक्षाये दीर्घवृत्त होती है। उन्होने सूर्य और चन्द्र ग्रहण के कारणो की एकदम सही सही व्याख्या की। एक वर्ष का काल उन्होने 365 दिन 6 घण्टे 12 मिनट और 30 सेकेण्ड जो कि अधिगणना थी क्योकि वास्तविक मान 365 दिन 6 घण्टे से कम है।

विरासत:

आर्यभट के कार्यो का भारतीय खगोल वैज्ञानिक परंपरा में काफी प्रभाव पड़ा, और अनुवाद के माध्यम से कई पड़ोसी संस्कृतियों को प्रभावित किया| इस्लामी स्वर्ण युग (ca. 820) के दौरान किया गया अरबी अनुवाद, विशेष रूप से प्रभावशाली था| आर्यभटीय ने दिये गये निष्कर्षो में से कुछ को अल-ख्वारिज्मी द्वारा उद्धृत किया गया, और 10 वीं शताब्दी के अरबी विद्वान अल-बरूनी ने अल-ख्वारिज्मी का संदर्भ लिया है| अल-बरूनी के अनुसार आर्यभट के अनुयायियो का विश्वास था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है| उन्होने sine (ज्या) परिभाषा तो दी ही, साथ ही साथ cosine (कोज्या), versine (उक्रमज्या), invers sine (व्युत्क्रम ज्या) को भी परिभाषित किया| त्रिकोणमिति के जनक आर्यभट ही है| वस्तुतः इसका अंग्रेजी नाम Trigonometry (ट्रिगोनोमेट्रि) संस्कृत शब्द त्रिकोणमिति का ही अपभ्रंश है| वह पहले व्यक्ति थे जिन्होने sine और versine (1-cosX) के 0° से 90° के बीच 3.75° के अन्तराल पर मानो की सूची दी, जो कि दशमलव के 4 स्थानो तक सही है|

आर्यभट्ट की खगोलीय गणनाएं भी बहुत प्रभावशाली थे| त्रिकोणमितीय सूची के साथ, वे व्यापक रूप से इस्लामी दुनिया में इस्तेमाल किया जाने लगे, और कई अरबी खगोलीय सारणी (zijes) की गणना मे प्रयोग किये गये| विशेष रूप से, अरबी स्पेन (स्पेन का वह भाग जो पहले अरब मे था) के वैज्ञानिक अल-ज़ारक़ाली (Al-Zarqali (11th c.)) के द्वारा दी गयी खगोलीय सारणी का लैटिन में अनुवाद किया गया Tables of Toledo (12th c.), और यूरोप मे सदियों तक सबसे सटीक Ephemeris (खगोलीय स्थितियो के लिये कैलेण्डर) माना गया|

आर्यभट्ट और अनुयायियों के द्वारा किये गये कैलेण्डर की गणनायें शताब्दियों से भारत मे पंचांग (हिन्दू कैलेण्डर) के निर्धारण के लिये प्रयुक्त की जाती रही है| ये इस्लामी दुनिया मे भी गये और वहाँ के जलाली कैलेण्डर (Jalali Calendar)का मुख्य आधार बना जिसे 1073 मे ओमर खय्याम (Omara Khayyam) और कुछ अन्य खगोलशास्त्रियो के द्वारा बनाया गया था| इसी के रूप (1925 मे संशोधित) आज ईरान और अफगानिस्तान के राष्ट्रिय कैलेण्डर हैं| जलाली कैलेण्डर मे तिथियाँ वास्तविक सौर पारगमन (solar transit) के आधार पर निकाली गयी है, ठीक उसी प्रकार जैसे आर्यभट्ट के कैलेण्डर(और पहले के सिद्धांत कैलेंडर) मे है| कैलेंडर मे इस प्रकार तिथि की गणना के लिए एक Ephemeris (खगोलीय स्थितियो के लिये कैलेण्डर) की आवश्यकता होती है| हालांकि तिथियों की गण्ना कठिन है, परन्तु मौसम की गणना मे त्रुटि, जलाली कैलेण्डर मे ग्रेगोरियन कैलेण्डर की तुलना मे कम है|

भारत के पहले उपग्रह आर्यभट को यह नाम उनके नाम पर दिया गया था| चंद्रमा गड्ढा आर्यभट्ट (lunar crater Aryabhata) का भी यह नाम उनके सम्मान में है| खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वातावरणीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए भारत मे नैनीताल के निकट संस्थापित एक संस्थान को आर्यभट्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट आफ आब्जर्वेशनल साइंस (Aryabhatta Research Institute of observational sciences (ARIES)) नाम दिया गया|

संदर्भ -

1. http://en.wikipedia.org/wiki/Aryabhata
2. http://www-history.mcs.st-andrews.ac.uk/Biographies/Aryabhata_I.html
3. ARYABHATA I, HIS LIFE AND HIS CONTRIBUTIONS by S. M. Razaullah Ansari
4. http://www.aryabhatta.net/
5. http://www.scribd.com/doc/20912413/The-Aryabhatiya-of-Aryabhata-English-Translation

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आर्यभटीय और गणित (भाग-1)

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आर्यभट को उनके 400 वर्षों पश्चात एक अन्य आर्यभट से अलग करने के लिये आर्यभट प्रथम के नाम से जाना जाता है| हांलाकि अल्-बरूनी ने उनके बारे मे भ्रम पैदा किया कि एक ही समय पर दो आर्यभट थे| परन्तु 1926 मे बी दत्ता ने यह भ्रम दूर किया और यह बताया कि अल्-बरूनी के दोनो आर्यभट एक ही व्यक्ति थे|

आर्यभट ने खगोल विज्ञान और गणित बहुत से ग्रन्थ लिखे, परन्तु उनमे से कुछ लुप्त हो गये है| उनका सबसे बडा़ कार्य आर्यभटीय है, जो कि गणित और खगोल विज्ञान का समन्वय है| इस पुस्तक को भारतीय गणित के इतिहास मे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है| इसके गणितीय भाग मे अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति, तल ज्यामिति, और ठोस ज्यामिति के बहुत से महत्वपूर्ण सिद्धान्त दिये गये हैं|

आर्यभट-सिद्धान्त, उनके द्वारा रचित एक अन्य ग्रन्थ था जिसमे खगोलीय गणनायें दी गयी थी| परन्तु अब यह ग्रन्थ लुप्त हो गया है| इसकी जानकारी वाराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, और भास्कर प्रथम के लेखों से मिलती है| यह ग्रन्थ प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त पर आधारित प्रतीत होता है जिसमे अर्ध-रात्रिका (जिसमे दिन का आरम्भ अर्ध-रात्रि से माना जाता है) का प्रयोग किया गया था इस ग्रन्थ मे बहुत से खगोलीय यंत्रो के बारे मे जानकारी दी गयी थी, जैसे “शंकु-यंत्र” (gnomon), “छाया-यंत्र” (a shadow instrument), कोण मापने के यंत्र, “धनुर्यंत्र”/”चक्र-यंत्र” (semicircular and circular), “यस्ति-यंत्र” (a cylindrical stick), “छत्र-यंत्र” (an umbrella-shaped device), कम से कम दो प्रकार (चक्राकार, और धनुषाकार) के जल घडी़ (water clocks) इत्यादि|

एक तीसरा ग्रन्थ अरबी अनुवाद में बचा रह गया – अल्-नत्फ, जिसे आर्यभट के किसी ग्रन्थ का अनुवाद माना जाता है, हालांकि इसके मूल संस्कृत ग्रन्थ का नाम नही पता चल पाया है|

आर्यभटीय:

आर्यभट का सर्षश्रेष्ठ ग्रन्थ आर्यभटीय है जो कि 108 श्लोको का एक खगोलीय लघु ग्रन्थ है, और जिसमे उस काल तक का भारतीय गणित समाया है| इसके गणितीय भाग मे 33 श्लोको मे 66 गणितीय सिद्धान्त दिये गये, परन्तु उनकी विधियाँ नही दी गयी है| आर्यभटीय मे 13 श्लोको का परिचय, 33 श्लोको मे गणित, 25 श्लोको मे समय और ग्रहीय सिद्धांतो की गणनायें, और अन्तिम 50 श्लोको मे गोलो और ग्रहण के सिद्धान्त दिये गये है|

हालांकि ऊपर दिये गये प्रारूप में कुछ भ्रम है जिसे Van der Waerden ने दूर किया| उनके अनुसार आरम्भ का परिचय (13 श्लोक) को बाद मे जोडा़ गया है| इन 13 श्लोको और बाकी के भागो मे एकरूपता नही है| पुनः इसे “दशगीतिका” नाम दिया गया है जबकि इसमे कुल 13 श्लोक (11 गीति श्लोक और 2 आर्य श्लोक) है| Van der Waerden का मानना है कि ये श्लोक और बाकी पुस्तक के भी कुछ श्लोक (जिन्हे Van der Waerden ने पहचाना है) आर्यभट के बाद कुसुमपुरा मे आर्यभट विद्यालय के सदस्यो के द्वारा लिखे गये है|

इस पुस्तक का यह नाम भी बाद के टिप्पणीकारो ने दिया| आर्यभट ने सम्भवतः इसे कोई नाम नही दिया था| आर्यभट के अनुगामी भास्कर प्रथम ने इसे अश्मक-तंत्र कहा| कुछ स्थानो पर इसे आर्य-शत-अष्ट(आर्यभट के 108) भी कहा गया है| इसे सूत्रों की भांति लघु श्लोको मे लिखा गया है, जिसे प्राचीन काल मे कण्ठस्थ करने की परम्परा थी| व्याख्या के अभाव मे टिप्पणीकारो ने इसकी अपनी अपनी व्याख्यायें दी| पूरा ग्रन्थ और 13 श्लोको का परिचय चार पादो मे विभक्त है-

1. गीतिकापाद(13 श्लोक): इसमे आर्यभट के युग सिद्दान्त को दिया गया है| कल्प, मन्वन्तर, युग इत्यादि, समय के बड़े मात्राओ की अवधारणा इसमे दी गयी है जो कि पूर्व मे लगध के “वेदांग ज्योतिष” (ca. 1st c. BCE) से अलग है| एक श्लोक मे ज्या (sine) के विभिन्न मानो की सम्पूर्ण सूची दी गयी है| ग्रहो की गति के सम्बन्ध मे एक महायुग को 4.32 मिलियन वर्ष (43 लाख 20 हजार वर्ष) बताया गया है|

2. गणितपाद (33 श्लोक): इसमे क्षेत्र-व्यवहार (mensuration), अंकीय और ज्यामितीय अनुक्रम (arithmetic and geometric progressions), शंकु-छाया (gnomon/shadows), साधारण, द्विघात, द्विवर्ण, और अनिश्चित समीकरणो ( simple, quadratic, simultaneous, and indeterminate equations) को हल करने के लिय कुक्कुट विधि दी गयी है|

3. कालक्रियापाद (25 श्लोक): इसमे समय के विभिन्न मात्रक,किसी दिन विशेष को किसी ग्रह की स्थिति ज्ञात करने की विधी, अधिकमास की व्याख्या और गणना, क्षाया-तिथि, सात दिनों का सप्ताह, और सप्ताह के सातो दिनो के नाम प्रस्तुत किये गये है|

4. गोलापाद (50 श्लोक): ब्रह्माण्ड के ज्यामितीय और त्रिकोणमितीय परिप्रेक्ष्य, ग्रहण का सिद्धान्त, ग्रहो की (भू)मध्य रेखा, पृथ्वी का आकार, दिन और रात होने के कारण, क्षितिज पर राशिचक्र का उदय इत्यादि इस भाग मे दिये गये है|

आर्यभट ने गणित और खगोल विज्ञान मे बहुत से महत्वपूर्ण और साहसिक कार्य किये, जिनका प्रभाव शताब्दियो बाद भी देखा जा सकता है| भास्कर प्रथम ने भाष्य (ca 600) और नीलकान्त सोमायजी ने आर्यभटीय भाष्य (1465) मे आर्यभटीय को महत्वपूर्ण विस्तार दिया है|

आर्यभट द्वारा प्रस्तुत कुछ महानतम गणितीय उपल्ब्धियाँ प्रस्तुत की जा रही है-

1. अंकगणित -

स्थानमान पद्धति और शून्य-

संख्याओं के लिये स्थानमान पद्धति, जिसे सर्वप्रथम भक्षली पाण्डुलिपि मे देखा गया, निस्संदेह आर्यभट की उपलब्धि थी| हालांकि उन्होने संख्याओ के लिये प्रतीको का प्रयोग नही किया, लेकिन फ्रांसीसी गणितज्ञ Georges Ifrah के अनुसार, आर्यभट के स्थानमान सिद्धान्त मे शून्य एक स्थान और दस के घात के रूप मे, शून्य गुणांक के साथ विद्यमान है|

हालांकि आर्यभट ने ब्राह्मी संख्याओं का प्रयोग नहीं किया, और वैदिककाल से चले आ रहे संस्कृत परम्परा को आगे बढाया| उन्होने संख्याओ और अन्य मात्राओ (जैसे sine के मानो की सूची) के लिये संस्कृत अक्षरो का प्रयोग किया|
इस प्रकार देवनागरी लिपि के 33 व्यंजनो का प्रयोग गणित मे 1, 2, 3, 4, …, 25, 30, 40, 50, 60, 70, 80, 90, 100 संख्याओ के लिये किया गया| आगे की संख्याओ (1000, 10000,…) के लिये व्यंजन के आगे एक स्वर लगा दिया गया| इस प्रकार की व्यवस्था मे 10^18 तक की संख्याओ को व्यक्त किया जा सकता है| फ्रांसीसी गणितज्ञ Georges Ifrah ने आर्यभट की विद्वता के बारे मे लिखा है-

“… it is extremely likely that Aryabhata knew the sign for zero and the numerals of the place value system. This supposition is based on the following two facts: first, the invention of his alphabetical counting system would have been impossible without zero or the place-value system; secondly, he carries out calculations on square and cubic roots which are impossible if the numbers in question are not written according to the place-value system and zero. “

आर्यभट के द्वारा दिये गये अन्य नियमो मे n पूर्णांको का योग, इनके वर्गो का योग, और इनके तृतीय घातो (cubes) का भी योग दिया गया है|

पाई (pi) एक परिमेय (irrational) संख्या है-

आर्यभट ने पाई (pi) का मान निकालने मे महत्वपूर्ण कार्य किया, और निस्संदेह यह पाया होगा कि यह एक परिमेय संख्या है| आर्यभटीय के गणितपाद मे उन्होने लिखा है-

आर्य२.१०क/ चतुर्-अधिकम् शतम् अष्ट-गुणम् द्वाषष्टिस् तथा सहस्राणाम्/
आर्य२.१०ग/ अयुत-द्वय-विष्कम्भस्य आसन्नस् वृत्त-परिणाहस्//

“Add four to 100, multiply by eight and then add 62,000. By this rule the circumference of a circle of diameter 20,000 can be approached.”

इस श्लोक के अनुसार किसी वृत्त के परिधि काऔ सके व्यास से अनुपात ((4+100)×8+62000)/20000 = 3.1416 होता है, जो पांच अंको तक शुद्ध मान है| वास्तव मे π = 3.14159265 (8 अंको तक शुद्ध मान) होता है|

यदि यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि आर्यभट को π का शुद्ध मान ज्ञात था, तो उससे भी आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उन्होने इस मान का प्रयोग करने के बजाय √10 = 3.1622 का प्रयोग किया है| आर्यभट ने इस शुद्ध मान को कैसे पाया, इसकी जानकारी वह नही देते है| परन्तु अहमद ( A Ahmad, On the pi of Aryabhata I, Ganita Bharati 3 (3-4) (1981), 83-85.) के अनुसार 256 भुजाओ वाले बहुभुज, जो कि एक वृत्त के अन्दर बना है, के अर्धपरिमाप की गणना है| हालांकि Bruins (E M Bruins, With roots towards Aryabhata’s pi-value, Ganita Bharati 5 (1-4) (1983), 1-7.) के अनुसार यह परिणाम, भुजाओ की संख्या को दुगुना करने पर नही निकलता है| एक अन्य लेखक पी झा, आर्यभट के π के बारे मे लिखते है -

“Aryabhata I’s value of π is a very close approximation to the modern value and the most accurate among those of the ancients. There are reasons to believe that Aryabhata devised a particular method for finding this value. It is shown with sufficient grounds that Aryabhata himself used it, and several later Indian mathematicians and even the Arabs adopted it. The conjecture that Aryabhata’s value of π is of Greek origin is critically examined and is found to be without foundation. Aryabhata discovered this value independently and also realised that π is an irrational number. He had the Indian background, no doubt, but excelled all his predecessors in evaluating π. Thus the credit of discovering this exact value of π may be ascribed to the celebrated mathematician, Aryabhata I.”

आर्यभट ने “आसन्न (appeoaching) शब्द का प्रयोग किया है, जो कि यह प्रदर्शित करता है कि यह मान एक अनुमान है, साथ ही यह भी बताता है कि यह मान अतुलनीय (incommensurable : impossible to measure) है, अर्थात परिमेय (irrational) है| यही तथ्य युरोप मे 1761 मे Lambert ने सिद्ध किया|

जब आर्यभटीय का अरबी मे अनुवाद हुआ, अल्-ख्वारिज़्मी ने इस मान को अपनी बीजगणित की पुस्तक मे भी स्थान दिया|

-क्रमशः

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आर्यभट्ट का खगोल ज्ञान

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“आर्यभट्ट ने अंतरिक्ष मे ग्रहो की स्थिति का एक व्यवस्थित तरीका दिया। उन्होने पृथ्वी की परिधि 4967 योजन और व्यास 1581 1/24 योजन बताया। चूंकि 1 योजन = 5 मील, अतः इस प्रकार परिधि 24835 मील हुयी, जो कि वर्तमान मे स्वीकार्य मान 24902 मील के बहुत निकट है। उनका विश्वास था कि स्वर्ग (आकाश/अंतरिक्ष) की आभासी गति पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने के कारण होती है। यह सौरमण्डल का बहुत ही मुख्य गुण है जिसे बाद के टिप्पणीकारो ने अनुसरण योग्य नही समझा और कुछ ने तो इसे आर्यभट्ट को उनकी इस कथित गलती से बचाने के लिये उनके लिखे को भी बदल दिया।

आर्यभट्ट ने ग्रहो की कक्षाओ की त्रिज्याओ को भी पृथ्वी/सूर्य के कक्षा के त्रिज्या के पदो मे निकाल। उनका विश्वास था कि चन्द्रमा और ग्रह परावर्तित सूर्य-किरणो के कारण चमकते है, आश्चर्यजनक रूप से उन्हे विश्वास था कि ग्रहो की कक्षाये दीर्घवृत्त होती है। उन्होने सूर्य और चन्द्र ग्रहण के कारणो की एकदम सही सही व्याख्या की। उस समय तक भारतीय विश्वास यह था कि ग्रहण एक दैत्य राहु के कारण होता है। एक वर्ष का काल उन्होने 365 दिन 6 घण्टे 12 मिनट और 30 सेकेण्ड जो कि अधिगणना थी क्योकि वास्तविक मान 365 दिन 6 घण्टे से कम है।”

–J J O’Connor and E F Robertson

आर्यभट्ट, जिन्हे अरबो ने आर्जबह्र (ARJABAHR) कहा, की मुख्य रचना आर्यभटीय है, जिसका लैटिन अनुवाद 13वीं शताब्दी (आर्यभट्ट के मृत्यु के 700 वर्षो के बाद) मे किया गया। इस पुस्तक मे त्रिभुज का क्षेत्रफल, गोले (sphere) के पृष्ठ का क्षेत्रफल और आयत निकालने की विधियाँ दी गयी है, और साथ ही साथ वर्गमूल और घनमूल निकालने की भी विधियाँ दी गयी है| आर्यभट्ट द्वारा दी गयी ग्रहण की व्याख्या, और ग्रहो और चन्द्रमा के चमकने का कारण यूरोपीय खगोलशास्त्रियो को आकर्षित नही कर सका, और कापरनिकस और गैलीलियो के स्वतंत्र अध्ययनो के बाद ही पाश्चात्य जगत ने इसे माना|

आर्यभट्ट के विलक्षण खगोल ज्ञान ने कई ऐसे सिद्धान्तो को बहुत पहले ही बता दिया, जिसे यूरोप और बाकी संसार ने शताब्दियों बाद जाना| उनके खगोल सिद्धान्त को औदायक सिद्धान्त (दिनो को, लंका के नीचे, भूमध्य रेखा के पास, उनके उदय के अनुसार लिया गया था) कहा गया है। हालांकि उनके कुछ कार्यो मे प्रदर्शित एक दूसरा सिद्धान्त, अर्द्धरात्रिका, नष्ट हो चुकी है, परन्तु, इसे ब्रह्मगुप्त के खन्डखाद्यक से पुनः निकाला जा सकता है। अपने कुछ लेखो मे वह पृथ्वी के सापेक्ष स्वर्ग की आभासी गति का वर्णन करते दिखायी पडते है।

कुछ प्रमुख खगोल ज्ञान, आर्यभट्ट के द्वारा-

पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष पर घूमती है|

पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष के सापेक्ष घूमती है। यह सिद्धान्त आर्यभट्ट ने सबसे पहले दिया। आर्यभटीय के 4.9वें श्लोक मे आर्यभट्ट ने स्पष्ट लिखा है- कि जैसे गतिमान नाव मे बैठे मनुष्य को नदी का स्थिर किनारा और अन्य वस्तुये गतिमान दिखायी पड़ते है, ठीक उसी प्रकार लंका (भूमध्य रेखा) के मनुष्यो को स्थिर तारे हमे गतिमान दिखायी पड़ते है।

आर्य४.९क/ अनुलोम-गतिस् नौ-स्थस् पश्यति अचलम् विलोम-गम् यद्-वत्/
आर्य४.९ग/ अचलानि भानि तद्-वत् सम-पश्चिम-गानि लङ्कायाम्//

एक अन्य श्लोक मे तो वह पृथ्वी का कोणीय वेग (angular velocity) भी बताते है- 1 मिनट का चाप (ark) प्रति प्राण (prana) (एक प्राण=4 seconds)। लंका को यहां संदर्भ बिन्दु (reference point) लिया गया है, जिसे कि खगोलीय गणनाओं के लिये संदर्भ याम्योत्तर रेखा (reference meridian) माना गया।

यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि आर्यभट्ट ने ग्रहों की कक्षीय अथवा दीर्घवृत्तीय गति का बिलकुल भी उल्लेख नही किया| आर्यभट्ट ने पृथ्वी केन्द्रित सौर मण्डल का सिद्धान्त दिया। उनके अन्य श्लोको (3.15 और 4.6) मे ऐसे संकेत मिले है जिसके अनुसार पृथ्वी अंतरिक्ष के केन्द्र मे स्थित है , और सभी ग्रहो की कक्षाये पृथ्वी के चारो ओर है और उनका क्रम इस प्रकार है- सूदूर तारो की पट्टी, शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्रमा, और पृथ्वी| इस सिद्धान्त , जो कि पैतामसिद्धान्त (c.a. AD 425) मे भी मिलता है, के अनुसार ग्रहो की गति दो अधिचक्रो (epicycle) से निर्देशित होती है- एक लघु – मन्द अधिचक्र, और दूसरा, दीर्घ – शीघ्र अधिचक्र।

यह उल्लेखनीय है इस प्रकार के सापेक्षिक गति के विचार अन्य सभ्यताओ मे भी मिले हैं| चीनी संदर्भ मे पृथ्वी के कक्षीय गति के बारे मे कहा गया है- “पृथ्वी .. सदा गतिमान है और स्थिर नही है, जिस प्रकार एक मनुष्य, जो कि एक नाव मे बैठा होता है| नाव, मनुष्य की जानकारी के बिना चलती है| (Shang-shu K’ao-ling-yao)” (Originally from German book given in E. Eberhard, Das Astronotllische Weltbild im Alten China, Die Naturwissenschaften 24 (1936), 517-519.)

O. Neugebauer के अनुसार Cleomedes, (writing in 370 ± 50 B.C.) ने ग्रहो की गति की तुलना गतिमान नाव पर बैठे मनुष्य अथवा के एक कुम्हार के घूमते हुये चाक पर बैठे एक चींटी से गति से किया है| (O. Neugebauer, A History of Ancient Mathematics. Astronomy in three parts, Springer Verlag, Berlin, 1975.) कुछ इसी प्रकार की समानताये ब्रह्मगुप्त ने भी उल्लिखित की जिसे अल्-बरूनी ने अनूदित किया- “..लेकिन ग्रह बहुत धीमी गति से पूर्व की ओर गतिमान रहते है, जैसे कुम्हार के चाक पर एक धूल के कण चाक की उल्टी दिशा मे गतिमान रहता है| इस कण की गति, जो कि दिखायी देती है, चाक की गति के बराबर ही दिखायी देती है, जबतक यह कण कुछ अलग (निरपेक्ष) गति प्राप्त नही करता है| इस दृष्टिकोण से लता, आर्यभट्ट और वशिष्ठ सहमत है, परन्तु कुछ लोग सोचते है कि पृथ्वी (सूर्य के चारो ओर) घूमती है और सूर्य स्थिर है|”

ग्रहो की सापेक्ष गति का यह सिद्धान्त आर्यभट्ट के बाद के बहुत से भारतीय विद्वानो द्वारा ही नकार दिया गया| कुछ तो उनके पुस्तको को विरोधाभासो की ओर ले गये और विवादित किया| सम्भवतः यही कारण हे कि आर्यभट्ट के ग्रहीय घूर्णन के सिद्धान्त का, ग्रहो के कक्षीय गति के सिद्धान्त की ओर पर्याप्त विकास नही हो सका, जैसा कि 15/16 सदी मे युरोप मे कॉपरनिकस (Copernicus) द्वारा किया गया|

सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण

प्राचीनकाल मे प्रत्येक वह प्राकृतिक क्रिया जो कि मनुष्य के समझ से परे होती थी, चमत्कारिक मान ली जाती थी, और उसके साथ कुछ मिथक भी जोड दिये जाते थे| ग्रहण के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ| चन्द्रमा की कक्षा के दो काल्पनिक बिन्दुओं, जहाँ पर सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होता प्रतीत होता था, को राहु और केतु नाम के दैत्य माने गये, जो कि, मिथक कथाओ के अनुसार, अमर है, और सूर्य और चन्द्रमा को खाकर ग्रहण करता है| आर्यभट्ट ने इस कपोल-कल्पना को शुद्ध-वैज्ञानिक व्याख्या से गलत सिद्ध किया|

आर्यभट्ट ने बताया कि वस्तुतः सूर्य के प्रकाश से चमकता है और जब उसे यह प्रकाश नही मिलता है तो वह नही दिखायी देता है| आर्यभटीय के चौथे अध्याय के आरम्भिक कुछ श्लोको मे छाया,जो कि पृथ्वी, चन्द्रमा और अन्य ग्रहो पर पड़ती है, का सिद्धान्त दिया गया है| 37वें श्लोक मे वह लिखते है कि जब चन्द्रमा पृथ्वी की छाया मे आ जाता है तो चन्द्रग्रहण होता है|

आर्य४.३७क/ चन्द्रस् जलम् अर्कस् अग्निस् मृद्-भू-छाया अपि या तमस् तत् हि/
आर्य४.३७ग/ छादयति शशी सूर्यम् शशिनम् महती च भू-छाया//

आगे के श्लोको (38-48) मे वह इस छाया का व्यास और लम्बाई, ग्रहण का आरम्भिक समय और काल, और सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहण हुए भाग को निकालने के लिये सूत्र भी देते है|

ग्रहण के इस सिद्धान्त का बाद के भारतीय खगोल विज्ञानियो द्वारा विस्तार किया गया| एक फ्रांसीसी खगोल विज्ञानी Guillaume le Gentil ने भी इसकी पुष्टि की है| उन्हे फ्रांसीसी राजा द्वारा 1761 मे पाण्डिचेरी भेजा गया था, शुक्र के संक्रमण(transit) का अध्ययन करने के लिये| हालांकि वह 1761 और 1769 दोनो मे असफल रहा, और पुनः 8 साल प्रतीक्षा के बाद Mauritius और Madagascar मे सफलता मिली| Le Gentil द्वारा 30 अगस्त 1765 के चन्द्रग्रहण के वर्णन के अनुसार भारतीय (तमिल) खगोल विज्ञान के विधियो से निकाला गया ग्रहण का समय और वास्तविक समय मे केवल 41 second का अन्तर था, जो कि बहुत कम है, जबकि Tobias Mayer(1752) की विधि से यह अन्तर 68 second मिलता है| निश्चित रूप से भारतीय गणना अधि शुद्ध है| हालांकि ग्रहण का पूरा काल निकालने के लिये Tobias Mayer की सूची अधिक योग्य सिद्ध हुई|

आर्यभट्ट के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 Kms है जो कि वास्तविक मान 40,075.0167 Kms से केवल 0.2% कम है, जबकि ग्रीक गणितज्ञ Eratosthenes (c. 200 BCE) की गणना मे 5-10% की त्रुटि थी|

आकाशीय पिण्डो का परिक्रमा और घूर्णन काल-

आर्यभट्ट ने पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन काल (स्थिर तारो के सापेक्ष) 23 घण्टे 56 मिनट और 4.1 सेकेण्ड निकाला, जो कि वास्तविक मान (23:56:4.091) के लगभग बराबर ही है| इसी प्रकार एक वर्ष, आर्यभट्ट के अनुसार, 365 दिन 6 घण्टे 12 मिनट और 30 सेकेण्ड का होता है| यह भी वास्तविक मान से केवल 3 मिनट 20 सेकेण्ड अधिक है| हालांकि इस प्रकार के अनुमान अन्य खगोलशास्त्रियो ने भी किये थे, परन्तु आर्यभट्ट की गणना सर्वशुद्ध थी|

… क्रमशः

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शुल्व सूत्र – गणित के अर्वाचीन सूत्र

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शुल्व सूत्र हिंदू धार्मिक दस्तावेज़ों का एक संग्रह है, जिसे 800 BCE के बीच 200 BCE लिखा गया। यह पुस्तके गणितीय रुप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। कई विद्वानों का विश्वास है कि ये गणित की सबसे पुरानी पुस्तके हैं। इन पुस्तको मे बहुत से गणितीय सिद्धांत है जो कि हमे बताते है कि प्राचीन भारत में गणित अन्य प्राचीन संस्कृति से भी ज़्यादा अग्रिम था। यहाँ तक कि शुल्व सूत्र में लिखे कुछ प्रमेयो का यूरोपियो द्वारा कई शताब्दियों के बाद आविष्कार किया जा सका।

प्राचीन संस्कृतियों में गणित का प्रारंभिक विकास धार्मिक प्रथाओं और त्योहारो के कारण आवश्यक हो गया था। लोगों को बलि या पूजा के कृत्यों के लिए और कुछ त्योहारों के शुभ समय के सटीक गणना की आवश्यकता थी। उन्हे सूरज और चाँद की उदय और अस्त होने, और सौर और चन्द्र ग्रहण की घटनाओं के सही समय के ज्ञान की भी आवश्यकता थी। इन सभी के लिये खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान आवश्यक है, अर्थात गणित, तल और गोलीय ज्यामिति और त्रिकोणमिति का सही ज्ञान,और संभवतः सरल खगोलीय उपकरणों के निर्माण का भी ज्ञान आवश्यक था। प्रारंभिक चरण में गणित मुख्य रूप से दो व्यापक परंपराओं मे विकसित हुआ- ज्यामितीय और अंकगणित, बीजगणित के मूलभूत विकास सहित। पुरा-यूनानी प्राचीन सभ्यताओं मे, यह भारत ही है कि जहाँ हम गणित की इन दोनों महान धाराओ पर मजबूत जोर देखते है। अन्य प्राचीन सभ्यताओं जैसे बेबीलोन और मिस्र ने मुख्य रूप से अंकीय गणनाओ मे प्रगति की थी।

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वेदांग ज्योतिष मे कहा गया है- “वेदा हि यज्ञार्थयभिप्रवृत्ता “ अर्थात् वेद भी यज्ञों के लिए प्रवृत्त हुए। यज्ञों के लिए भिन्न – भिन्न आकार प्रकार की वेदियां बनाने की आवश्यकता पड़ी जैसे- वर्गाकार, वृत्ताकार, अर्द्धवृत्ताकार, आयताकार, त्रिभुजाकार आदि। ये यज्ञ-कुण्ड प्रतीकात्मक रुप से बहुत महत्वपूर्ण थे, एवं इन्हे परिशुद्धता (accuracy) के साथ बनाना आवश्यक था। इन यज्ञ कुण्डों के निर्माण मे विभिन्न प्रकार के अभिकल्पो (designs) का प्रयोग किया जाता था। जैसे, किसी अभिकल्प में बाज को अपने घुमावदार पंखो के साथ उड़ते दिखाया गया है, किसी अभिकल्प में रथ के पहिये को दिखाया गया है, तो किसी अभिकल्प में कछुए को उसके सिर एवं पैर फैलाये हुए दिखाया गया है। जहाँ उपरोक्त अग्नि-कुण्डो का दैनिक पूजाओं के कृत्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वहीं कुछ अभिलषित वस्तुओं को प्राप्ति के लिए अधिक विस्तृत बलिदान या पूजाएं भी थी। विशिष्ट अग्नि-कुण्ड देवताओ से विशिष्ट उपहारो के साथ सम्बन्धित थे। उदाहरण के लिए, ” जिसे स्वर्ग की इच्छा है, उसके लिए एक बाज के रूप में अग्नि-कुण्ड”, “एक कछुए के रूप में अग्नि-कुण्ड का ब्राह्मण की दुनिया को जीतने के इच्छुक द्वारा का निर्माण किया जाना है” और “जो वर्तमान और भविष्य के शत्रुओं को नष्ट करना चाहते हैं उसे तिर्यग्वर्ग अग्नि-कुण्ड निर्माण करना चाहिए”। [ref:- Plofker, Kim (2007) p. 387़. इन “आग्नि-कुण्डो” के निर्माण करने के लिए कई संदर्भ ऋग्वेद संहिता में उपलब्ध हैं। इस वेदियों के निर्माण का विज्ञान तैत्तरीय संहिता और तैत्तरीय ब्राह्मण में अधिक विस्तार मे है।

मिट्टी के ईंटो से निर्मित यह वेदिया आकृति और आकार में बहुत जटिल है, और प्राय: गणितीय सूत्रो का उपयोग आवश्यक होता था। एक सामान्य उदाहरण एक वर्ग के आकार की एक वेदी (या उसका खंड) बनाना, जिसका क्षेत्रफल किसी वृत्तीय वेदी के बराबर हो, (ऐसा गणित, जिसने गणितज्ञो को वर्षो से परेशान किया)।इस के लिए उन्हे pi का अनुमान, प्रक्रियाओं की गणना, और सटीक निर्माण विधियों की आवश्यकता थी। इन प्रक्रियाओं के लिये त्रिकोण, वर्ग और आयत के गुणो, समरुप आकृतियो के गुणो, वृत्त को वर्ग बनाने तथा इसके विलोम, वर्ग को वृत्त बनाने (अर्थात् वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाने तथा इसके विलोम) जैसी समस्याओ के हल का अच्छा ज्ञान आवश्यक है।

भारतीय गणितज्ञो ने इस क्षेत्र में बहुत काम किया है, जो शुल्व सूत्र के रूप में जाना जाता है। केवल सात शुल्व सूत्र को वर्तमान में जाना जाता है। इन्हे बोधायन (Bodhayana), आपस्तम्ब (Apasthamba), कात्यायन (Katyayana), मानव (Manava), मैत्रियन (Maitrayana), वाराह (Varaha) और वधुला (Vadhula )के नाम से जाना जाता है उन ऋषियो या साधुओ के बाद जिन्होने उन्हें लिखा था। कात्यायन सूत्र वेदों के उस भाग से है, जिसे शुक्ल तजुर्वेद (Shukla Tajurveda) कहते है। जबकि अन्य सभी कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda) से लिये गये है। बोधायन, आपस्तम्ब और कात्यायन सूत्र गणितीय बिंदु से महत्वपूर्ण हैं। मैत्रियन मानव सूत्रो के समान है। एक अन्य शुल्व सूत्र हिरण्यकशिन भी पाया गया है, जो आपस्तम्ब सूत्र के समान है।

शुल्व सूत्रो से कुछ जटिल ज्यामितीय निर्माण के नीचे सूचीबद्ध हैं।

1.    किसी दिए गए वर्ग के अपवर्त्य के बराबर वर्ग की रचना करना
2.    किसी वर्ग के अपवर्तक के बराबर वर्ग की रचना करना
3.    दो विभिन्न वर्गों के योग के बराबर वर्ग की रचना करना
4.    दो विभिन्न वर्गों के अंतर के बराबर वर्ग की रचना करना
5.    आयत के बराबर वर्ग की रचना करना
6.    वर्ग के बराबर आयत की रचना करना
7.    वर्ग के बराबर त्रिभुज की रचना करना
8.    वृत्त के बराबर वर्ग की रचना करना तथा इसका विपरीत
9.    भुजाये ज्ञात होने पर आयत की रचना करना
10.    किसी दी हुई रेखा पर वर्ग की रचना करना
11.    दो भुजाओ और उनके झुकाव दिए रहने पर समांतर चतुर्भुज की रचना करना और इसी प्रकार की अन्य रचनाये एवं रुपान्तरण

ऊपरोक्त केवल कुछ उदाहरण हैं। असल में शुल्व-सूत्र बहुत से जटिल गणितीय निर्माणो से भरे पड़े हैं।

भारतीय गणित के इतिहास पर दृष्टि डालने पर ज्ञात होता है कि “शुल्व काल” या “वेदांग ज्योतिषकाल” (1000BC से 500BC) मे ही रेखागणित की नींव पड चुकी थी। उस काल मे इसे विभिन्न नामो से जाना जाता था, जैसे- शुल्व-गणित, शुल्व-विज्ञान, रज्जु-गणित, रज्जु-संख्यान, रज्जु-क्षेत्रगणित, क्षेत्र समास, क्षेत्र व्यवहार, क्षेत्रमिति, ज्यामिति, और भूमिति नामो से व्यक्त किया गया है। शुल्व का अर्थ है  रज्जु या रस्सी। अत: वह विज्ञान या गणित जो शुल्व की सहायता लेकर विकसित किया गया, उसे शुल्व-विज्ञान या शुल्व-गणित का नाम दिया गया। शुल्व का पर्यायवाची रज्जु होने के कारण इसे रज्जु-गणित भी कहा गया है, जो आगे चल कर रेखागणित मे परिणत हो गया। शुल्व का दूसरा अर्थ यज्ञीय कार्य भी है। चूकि विभिन्न प्रकार की यज्ञ वेदियो के निर्माण मे रज्जु की सहायता से पृ्थ्वी पर अभीष्ट दूरीयाँ मापने के अतिरिक्त कृ्षि योग्य भूमि की माप भी की जाती थी, इसीलिये इस्की सहायता से विकसित गणित का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति, तथा भूमिति भी पड़ गया। क्षेत्र, ज्या, भू, का एक ही अर्थ है- भूमि, तथा, मिति का अर्थ है, मापन। अत गणित की इस शाखा का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति या भूमिति अत्यन्त सार्थक है।

शुल्व-सूत्र वैदिक अवधि से भारतीय गणित का ज्ञान के एकमात्र स्रोत हैं। इस सूत्रो के समय का अनुमान अन्य वैदिक ग्रंथों की शब्दावली के साथ उनके व्याकरण और शब्दावली की तुलना करके किया गया हैं। सबसे पुराना शुल्व-सूत्र बोधायन द्वारा 800 BCE से 600 BCE के आसपास लिखा गया , और सभी सूत्रों की अवधि 800 BCE से 200BCE अनुमान किया गया है लिखा गया था। हालांकि यह वेदों की उत्पत्ति के थोड़ा बाद का समय है,परन्तु इसमें लिखे सिद्धांत वैदिक सभ्यता से पूर्व के है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि शुल्व सूत्र के लेखको ने वेदियों कि उन रचना विधियों को केवल लिखा है जो कि , जो कि प्राचीन काल से ही निर्दिष्ट रूप में थे। वे उन वेदियों के मूल रचनाकार नहीं है।

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क्यों श्रेष्ठतम है संस्कृत?

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संस्कृत भारत की एक शास्त्रीय भाषा है। यह दुनिया की सबसे पुरानी उल्लिखित भाषाओं में से एक है। संस्कृत को श्रेष्ठतम कहने के बहुत से कारण है, जैसे सर्वश्रेष्ठ व्याकरण, त्रुटिहीन व्याकरण, सरल एवं वैज्ञानिक, और प्राचीनता| यहाँ पर संस्कृत की कुछ विशेषताओ को बताना चाहता हूँ जो कि इसे एक विशिष्ट स्थान प्रदान करते है|

संस्कृत हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की हिन्द-ईरानी शाखा की हिन्द-आर्य उपशाखा में शामिल है। लेकिन कुछ विद्वान इसे ग्रीक और लैटिन के साथ रखने पर आपत्ति करते है| आपत्ति भी ध्यान देने योग्य है| यह एक स्थापित तथ्य है कि इन प्राचीन भाषाओं मे संस्कृत के अपभ्रंश मिलते है| निश्चित रूप से संस्कृत इन भाषाओ से पुरानी होनी चाहिये| इस प्रकार संस्कृत सबसे प्राचीन भाषा है| ये आदिम-हिन्द-यूरोपीय भाषा से बहुत ज़्यादा मेल खाती है। आधुनिक भारतीय भाषाएँ जैसे हिन्दी, उर्दू, कश्मीरी, उड़िया, बांग्ला, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, नेपाली, असमी आदि इसी से उत्पन्न हुई हैं। इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है।

संस्कृत में हिन्दू धर्म के लगभग सभी धर्मग्रन्थ लिखे हुए हैं। आज भी हिन्दू धर्म के ज़्यादातर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही होती हैं। संस्कृत का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है जो हिन्दू धर्म की प्रमुख किताब वेद की भाषा है। अधिकांश लोग पाणिनि की अष्टाध्यायी से काव्य संस्कृत की शुरुआत मानते हैं। रामायण, महाभारत और पुराण, काव्य संस्कृत में लिखे गये हैं।

संस्कृत शब्द दो शब्दों “सम्” (अर्थात्, सम्पूर्ण) और “कृतम्” (अर्थात्, किया गया) से मिलकर बना है| इस शब्द का अर्थ होता है- सम्पूर्ण, त्रुटिहीन| संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। बहुत प्राचीन काल से ही अनेक व्याकरणाचार्यों ने संस्कृत व्याकरण पर बहुत कुछ लिखा है। किन्तु पाणिनि का संस्कृत व्याकरण पर किया गया कार्य सबसे प्रसिद्ध है। उनका अष्टाध्यायी किसी भी भाषा के व्याकरण का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।

ध्वनि-तन्त्र और लिपि

संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन विशेष रूप से यह देवनागरी मे लिखी जाती रही है|। देवनागरी शब्द वस्तुतः “देवनाम गरिही” से व्युत्पन्न हुआ है और इसका अर्थ है “देवों की भाषा”| देवनागरी लिपि असल में संस्कृत के लिये ही बनी है, इसलिये इसमें हरेक चिह्न के लिये एक और सिर्फ़ एक ही ध्वनि है। देवनागरी में 16 (10+6) स्वर और 34 व्यंजन हैं। देवनागरी से रोमन लिपि में लिप्यन्तरण के लिये दो पद्धतियाँ अधिक प्रचलित हैं : IAST और ITRANS. शून्य, एक या अधिक व्यंजनों और एक स्वर के मेल से एक अक्षर बनता है।

स्वर

ये स्वर संस्कृत के लिये दिये गये हैं। हिन्दी में इनके उच्चारण थोड़े अलग होते हैं।

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संस्कृत में ऐ दो स्वरों का युग्म होता है और “अ-इ” या “आ-इ” की तरह बोला जाता है। इसी तरह औ “अ-उ” या “आ-उ” की तरह बोला जाता है।
इसके अलावा हिन्दी और संस्कृत में ये वर्णाक्षर भी स्वर माने जाते हैं :
•    ऋ — आधुनिक हिन्दी में “रि” की तरह, संस्कृत में American English syllabic / r / की तरह
•    ॠ — केवल संस्कृत में (दीर्घ ऋ)
•    ऌ — केवल संस्कृत में (syllabic retroflex l)
•    ॡ — केवल संस्कृत में (दीर्घ ऌ)
•    अं — आधे न्, म्, ङ्, ञ्, ण् के लिये या स्वर का नासिकीकरण करने के लिये
•    अँ — स्वर का नासिकीकरण करने के लिये (संस्कृत में नहीं उपयुक्त होता)
•    अः — अघोष “ह्” (निःश्वास) के लिये

व्यंजन

जब किसी स्वर प्रयोग नहीं हो, तो वहाँ पर ‘अ’ माना जाता है । स्वर के न होने को हलन्त्‌ अथवा विराम से दर्शाया जाता है । जैसे कि क्‌ ख्‌ ग्‌ घ्‌ ।

Consonant_1

Consonant_2

नोट करें :
•    इनमें से ळ (मूर्धन्य पार्विक अन्तस्थ) एक अतिरिक्त वयंजन है जिसका प्रयोग हिन्दी में नहीं होता है। मराठी और वैदिक संस्कृत में इसका प्रयोग किया जाता है।
•    संस्कृत में ष का उच्चारण ऐसे होता था : जीभ की नोक को मूर्धा (मुँह की छत) की ओर उठाकर श जैसी आवाज़ करना। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनि शाखा में कुछ वाक़्यात में ष का उच्चारण ख की तरह करना मान्य था। आधुनिक हिन्दी में ष का उच्चारण पूरी तरह श की तरह होता है।
•    हिन्दी में ण का उच्चारण ज़्यादातर ड़ँ की तरह होता है, यानि कि जीभ मुँह की छत को एक ज़ोरदार ठोकर मारती है। हिन्दी में क्षणिक और क्शड़िंक में कोई फ़र्क नहीं । पर संस्कृत में ण का उच्चारण न की तरह बिना ठोकर मारे होता था, फ़र्क सिर्फ़ इतना कि जीभ ण के समय मुँह की छत को कोमलता से छूती है।

संस्कृत भाषा की विशेषताएं-

1- अक्षरों का स्वर-व्यंजन उच्चारण-

यह सबसे विशिष्ट बात है संस्कृत की, कि इसमें कोई भी व्यंजन तभी पूर्ण अक्षर बनता है, जबकि उसे किसी स्वर से मिलाया जाता है| 16 स्वर, वस्तुतः विभिन्न ध्वनियो के नमूने (‘voice pattern’) है और 34  व्यंजन इन ध्वनियों के प्रकार (‘form’ of the ‘voice pattern’ of the sound)| अतः एक व्यंजन (जैसे – क्, ख्, ट्, इत्यादि) अकेले उच्चारित नहीं किया जा सकता| लेकिन स्वरो का स्वतंत्र उच्चारण किया जा सकता है|
इस व्यवस्था को विश्व की अन्य भाषा मे नही पाया जाता है| इसलिये उन भाषाओ के अक्षरो के उच्चारण मे समानता नही दिखती| जैसे come (कम) और coma(कोमा) मे ‘co’ के दो भिन्न उच्चारण देखने को मिलते है| अंग्रेजी मे इस प्रकार के अनेक उदाहरण मिलते है|
ग्रीक भाषा ने संस्कृत के पाँच स्वरो को ग्रहण किया, और कुछ दैनिक प्रयोग के अपभ्रंश शब्दो और संख्याओ को भी| जैसे-त्रय (trias) और पंच (pente)| यह शब्द उनके पास भारत और ग्रीस के मध्य व्यापार के समय व्यापारियो के मध्य संवाद के द्वारा पहुँचे| बाद मे अंग्रेजी का जन्म हुआ| लेकिन अभी भी इन भाषाओ मे स्वरो की संख्या बहुत कम है| यही कारण है कि एक ही स्वर का कई प्रकार से प्रयोग किया जाता है|

2- संस्कृत शब्दो का निर्माण-

संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग्, और सन्धियो की सहायता से नये शब्दो का निर्माण भी सरल है| संस्कृत मे शब्दो का निर्माण पूर्णतः वैज्ञानिक तरीके किया जाता है| संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द-रूप बनाये जाते हैं, जो व्याकरणिक अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूलशब्द के अन्त में प्रत्यय लगाकर बनाये जाते हैं। शब्दो के आरम्भ मे उपसर्ग लगाकर भी नये शब्द बनाये जा सकते है|  विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 शब्द-रूप होते हैं। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।  संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। इस तरह ये कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अन्त-श्लिष्टयोगात्मक भाषा है। संस्कृत के व्याकरण को वागीश शास्त्री ने वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है।

3- विराट् शब्दावली-

संस्कृत की शब्दावली सबसे विराट् है| किसी अन्य भाषा मे इतनी बडी शब्दावली नही मिलती| यहाँ तक कि संसार की लगभग सभी प्रमुख भाषाओ मे संस्कृत से लिये गये शब्द मिलते है| उनके अपने शब्दकोश भी संस्कृत के शब्दो के बिना अधूरे है| अंग्रेजी मे बहुत से शब्द संस्कृत से लिये गये है, यह तथ्य तो आज सभी जानते है|
इसके अलावा, संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग्, और सन्धियो की सहायता से नये शब्दो का निर्माण भी सरल है|

4- व्याकरण-

इसके सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है। प्राचीन काल हो या आधुनिक काल, उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, संस्कृत का व्याकरण अपरिवर्तित रहा है| यजुर्वेद का एक उदाहरण लीजिये-
ताँस्ते प्रेताभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ||(ई.)
यहाँ एक संज्ञा है- जनः, और एक क्रिया है- गच्छन्ति जो कि गम् धातु से बना है| गम् धातु के सभी 90 रूप और, जन् संज्ञा के सभी 21 रूप बिना किसी परिवर्तन के, एक ही प्रकार से, वेदो मे, पुराणो मे और अन्य संस्कृत साहित्यो मे किया गया है| ध्यान देने योग्य बात है कि ये सभी ग्रन्थ अलग अलग समय मे अलग अलग लेखको द्वारा लिखे गये है| अन्य भाषाओ का रूप समय के साथ बदलता जाता है|

5- प्राचीनता

वैदिक संस्कृत का परिष्कृत रूप हजारो वर्ष पहले से विद्यमान है, यहाँ तक कि ग्रीक, लैटिन, और हीब्रू के आरम्भिक विकास से भी बहुत पहले|  वेद संसार के पहले साहित्य है, यह अब एक निर्विवाद तथ्य है| संस्कृत दुनिया की पहली पुस्तक की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं कोई संशय की गुंजाइश नहीं हैं।

6- प्रचुर साहित्य-

सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी हाने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है। यद्यपि संस्कृत आधुनिक विश्व मे उतनी प्रचलित नही है जितनी कि इसे होना चाहिये, फिर भी इस भाषा मे पर्याप्त साहित्य प्राचीनकाल से ही वर्तमान है| चारो वेदो की भाषा तो संस्कृत है ही, अठ्ठारह पुराण और 108 उपनिषद भी इसी संस्कारित भाषा मे लिखे गये है| श्रीमदभागवद्गीता, रामायण, महाभारत भी संस्कृत मे लिखे है| महाभारत को तो संसार का सबसे बडा महाकाव्य माना जाता है|

7- संस्कारित भाषा-

संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं वल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं वल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है ।

8- सरल भाषा-

संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे – अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।

9- त्रुटिहीन भाषा-

इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।  संस्कृत व्याकरण तर्कशास्त्र पर पूरी तरह से खरी उतरती है, और मशीनो की भाषा के लिये पूरी तरह से उपयुक्त है| 1985 मे Rick Briggs ने अपने एक लेख “Knowledge Representation in Sanskrit and Artificial Intelligence” मे इस प्रकार के विचार प्रस्तुत किये| Forbes magazine, (July, 1987) के अनुसार “Sanskrit is the most convenient language for computer software programming.” [ref - http://www.stephen-knapp.com/indian_contributions_to_american_progress.htm]

10- मष्तिष्क विकास

आधुनिक शोधो मे पाया गया है कि संस्कृत के अध्ययन से मानसिक दृढता और स्मरणशक्ति का विकास होता है और यह सर्वश्रेष्ठ अल्जाइमर-प्रतिरोधी दवाओ (anti-Alzeimer drugs) मे से एक है| [ref-http://www.galendobbs.com/theck/sanskrit.html]

भारत और विश्व के लिए संस्कृत का महत्त्व

•    संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की माता है। इनकी अधिकांश शब्दावली या तो संस्कृत से ली गयी है या संस्कृत से प्रभावित है। पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक एकरूपता आयेगी जिससे भारतीय एकता बलवती होगी। यदि इच्छा-शक्ति हो तो संस्कृत को हिब्रू की भाँति पुनः प्रचलित भाषा भी बनाया जा सकता है।
•    हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में हैं।
•    हिन्दुओं के सभी पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कार की भाषा संस्कृत ही है।
•    हिन्दुओं, बौद्धों और जैनों के नाम भी संस्कृत पर आधारित होते हैं।
•    भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली भी संस्कृत से ही व्युत्पन्न की जाती है।
•    संस्कृत, भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है। भारत की लगभग सभी भाषाएं संस्कृत से ही उत्पन्न हुई है|
•    संस्कृत का प्राचीन साहित्य अत्यन्त प्राचीन, विशाल और विविधतापूर्ण है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, और साहित्य का खजाना है। इसके अध्ययन से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति को बढावा मिलेगा। संस्कृत को कम्प्यूटर के लिये (कृत्रिम बुद्धि के लिये) सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।

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आर्यभट्ट प्रथम-एक परिचय

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“जब पंच सिद्धान्तो के परिणाम पुराने अवलोकनो के उलट परिणाम देने लगे, जैसे ग्रहों की कक्षा और ग्रहण इत्यादि, तो कलियुग मे, कुसुमपुर नामक स्थान मे, ज्योतिष मे प्रवीण, आर्यभट्ट के रूप मे सूर्य स्वयं अवतरित हुये।”
- एक प्राचीन संस्कृत कथन।

aryabhatt-1कितना तेजोमय और प्रबल वर्णन है यह आर्यभट्ट और खगोल विज्ञान मे उनके योगदान का! जब समस्त संसार अभी गिनती भी नहीं सीख पाया था, तभी इस महान व्यक्ति ने ब्रह्माण्ड के रहस्यो को खोलना आरम्भ कर दिया था। गणित और खगोल विज्ञान मे इनके कार्यो ने विश्व को एक दिशा दी। इन्हे सम्मान देने के लिये, भारत ने अपने प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम इन्ही के नाम पर “आर्यभट्ट” रखा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र (ISRO) द्वारा निर्मित इस उपग्रह को 19 अप्रैल 1975 को सोवियत यूनियन (अब संयुक्त राज्य रूस, USR) के कापुस्तिन यार (Kapustin Yar) से कास्मोस – 3M (Cosmos-3M) नामक लांच व्हीकल (launch vehicle) से छोडा गया था और 11 फरवरी 1992 को यह वापस पृथ्वी के वायुमण्डल मे आ गया।

विडम्बना है कि हम आर्यभट्ट के जन्म और जीवन के बारे मे अधिक नही जानते। आधुनिक जानकारियो के अनुसार आर्यभट्ट के बारे मे खोज की शुरुआत तब हुई जब 1874 मे एच. केर्न (H.Kern(Ed.), The Aryabhatiya with the commentary Bhatadipika of Paramesvara, E.J.Brill, Leiden, 1874.) ने आर्यभट्ट द्वारा रचित एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ “आर्यभटीय” का सम्पादन किया।

आर्यभट्ट के जन्मकाल के बारे मे जानकारी उनके ग्रन्थ आर्यभटीय मे मिलती है। इसी ग्रंथ में इन्होंने अपना जन्मस्थान कुसुमपुर और जन्मकाल शक संवत् 398 लिखा है।  आर्यभटीय के एक श्लोक में आर्यभट जानकारी देते हैं कि उन्होंने इस पुस्तक की रचना कुसुमपुर में की है और उस समय उनकी आयु 23 साल की थी। वे लिखते हैं : ”कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके हैं और मेरी आयु 23 साल की है, जबकि मैं यह ग्रंथ लिख रहा हूं।”  भारतीय ज्योतिष की परंपरा के अनुसार कलियुग का आरंभ ईसा पूर्व 3101 में हुआ था। इस हिसाब से 499 ईस्वी  में आर्यभटीय की रचना हुई। इस प्रकार आर्यभट्ट का जन्म 476 मे हुआ माना जाता है। परन्तु इनके जन्मस्थान के बारे मे मतभेद हैं। कुछ विद्वानो का कहना है कि इनका जन्म नर्मदा और गोदावरी के बीच के किसी स्थान पर हुआ था,जिसे संस्कृत साहित्य मे अश्मकदेश के नाम से लिखा गया है। अश्मक की पहचान एक ओर जहाँ कौटिल्य के “अर्थशास्त्र” के विवेचक आधुनिक महाराष्ट्र के रूप मे करते हैं, वहीं प्राचीन बौद्ध स्रोतो के अनुसार अश्मक अथवा अस्सक दक्षिणपथ (Daccan) मे स्थित था। कुछ अन्य स्रोतो से इस देश को सुदूर उत्तर मे माना जाता है, क्योकि अश्मक ने ग्रीक आक्रमणकारी सिकन्दर (Alexander, 4 BC) से युद्ध किया था। इसका वर्णन ग्रीक इतिहासकारो Aspasioi और Assakenoi ने भी किया है।

इनकी मृत्यु 550 मे हुई थी।

हालांकि यह स्पष्ट है कि उच्च शिक्षा के लिये आर्यभट्ट कुसुमपुर गये और वहां काफी समय बिताया। भास्कर (629) ने कुसुमपुर को वर्तमान पटना बताया है। वहाँ पर आर्यभट्ट गुप्त साम्राज्य के समय रहे थे, जब इसका पूर्वोत्तर हुण आक्रमणकारियो द्वारा दमित था, विष्णुगुप्त से पहले, बुद्धगुप्त के राजकाल मे। बुद्धगुप्त का शासनकाल 477 से 497 तक था, और वह गुप्तवंश का आखिरी महान शासक था, तथा अपने दादा कुमारगुप्त के बाद गद्दी पर बैठा। गुप्त साम्राज्य एक बडा साम्राज्य था और बंगाल की खाडी से अरब सागर तक और दक्षिण मे नर्मदा तक फैला था। गुप्तकाल को भारतीय ज्ञान और अध्ययन के संदर्भ मे भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता है। इसके राज्य का नाम मगध और राजधानी पाटलिपुत्र थी, जिसे आज पटना कहते है। यहाँ पर अध्ययन का एक महान केन्द्र, नालन्दा विश्वविद्यालय स्थापित था और संभव है कि आर्यभट्ट इसके खगोल वेधशाला के कुलपति रहे हो। ऐसे प्रमाण है कि आर्यभट्ट-सिद्धान्त मे उन्होने ढेरो खगोलीय उपकरणो का वर्णन किया है।

आर्यभट्ट ने अपने खगोलीय संस्थापनाओं मे श्रीलंका का संदर्भ लिया है और आर्यभटीय मे बहुत से स्थानो पर इसका प्रयोग किया है। Florian Cajori के अनुसार आर्यभट्ट का गणित भारतीय गणित की तुलना मे श्रीलंकाई गणित के अधिक निकट है। [Florian Cajori (February 28, 1859 in St Aignan (near Thusis), Graubünden, Switzerland—August 15, 1930, Berkeley, California) was one of the most celebrated historians of mathematics in his day.]

आर्यभट के ग्रंथ का दक्षिण भारत में अधिक प्रचार रहा है और मलयालम लिपि में इस ग्रंथ की हस्तलिखित प्रतियां मिली हैं। इस आधार पर आर्यभट के कर्नाटक या केरल का निवासी होने की संभावना भी जताई जाती है। Institute of Reservoir Studies of Oil and Natural Gas Commission, Ahmedabad के वरिष्ठ भूवैज्ञानिक श्री के चन्द्र हरी का कहना है कि आर्यभट्ट वर्तमान केरल के उत्तरी तटीय प्रदेशो मे पोन्नणि नामक स्थान पर रहते थे। INSA द्वारा प्रकाशित A Concise History of Science in India मे भी यही दिया गया है। श्री हरी के अनुसार आर्यभटीय मे दिये गये गणनाओ के आधार पर आर्यभट्ट का स्थान आधुनिक पोन्नणि – चम्रवट्टम क्षेत्र ((latitude 10N51 and longitude 75E45) था। आर्यभट्ट द्वारा भूमध्य रेखा पर दिये गये पृथ्वी के परिधि के दो मान यह बताते है कि उनका अक्षांश 10N51 था, जहाँ भारतपुझा समुद्र मे मिलता है और उज्जैनी की मध्य रेखा केरल के तट को छूती है।

कृतियाँ

आर्यभट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है। दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। लेकिन जानकारों के अनुसार उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था- ‘आर्यभट्ट सिद्धांत‘। इस समय उसके केवल 34 श्लोक ही उपलब्ध हैं। उनके इस ग्रंथ का सातवे शतक में व्यापक उपयोग होता था। लेकिन इतना उपयोगी ग्रंथ लुप्त कैसे हो गया इस विषय में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती।

उन्होंने आर्यभटीय नामक महत्वपूर्ण ज्योतिष ग्रन्थ लिखा, जिसमें वर्गमूल, घनमूल, सामानान्तर श्रेणी तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का वर्णन है। उन्होंने अपने आर्यभट्टीय नामक ग्रन्थ में कुल 3 पृष्ठों के समा सकने वाले 33 श्लोकों में गणितविषयक सिद्धान्त तथा 5 पृष्ठों में 75 श्लोकों में खगोल-विज्ञान विषयक सिद्धान्त तथा इसके लिये यन्त्रों का भी निरूपण किया। आर्यभट्ट ने अपने इस छोटे से ग्रन्थ में अपने से पूर्ववर्ती तथा पश्चाद्वर्ती देश के तथा विदेश के सिद्धान्तों के लिये भी क्रान्तिकारी अवधारणाएँ उपस्थित की।

क्रमशः…

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