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हार्दिक स्वागत है आपका चर्चा मंच पर। यह मंच समर्पित है भारत चर्चा को। भारत से सम्बन्धित किसी भी विषय पर आपके विचार चर्चा के लिये आमन्त्रित हैं। भारत विश्व की सर्वाधिक धनी और प्राचीन सभ्यता का स्थान है, जिसका अस्तित्व सदियो तक रहा है, तथा जिसके प्रमाण हमे आज भी मिलते हैं। प्राचीन भारत को विश्व ज्ञान गुरु कहा जाता है। गणित और विज्ञान की कई विधाओं की जन्म-स्थली है यह भूमि। इस मंच पर आप भारत के स्वर्णिम इतिहास के बारे मे अपने विचार रख सकते हैं। भारत तो अनगिनत विविधताओ से भरा देश है। इसे पूर्णतः जानना तो असंभव प्रतीत होता है, परन्तु एक प्रयास तो हम कर ही सकते हैं। हमारे इस प्रयास मे अपना योगदान दीजिए।

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वयं रक्षामः

क्या आपने वयं रक्षामः पढ़ी है? यदि नही तो जल्द ही पढिये| अदभुत् और सुन्दर पुस्तक है यह| आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा लिखी यह पुस्तक पौराणिक परिप्रेक्ष्य को नए अंदाज और व्याख्या के साथ प्रस्तुत करती है| रामायण काल के बारे मे लिखी इस पुस्तक मे रक्ष तथा यक्ष संस्कृति के आपसी टकरावों की चर्चा की गयी है| यह पुस्तक वस्तुतः एक उपन्यास है| संस्कृतनिष्ठ हिन्दी मे लिखा गया यह उपन्यास रामायण काल की घटनाओ को रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है| यह उस काल के भारत का चित्रण करती है|यह केवल एक उपन्यास नही वरन भारत के स्वर्णिम इतिहास का एक वृहद अध्ययन है| शास्त्री जी रामायण काल को आज से 7000 वर्ष पूर्व बताते है| श्री शास्त्री इसमे वर्णित घटनाओ की भौगोलिक तथा ऐतिहासिक व्याख्या भी सटीक सन्दर्भो के साथ प्रस्तुत करते है|

सत्य का संधान आसान नही है, और साहित्य मे सत्य का निरुपण तो और भी कठिन है| श्री शास्त्री के शब्दो मे “असल सत्य और साहित्य के सत्य मे भेद है|” धार्मिक सहित्यो मे सत्य है, इसमे सन्देह है| लगभग सभी धार्मिक साहित्य एक पक्षीय है और विजेताओ (देवताओ) के गुणगान मे लिखे गये है| श्री शास्त्री इस परिपाटी से अलग जाते है| इस उपन्यास मे श्री राम के साथ-साथ जगत खलनायक रावण का भी सकारात्मक चित्रण किया गया है| उस साहसी, महाज्ञानी, महात्वाकांक्षी, सप्तद्वीपपति राजा का सकारात्मक पक्ष दिखाना वस्तुतः एक चुनौती ही है| इसके साथ ही उस काल के लगभग सभी संस्कृतियो को दैवीय नही बल्कि वास्तविक

रूप मे प्रस्तुत किया है|स्वयं श्री शास्त्री के शब्दो मे “इस उपन्यास मे प्राग्वैदकालीन नर, नाग्, देव्, दैत्य-दावन, आर्य, अनार्य आदि विविध नृवंशो के जीवन के वे विस्मृत पुरातन रेखाचित्र है, जिन्हे धर्म के रंगीन शीशे मे देखकर सारे संसार ने अन्तरिक्ष का देवता मान लिया था|”

संसार मे संस्कृतियो का संघर्ष सदैव होता रहा है| पुराकाल मे भी देव-दैत्य, आर्य-अनार्य, यक्ष-रक्ष इत्यादि संघर्षो की बाते मिलती है| श्री शास्त्री इन विभिन्न संस्कृतियो का चित्रण इस उपन्यास मे करते है|आर्य संस्कृति के बारे में यह कुछ इस प्रकार बताती है,

‘उन दिनों तक भारत के उत्तराखण्ड में ही आर्यों के सूर्य-मण्डल और चन्द्र मण्डल नामक दो राजसमूह थे। दोनों मण्डलों को मिलाकर आर्यावर्त कहा जाता था। उन दिनों आर्यों में यह नियम प्रचलित था कि सामाजिक श्रंखला भंग करने वालों को समाज-बहिष्कृत कर दिया जाता था। दण्डनीय जनों को जाति-बहिष्कार के अतिरिक्त प्रायश्चित जेल और जुर्माने के दण्ड दिये जाते थे। प्राय: ये ही बहिष्कृत जन दक्षिणारण्य में निष्कासित, कर दिये जाते थे। धीरे-धीरे इन बहिष्कृत जनों की दक्षिण और वहां के द्वीपपुंजों में दस्यु, महिष, कपि, नाग, पौण्ड, द्रविण, काम्बोज, पारद, खस, पल्लव, चीन, किरात, मल्ल, दरद, शक आदि जातियां संगठित हो गयी थीं।’

vayam-rakshamah

रावण ने दक्षिण में जोड़ने के लिए नयी संस्कृति का प्रचार किया। उसने उसे रक्ष संस्कृति का नाम दिया। रावण जब भगवान शिव की शरण में गया तो उसने इसे कुछ इस तरह से बताया,

‘हम रक्षा करते हैं। यही हमारी रक्ष-संस्कृति है। आप देवाधिदेव हैं। आप देखते ही हैं कि आर्यों ने आदित्यों से पृथक् होकर भारतखण्ड में आर्यावर्त बना लिया है। वि निरन्तर आर्यजनों को बहिष्कृत कर दक्षिणारण्य में भेजते रहते हैं। दक्षिणारण्य में इन बहिष्कृत वेद-विहीनव्रात्यों के अनेक जनपद स्थापित हो गये हैं। फिर भारतीय सागर के दक्षिण तट पर अनगिनत द्वीप-समूह हैं, जहां सब आर्य, अनार्य, आगत, समागत, देव, यक्ष, पितर, नाग, दैत्य, दानव, असुर परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध करके रहते हैं। फिर भी सबकी संस्कृति भिन्न है, परन्तु हमारा सभी का एक ही नृवंश है और हम सब परस्पर दायाद बान्धव हैं। मैं चाहता हूं कि मेरी रक्ष-संस्कृति में सभी का समावेश हो, सभी की रक्षा हो। इसी से मैंने वेद् का नया संस्करण किया है और उसमें मैंने सभी दैत्यों-दानवों की रीति-परम्पराओं को भी समावेशित किया है, जिससे हमारा सारा ही नृवंश एक वर्ग और एक संस्कृति के अन्तर्गत वृद्घिगत हो। आप देखते हैं कि गत एक सौ वर्षों में तेरह देवासुर-संग्राम हो चुके, जिनमें इन बस दायाद् बान्धवों ने परस्पर लड़कर अपना ही रक्त बहाया। विष्णु ने दैत्यों से कितने छल किए। देवगण अब भी अनीति करते हैं। काश्यप सागर-तट की सारी दैत्यभूमि आदित्यों ने छलद्घबल से छीनी है। अब सुन रहा हूं कि देवराट् इन्द्र चौदहवें देवासुर-संग्राम की योजना बना रहा है। ये सब संघर्ष तथा युद्घ तभी रोके जा सकते हैं, जब सारा नृवंश एक संस्कृति के अधीन हो इसीलिये मैंने अपनी वह रक्ष-संस्कृति प्रतिष्ठित की है।’

हालांकि अब रक्षो का चित्रण नर रूप मे नही बल्कि कुछ विचित्र, कुरुप और दुर्दान्त प्राणियो के रूप मे होता है, जिसका कोइ वैज्ञानिक प्रमाण नही मिलता है| इस मिथ्या प्रचार मे बुद्धु-बक्से (टेलीविजन) ने कुछ ज्यादा ही भूमिका निभाइ है|

इस पुस्तक के अनुसार रावण ने उत्तर भारत में अपने दो सैन्य सन्निवेश स्थापित किये पहला दण्डकारण्य (वर्तमान मे नासिक) में और दूसरा नैमिषारण्य। दण्डकारण्य का राज्य अपनी बहिन सूर्पनखा को दिया। उसे वहां अपने मौसी के बेटे खर और सेनानायक दूषण को चौदह हजार सुभट राक्षस देकर उसके साथ भेज दिया। दण्डकारण्य में राक्षसों का एक प्रकार से अच्छी तरह प्रवेश हो गया तथा भारत का दक्षिण तट भी उसके लिए सुरक्षित हो गया। लंका में कुबेर को भगा देने के बाद बहुत सारे यक्ष यक्षणी वहीं रूक गये थे। ताड़का भी एक यक्षणी थी। उसने रक्ष संस्कृति स्वीकार कर ली। उसने रावण से कहा,

‘हे रक्षराज, आप अनुमति दें तो मैं आपकी योजनापूर्ति में सहायता करूं। आप मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनिए। मेरा पिता सुकेतु यक्ष महाप्रतापी था। भरतखण्ड में- नैमिषारण्य में उसका राज्य था। उसने मुझे सब शस्त्र-शास्त्रों की पुरूषोचित शिक्षा दी थी और मेंरा विवाह धर्मात्मा जम्भ के पुत्र सुन्द से कर दिया था जिसे उस पाखण्डी ऋषि अगस्त्य ने मार डाला। अब उस वैर को हृदय में रख मैं अपने पुत्र को ले जी रही हूं। जो सत्य ही आप आर्यावर्त पर अभियान करना चाहते हैं, तो मुझे और मेरे पुत्र मारीच को कुछ राक्षस सुभट देकर नैमिषारण्य में भेज दीजिए, जिससे समय आने पर हम आपकी सेवा कर सकें। वहां हमारे इष्ट-मित्र, सम्बन्धी-सहायक बहुत हैं, जो सभी राक्षस -धर्म स्वीकार कर लेंगे।’

रावण ने, ताड़का की यह बात मान ली। उसे राक्षस भटों का एक अच्छा दल दिया जिसका सेनानायक उसी के पुत्र मारीच को बनाया तथा सुबाहु राक्षस को उसका साथी बनाकर नैमिषारण्य में भेज दिया।

विश्वविजय की महात्वाकांक्षा भी पुराकाल से मनुष्यो मे रही है| नेपोलियन्, हिटलर इत्यादि कुछ उदाहरण है| परन्तु प्राचीन भारत से ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते है जिसमे विश्वविजय के लिये समुद्र-यात्रा की गयी हो| आर्य संस्कृति के अनेको पुरोधाओ का सोचना था कि समुद्र अगम्य है| परन्तु रावण की महात्वाकांक्षा को समुद्र भी नही रोक सका|

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