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आर्यभटीय और गणित (भाग-2)

2.  ज्यामिति और ठोस ज्यामिति

आर्यभट ने sine के मानो की एक पूरी सूची दी जिसमे कि sine के सभी मान 90°/24 = 3° 45′ के अन्तराल पर दिये गये है| इसकी गणना के लिये उन्होने sin(n+1)x – sin nx का sin nx और sin (n-1)x के पदो मे एक सूत्र का प्रयोग किया| उन्होने versine (versin = 1 – cosine) को भी ज्यामिति मे शामिल किया|

वस्तुत: sine का यह नाम भी आर्यभट द्वारा दिये गये नाम का अपभ्रंश है| आर्यभट ने sine को अर्ध्-ज्या कहा, जिसे कि लोगों ने सरलता के लिये केवल ज्या (jya) कहना आरम्भ किया| जब उनके संस्कृत मे लिखी पुस्तक का अरबी मे अनुवाद हुआ तो इसे जिबा (jiba), ध्वन्यात्मक समानता के कारण, लिखा गया| हालांकि अरबी मे स्वरो का उच्चारण हटा दिया गया और इसे ज़्ब (jb) कहा जाने लगा| बाद के लेखको को लगा कि ज़्ब केवल एक लघुरूप है तो उन्होने इसे जाइब (jaib) कहा, क्योकि जिबा (jiba) का अरबी मे कोई अर्थ नहीं होता और जाइब का अर्थ होता है वक्र, अथवा कपड़े मे लिपटा हुआ (bundle, bosom, fold in a garment)| बाद मे 12 शताब्दी मे जब Gherardo of Cremona ने इन अरबी पुस्तकों को लैटिन मे अनुवाद किया तो उन्होने जाइब का लैटिन अनुवाद sinus से किया, जिसका लैटिन मे वही अर्थ होता है जो कि अरबी मे जाइब का| और सबसे अन्त मे लटिन का यह शब्द sinus अंग्रेजी मे sine बन गया| (http://www.etymonline.com/index.php?search=jaib&searchmode=none)

ज्यामिति मे आर्यभट का योगदान यहीं तक सीमित नहीं है| त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने के लिये वह स्पष्ट रूप से सूत्र देते है| गणितपाद मे उन्होने लिखा है-

आर्य२.६क/ त्रि-भुजस्य फल-शरीरम् सम-दल-कोटी-भुजा-अर्ध-संवर्गस्/

(for a triangle, the result of a perpendicular with the half-side is the area.)

आर्यभट ने जो सूत्र त्रिभुज और वृत्त का क्षेत्रफल निकालने के लिये दिये, वे तो पूर्णतः सही है, लेकिन, एक गोले और पिरामिड के आयतन के लिये दिये गये सूत्र को कई विद्वानो ने गलत बताया है| उदाहरण के लिये, गणितपाद (15) मे आर्यभट ने पिरामिड के आयतन के लिये V = Ah/2 सूत्र दिया है, जहाँ V = आयतन, A = त्रिकोणीय आधार का क्षेत्रफल, और, h = उँचाई| सही सूत्र V = Ah/3 है| इसी प्रकार गोले के आयतन के लिये भी उनका दिया सूत्र गलत लगता है| हालांकि, जैसा कि प्रायः होता है, कुछ भी सीधे सीधे नही कह कर, आर्यभट ने सब कुछ सुसज्जित श्लोको के माध्यम से कहा है, और K Elfering के अनुसार,आर्यभट ने सही सूत्र दिया था और उनके गलत होने का भ्रम गलत अनुवाद के कारण है| (K Elfering, The area of a triangle and the volume of a pyramid as well as the area of a circle and the surface of the hemisphere in the mathematics of Aryabhata I, Indian J. Hist. Sci. 12 (2) (1977), 232-236.)

3. बीजगणित: अनिश्चित समीकरण (Indeterminate Equations) -

भारतीय गणित मे प्राचीन काल से ही एक समस्या उच्च प्राथमिकता पर थी, और वह है ax+b=cy के प्रकार के समीकरणो का हल| इन्हे डायोफैंटीय समीकरण (diophantine euations) भी कहते है| Diophantine equation एक ऐसा अज्ञात पदो का बहुपदीय समीकरण है जिसमे पदो का मान केवल पूर्णांक ही हो सकता है| डायोफैंटस नामक यूनानी गणितज्ञ ने, जो संभवत: ईसा के पश्चात् तीसरी शताब्दी में रहा, बहुत से बहुपदीय अनिर्धारित समीकरणों (Undetermined Equations) का अध्ययन किया तथा पूर्णांकों में उनके हलों को ज्ञात किया। नीचे आर्यभटीय पर भास्कर की टिप्पणी का एक उदाहरण दिया गया है-

“ऐसी संख्या ज्ञात करे जिससे कि, जब उसे 8 से भाग दिया जाय तो 5 शेष बचे, और, जब 9 से भाग दिया जाय तो 4 शेष बचे, और, जब 7 से भाग दिया जाय तो 1 शेष बचे|”

उपरोक्त समस्या को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है- N = 8x+5 = 9y+4 = 7z+1. इससे निकाला जा सकता है कि N का छोटा से छोटा से मान 85 है| सामान्यतः डायोफैंटीय समीकरणो को बहुत ही कठिन माना जाता है| इनका भारतीय प्राचीन गणित मे विशेष रूप से अध्ययन किया गया| शुल्व-सूत्रो मे भी इन्हे देखा जा सकता है, जो कि आर्यभट से भी प्राचीन माने जाते है, लगभग 800 BCE के आसपास| आर्यभट ने इन समीकरणो को हल करने के लिये कुक्कुट विधि दी| कुक्कुट का अर्थ होता है छोटे छोटे भागो मे विभक्त करना| यह विधि, आर्यभट के, गणित मे सर्वश्रेष्ठ योगदानो मे से एक है| आर्यभट ने इस विधि का प्रयोग एक घात वाले डायोफैंटीय समीकरणो को हल करने मे किया, जो कि खगोल विज्ञान मे बहुत ही आवश्यक है| यही विधि, 6ठीं शताब्दी मे भास्कर के विस्तार के बाद, आज, डायोफैंटीय समीकरणो को हल करने के लिये संसार मे मानक विधि है, और इसे कई स्थानो पर Aryabhata algorithm (http://en.wikipedia.org/wiki/Aryabhata_algorithm) भी कहा जाता है|

4. खगोल विज्ञान:

ऊपर आर्यभटीय मे दिये गये गणित के बारे मे बताया गया है, परन्तु आर्यभटीय वस्तुतः खगोल विज्ञान का एक ग्रन्थ है, अतः इसमे दिये गये खगोल विज्ञान की भी चर्चा आवश्यक है| हालांकि इसके बारे मे विस्तार से पिछले लेख मे चर्चा की गयी है|
आर्यभट्ट ने अंतरिक्ष मे ग्रहो की स्थिति का एक व्यवस्थित तरीका दिया। उन्होने पृथ्वी की परिधि 24835 मील बताया, जो कि लगभग सही (वास्तविक मान 24902 मील है) बताया| पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष पर घूमती है, यह तथ्य गैलीलियो और कापरनिकस के बहुत पहले ही उन्होने आर्यभटीय मे लिख दिया|

आर्यभट्ट ने ग्रहो की कक्षाओ की त्रिज्याओ को भी पृथ्वी/सूर्य के कक्षा के त्रिज्या के पदो मे निकाल। उनका विश्वास था कि चन्द्रमा और ग्रह परावर्तित सूर्य-किरणो के कारण चमकते है, आश्चर्यजनक रूप से उन्हे विश्वास था कि ग्रहो की कक्षाये दीर्घवृत्त होती है। उन्होने सूर्य और चन्द्र ग्रहण के कारणो की एकदम सही सही व्याख्या की। एक वर्ष का काल उन्होने 365 दिन 6 घण्टे 12 मिनट और 30 सेकेण्ड जो कि अधिगणना थी क्योकि वास्तविक मान 365 दिन 6 घण्टे से कम है।

विरासत:

आर्यभट के कार्यो का भारतीय खगोल वैज्ञानिक परंपरा में काफी प्रभाव पड़ा, और अनुवाद के माध्यम से कई पड़ोसी संस्कृतियों को प्रभावित किया| इस्लामी स्वर्ण युग (ca. 820) के दौरान किया गया अरबी अनुवाद, विशेष रूप से प्रभावशाली था| आर्यभटीय ने दिये गये निष्कर्षो में से कुछ को अल-ख्वारिज्मी द्वारा उद्धृत किया गया, और 10 वीं शताब्दी के अरबी विद्वान अल-बरूनी ने अल-ख्वारिज्मी का संदर्भ लिया है| अल-बरूनी के अनुसार आर्यभट के अनुयायियो का विश्वास था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है| उन्होने sine (ज्या) परिभाषा तो दी ही, साथ ही साथ cosine (कोज्या), versine (उक्रमज्या), invers sine (व्युत्क्रम ज्या) को भी परिभाषित किया| त्रिकोणमिति के जनक आर्यभट ही है| वस्तुतः इसका अंग्रेजी नाम Trigonometry (ट्रिगोनोमेट्रि) संस्कृत शब्द त्रिकोणमिति का ही अपभ्रंश है| वह पहले व्यक्ति थे जिन्होने sine और versine (1-cosX) के 0° से 90° के बीच 3.75° के अन्तराल पर मानो की सूची दी, जो कि दशमलव के 4 स्थानो तक सही है|

आर्यभट्ट की खगोलीय गणनाएं भी बहुत प्रभावशाली थे| त्रिकोणमितीय सूची के साथ, वे व्यापक रूप से इस्लामी दुनिया में इस्तेमाल किया जाने लगे, और कई अरबी खगोलीय सारणी (zijes) की गणना मे प्रयोग किये गये| विशेष रूप से, अरबी स्पेन (स्पेन का वह भाग जो पहले अरब मे था) के वैज्ञानिक अल-ज़ारक़ाली (Al-Zarqali (11th c.)) के द्वारा दी गयी खगोलीय सारणी का लैटिन में अनुवाद किया गया Tables of Toledo (12th c.), और यूरोप मे सदियों तक सबसे सटीक Ephemeris (खगोलीय स्थितियो के लिये कैलेण्डर) माना गया|

आर्यभट्ट और अनुयायियों के द्वारा किये गये कैलेण्डर की गणनायें शताब्दियों से भारत मे पंचांग (हिन्दू कैलेण्डर) के निर्धारण के लिये प्रयुक्त की जाती रही है| ये इस्लामी दुनिया मे भी गये और वहाँ के जलाली कैलेण्डर (Jalali Calendar)का मुख्य आधार बना जिसे 1073 मे ओमर खय्याम (Omara Khayyam) और कुछ अन्य खगोलशास्त्रियो के द्वारा बनाया गया था| इसी के रूप (1925 मे संशोधित) आज ईरान और अफगानिस्तान के राष्ट्रिय कैलेण्डर हैं| जलाली कैलेण्डर मे तिथियाँ वास्तविक सौर पारगमन (solar transit) के आधार पर निकाली गयी है, ठीक उसी प्रकार जैसे आर्यभट्ट के कैलेण्डर(और पहले के सिद्धांत कैलेंडर) मे है| कैलेंडर मे इस प्रकार तिथि की गणना के लिए एक Ephemeris (खगोलीय स्थितियो के लिये कैलेण्डर) की आवश्यकता होती है| हालांकि तिथियों की गण्ना कठिन है, परन्तु मौसम की गणना मे त्रुटि, जलाली कैलेण्डर मे ग्रेगोरियन कैलेण्डर की तुलना मे कम है|

भारत के पहले उपग्रह आर्यभट को यह नाम उनके नाम पर दिया गया था| चंद्रमा गड्ढा आर्यभट्ट (lunar crater Aryabhata) का भी यह नाम उनके सम्मान में है| खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वातावरणीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए भारत मे नैनीताल के निकट संस्थापित एक संस्थान को आर्यभट्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट आफ आब्जर्वेशनल साइंस (Aryabhatta Research Institute of observational sciences (ARIES)) नाम दिया गया|

संदर्भ -

1. http://en.wikipedia.org/wiki/Aryabhata
2. http://www-history.mcs.st-andrews.ac.uk/Biographies/Aryabhata_I.html
3. ARYABHATA I, HIS LIFE AND HIS CONTRIBUTIONS by S. M. Razaullah Ansari
4. http://www.aryabhatta.net/
5. http://www.scribd.com/doc/20912413/The-Aryabhatiya-of-Aryabhata-English-Translation

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आर्यभटीय और गणित (भाग-1)

आर्यभट को उनके 400 वर्षों पश्चात एक अन्य आर्यभट से अलग करने के लिये आर्यभट प्रथम के नाम से जाना जाता है| हांलाकि अल्-बरूनी ने उनके बारे मे भ्रम पैदा किया कि एक ही समय पर दो आर्यभट थे| परन्तु 1926 मे बी दत्ता ने यह भ्रम दूर किया और यह बताया कि अल्-बरूनी के दोनो आर्यभट एक ही व्यक्ति थे|

आर्यभट ने खगोल विज्ञान और गणित बहुत से ग्रन्थ लिखे, परन्तु उनमे से कुछ लुप्त हो गये है| उनका सबसे बडा़ कार्य आर्यभटीय है, जो कि गणित और खगोल विज्ञान का समन्वय है| इस पुस्तक को भारतीय गणित के इतिहास मे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है| इसके गणितीय भाग मे अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति, तल ज्यामिति, और ठोस ज्यामिति के बहुत से महत्वपूर्ण सिद्धान्त दिये गये हैं|

आर्यभट-सिद्धान्त, उनके द्वारा रचित एक अन्य ग्रन्थ था जिसमे खगोलीय गणनायें दी गयी थी| परन्तु अब यह ग्रन्थ लुप्त हो गया है| इसकी जानकारी वाराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, और भास्कर प्रथम के लेखों से मिलती है| यह ग्रन्थ प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त पर आधारित प्रतीत होता है जिसमे अर्ध-रात्रिका (जिसमे दिन का आरम्भ अर्ध-रात्रि से माना जाता है) का प्रयोग किया गया था इस ग्रन्थ मे बहुत से खगोलीय यंत्रो के बारे मे जानकारी दी गयी थी, जैसे “शंकु-यंत्र” (gnomon), “छाया-यंत्र” (a shadow instrument), कोण मापने के यंत्र, “धनुर्यंत्र”/”चक्र-यंत्र” (semicircular and circular), “यस्ति-यंत्र” (a cylindrical stick), “छत्र-यंत्र” (an umbrella-shaped device), कम से कम दो प्रकार (चक्राकार, और धनुषाकार) के जल घडी़ (water clocks) इत्यादि|

एक तीसरा ग्रन्थ अरबी अनुवाद में बचा रह गया – अल्-नत्फ, जिसे आर्यभट के किसी ग्रन्थ का अनुवाद माना जाता है, हालांकि इसके मूल संस्कृत ग्रन्थ का नाम नही पता चल पाया है|

आर्यभटीय:

आर्यभट का सर्षश्रेष्ठ ग्रन्थ आर्यभटीय है जो कि 108 श्लोको का एक खगोलीय लघु ग्रन्थ है, और जिसमे उस काल तक का भारतीय गणित समाया है| इसके गणितीय भाग मे 33 श्लोको मे 66 गणितीय सिद्धान्त दिये गये, परन्तु उनकी विधियाँ नही दी गयी है| आर्यभटीय मे 13 श्लोको का परिचय, 33 श्लोको मे गणित, 25 श्लोको मे समय और ग्रहीय सिद्धांतो की गणनायें, और अन्तिम 50 श्लोको मे गोलो और ग्रहण के सिद्धान्त दिये गये है|

हालांकि ऊपर दिये गये प्रारूप में कुछ भ्रम है जिसे Van der Waerden ने दूर किया| उनके अनुसार आरम्भ का परिचय (13 श्लोक) को बाद मे जोडा़ गया है| इन 13 श्लोको और बाकी के भागो मे एकरूपता नही है| पुनः इसे “दशगीतिका” नाम दिया गया है जबकि इसमे कुल 13 श्लोक (11 गीति श्लोक और 2 आर्य श्लोक) है| Van der Waerden का मानना है कि ये श्लोक और बाकी पुस्तक के भी कुछ श्लोक (जिन्हे Van der Waerden ने पहचाना है) आर्यभट के बाद कुसुमपुरा मे आर्यभट विद्यालय के सदस्यो के द्वारा लिखे गये है|

इस पुस्तक का यह नाम भी बाद के टिप्पणीकारो ने दिया| आर्यभट ने सम्भवतः इसे कोई नाम नही दिया था| आर्यभट के अनुगामी भास्कर प्रथम ने इसे अश्मक-तंत्र कहा| कुछ स्थानो पर इसे आर्य-शत-अष्ट(आर्यभट के 108) भी कहा गया है| इसे सूत्रों की भांति लघु श्लोको मे लिखा गया है, जिसे प्राचीन काल मे कण्ठस्थ करने की परम्परा थी| व्याख्या के अभाव मे टिप्पणीकारो ने इसकी अपनी अपनी व्याख्यायें दी| पूरा ग्रन्थ और 13 श्लोको का परिचय चार पादो मे विभक्त है-

1. गीतिकापाद(13 श्लोक): इसमे आर्यभट के युग सिद्दान्त को दिया गया है| कल्प, मन्वन्तर, युग इत्यादि, समय के बड़े मात्राओ की अवधारणा इसमे दी गयी है जो कि पूर्व मे लगध के “वेदांग ज्योतिष” (ca. 1st c. BCE) से अलग है| एक श्लोक मे ज्या (sine) के विभिन्न मानो की सम्पूर्ण सूची दी गयी है| ग्रहो की गति के सम्बन्ध मे एक महायुग को 4.32 मिलियन वर्ष (43 लाख 20 हजार वर्ष) बताया गया है|

2. गणितपाद (33 श्लोक): इसमे क्षेत्र-व्यवहार (mensuration), अंकीय और ज्यामितीय अनुक्रम (arithmetic and geometric progressions), शंकु-छाया (gnomon/shadows), साधारण, द्विघात, द्विवर्ण, और अनिश्चित समीकरणो ( simple, quadratic, simultaneous, and indeterminate equations) को हल करने के लिय कुक्कुट विधि दी गयी है|

3. कालक्रियापाद (25 श्लोक): इसमे समय के विभिन्न मात्रक,किसी दिन विशेष को किसी ग्रह की स्थिति ज्ञात करने की विधी, अधिकमास की व्याख्या और गणना, क्षाया-तिथि, सात दिनों का सप्ताह, और सप्ताह के सातो दिनो के नाम प्रस्तुत किये गये है|

4. गोलापाद (50 श्लोक): ब्रह्माण्ड के ज्यामितीय और त्रिकोणमितीय परिप्रेक्ष्य, ग्रहण का सिद्धान्त, ग्रहो की (भू)मध्य रेखा, पृथ्वी का आकार, दिन और रात होने के कारण, क्षितिज पर राशिचक्र का उदय इत्यादि इस भाग मे दिये गये है|

आर्यभट ने गणित और खगोल विज्ञान मे बहुत से महत्वपूर्ण और साहसिक कार्य किये, जिनका प्रभाव शताब्दियो बाद भी देखा जा सकता है| भास्कर प्रथम ने भाष्य (ca 600) और नीलकान्त सोमायजी ने आर्यभटीय भाष्य (1465) मे आर्यभटीय को महत्वपूर्ण विस्तार दिया है|

आर्यभट द्वारा प्रस्तुत कुछ महानतम गणितीय उपल्ब्धियाँ प्रस्तुत की जा रही है-

1. अंकगणित -

स्थानमान पद्धति और शून्य-

संख्याओं के लिये स्थानमान पद्धति, जिसे सर्वप्रथम भक्षली पाण्डुलिपि मे देखा गया, निस्संदेह आर्यभट की उपलब्धि थी| हालांकि उन्होने संख्याओ के लिये प्रतीको का प्रयोग नही किया, लेकिन फ्रांसीसी गणितज्ञ Georges Ifrah के अनुसार, आर्यभट के स्थानमान सिद्धान्त मे शून्य एक स्थान और दस के घात के रूप मे, शून्य गुणांक के साथ विद्यमान है|

हालांकि आर्यभट ने ब्राह्मी संख्याओं का प्रयोग नहीं किया, और वैदिककाल से चले आ रहे संस्कृत परम्परा को आगे बढाया| उन्होने संख्याओ और अन्य मात्राओ (जैसे sine के मानो की सूची) के लिये संस्कृत अक्षरो का प्रयोग किया|
इस प्रकार देवनागरी लिपि के 33 व्यंजनो का प्रयोग गणित मे 1, 2, 3, 4, …, 25, 30, 40, 50, 60, 70, 80, 90, 100 संख्याओ के लिये किया गया| आगे की संख्याओ (1000, 10000,…) के लिये व्यंजन के आगे एक स्वर लगा दिया गया| इस प्रकार की व्यवस्था मे 10^18 तक की संख्याओ को व्यक्त किया जा सकता है| फ्रांसीसी गणितज्ञ Georges Ifrah ने आर्यभट की विद्वता के बारे मे लिखा है-

“… it is extremely likely that Aryabhata knew the sign for zero and the numerals of the place value system. This supposition is based on the following two facts: first, the invention of his alphabetical counting system would have been impossible without zero or the place-value system; secondly, he carries out calculations on square and cubic roots which are impossible if the numbers in question are not written according to the place-value system and zero. “

आर्यभट के द्वारा दिये गये अन्य नियमो मे n पूर्णांको का योग, इनके वर्गो का योग, और इनके तृतीय घातो (cubes) का भी योग दिया गया है|

पाई (pi) एक परिमेय (irrational) संख्या है-

आर्यभट ने पाई (pi) का मान निकालने मे महत्वपूर्ण कार्य किया, और निस्संदेह यह पाया होगा कि यह एक परिमेय संख्या है| आर्यभटीय के गणितपाद मे उन्होने लिखा है-

आर्य२.१०क/ चतुर्-अधिकम् शतम् अष्ट-गुणम् द्वाषष्टिस् तथा सहस्राणाम्/
आर्य२.१०ग/ अयुत-द्वय-विष्कम्भस्य आसन्नस् वृत्त-परिणाहस्//

“Add four to 100, multiply by eight and then add 62,000. By this rule the circumference of a circle of diameter 20,000 can be approached.”

इस श्लोक के अनुसार किसी वृत्त के परिधि काऔ सके व्यास से अनुपात ((4+100)×8+62000)/20000 = 3.1416 होता है, जो पांच अंको तक शुद्ध मान है| वास्तव मे π = 3.14159265 (8 अंको तक शुद्ध मान) होता है|

यदि यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि आर्यभट को π का शुद्ध मान ज्ञात था, तो उससे भी आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उन्होने इस मान का प्रयोग करने के बजाय √10 = 3.1622 का प्रयोग किया है| आर्यभट ने इस शुद्ध मान को कैसे पाया, इसकी जानकारी वह नही देते है| परन्तु अहमद ( A Ahmad, On the pi of Aryabhata I, Ganita Bharati 3 (3-4) (1981), 83-85.) के अनुसार 256 भुजाओ वाले बहुभुज, जो कि एक वृत्त के अन्दर बना है, के अर्धपरिमाप की गणना है| हालांकि Bruins (E M Bruins, With roots towards Aryabhata’s pi-value, Ganita Bharati 5 (1-4) (1983), 1-7.) के अनुसार यह परिणाम, भुजाओ की संख्या को दुगुना करने पर नही निकलता है| एक अन्य लेखक पी झा, आर्यभट के π के बारे मे लिखते है -

“Aryabhata I’s value of π is a very close approximation to the modern value and the most accurate among those of the ancients. There are reasons to believe that Aryabhata devised a particular method for finding this value. It is shown with sufficient grounds that Aryabhata himself used it, and several later Indian mathematicians and even the Arabs adopted it. The conjecture that Aryabhata’s value of π is of Greek origin is critically examined and is found to be without foundation. Aryabhata discovered this value independently and also realised that π is an irrational number. He had the Indian background, no doubt, but excelled all his predecessors in evaluating π. Thus the credit of discovering this exact value of π may be ascribed to the celebrated mathematician, Aryabhata I.”

आर्यभट ने “आसन्न (appeoaching) शब्द का प्रयोग किया है, जो कि यह प्रदर्शित करता है कि यह मान एक अनुमान है, साथ ही यह भी बताता है कि यह मान अतुलनीय (incommensurable : impossible to measure) है, अर्थात परिमेय (irrational) है| यही तथ्य युरोप मे 1761 मे Lambert ने सिद्ध किया|

जब आर्यभटीय का अरबी मे अनुवाद हुआ, अल्-ख्वारिज़्मी ने इस मान को अपनी बीजगणित की पुस्तक मे भी स्थान दिया|

-क्रमशः

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शुल्व सूत्र – गणित के अर्वाचीन सूत्र

शुल्व सूत्र हिंदू धार्मिक दस्तावेज़ों का एक संग्रह है, जिसे 800 BCE के बीच 200 BCE लिखा गया। यह पुस्तके गणितीय रुप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। कई विद्वानों का विश्वास है कि ये गणित की सबसे पुरानी पुस्तके हैं। इन पुस्तको मे बहुत से गणितीय सिद्धांत है जो कि हमे बताते है कि प्राचीन भारत में गणित अन्य प्राचीन संस्कृति से भी ज़्यादा अग्रिम था। यहाँ तक कि शुल्व सूत्र में लिखे कुछ प्रमेयो का यूरोपियो द्वारा कई शताब्दियों के बाद आविष्कार किया जा सका।

प्राचीन संस्कृतियों में गणित का प्रारंभिक विकास धार्मिक प्रथाओं और त्योहारो के कारण आवश्यक हो गया था। लोगों को बलि या पूजा के कृत्यों के लिए और कुछ त्योहारों के शुभ समय के सटीक गणना की आवश्यकता थी। उन्हे सूरज और चाँद की उदय और अस्त होने, और सौर और चन्द्र ग्रहण की घटनाओं के सही समय के ज्ञान की भी आवश्यकता थी। इन सभी के लिये खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान आवश्यक है, अर्थात गणित, तल और गोलीय ज्यामिति और त्रिकोणमिति का सही ज्ञान,और संभवतः सरल खगोलीय उपकरणों के निर्माण का भी ज्ञान आवश्यक था। प्रारंभिक चरण में गणित मुख्य रूप से दो व्यापक परंपराओं मे विकसित हुआ- ज्यामितीय और अंकगणित, बीजगणित के मूलभूत विकास सहित। पुरा-यूनानी प्राचीन सभ्यताओं मे, यह भारत ही है कि जहाँ हम गणित की इन दोनों महान धाराओ पर मजबूत जोर देखते है। अन्य प्राचीन सभ्यताओं जैसे बेबीलोन और मिस्र ने मुख्य रूप से अंकीय गणनाओ मे प्रगति की थी।

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वेदांग ज्योतिष मे कहा गया है- “वेदा हि यज्ञार्थयभिप्रवृत्ता “ अर्थात् वेद भी यज्ञों के लिए प्रवृत्त हुए। यज्ञों के लिए भिन्न – भिन्न आकार प्रकार की वेदियां बनाने की आवश्यकता पड़ी जैसे- वर्गाकार, वृत्ताकार, अर्द्धवृत्ताकार, आयताकार, त्रिभुजाकार आदि। ये यज्ञ-कुण्ड प्रतीकात्मक रुप से बहुत महत्वपूर्ण थे, एवं इन्हे परिशुद्धता (accuracy) के साथ बनाना आवश्यक था। इन यज्ञ कुण्डों के निर्माण मे विभिन्न प्रकार के अभिकल्पो (designs) का प्रयोग किया जाता था। जैसे, किसी अभिकल्प में बाज को अपने घुमावदार पंखो के साथ उड़ते दिखाया गया है, किसी अभिकल्प में रथ के पहिये को दिखाया गया है, तो किसी अभिकल्प में कछुए को उसके सिर एवं पैर फैलाये हुए दिखाया गया है। जहाँ उपरोक्त अग्नि-कुण्डो का दैनिक पूजाओं के कृत्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वहीं कुछ अभिलषित वस्तुओं को प्राप्ति के लिए अधिक विस्तृत बलिदान या पूजाएं भी थी। विशिष्ट अग्नि-कुण्ड देवताओ से विशिष्ट उपहारो के साथ सम्बन्धित थे। उदाहरण के लिए, ” जिसे स्वर्ग की इच्छा है, उसके लिए एक बाज के रूप में अग्नि-कुण्ड”, “एक कछुए के रूप में अग्नि-कुण्ड का ब्राह्मण की दुनिया को जीतने के इच्छुक द्वारा का निर्माण किया जाना है” और “जो वर्तमान और भविष्य के शत्रुओं को नष्ट करना चाहते हैं उसे तिर्यग्वर्ग अग्नि-कुण्ड निर्माण करना चाहिए”। [ref:- Plofker, Kim (2007) p. 387़. इन “आग्नि-कुण्डो” के निर्माण करने के लिए कई संदर्भ ऋग्वेद संहिता में उपलब्ध हैं। इस वेदियों के निर्माण का विज्ञान तैत्तरीय संहिता और तैत्तरीय ब्राह्मण में अधिक विस्तार मे है।

मिट्टी के ईंटो से निर्मित यह वेदिया आकृति और आकार में बहुत जटिल है, और प्राय: गणितीय सूत्रो का उपयोग आवश्यक होता था। एक सामान्य उदाहरण एक वर्ग के आकार की एक वेदी (या उसका खंड) बनाना, जिसका क्षेत्रफल किसी वृत्तीय वेदी के बराबर हो, (ऐसा गणित, जिसने गणितज्ञो को वर्षो से परेशान किया)।इस के लिए उन्हे pi का अनुमान, प्रक्रियाओं की गणना, और सटीक निर्माण विधियों की आवश्यकता थी। इन प्रक्रियाओं के लिये त्रिकोण, वर्ग और आयत के गुणो, समरुप आकृतियो के गुणो, वृत्त को वर्ग बनाने तथा इसके विलोम, वर्ग को वृत्त बनाने (अर्थात् वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाने तथा इसके विलोम) जैसी समस्याओ के हल का अच्छा ज्ञान आवश्यक है।

भारतीय गणितज्ञो ने इस क्षेत्र में बहुत काम किया है, जो शुल्व सूत्र के रूप में जाना जाता है। केवल सात शुल्व सूत्र को वर्तमान में जाना जाता है। इन्हे बोधायन (Bodhayana), आपस्तम्ब (Apasthamba), कात्यायन (Katyayana), मानव (Manava), मैत्रियन (Maitrayana), वाराह (Varaha) और वधुला (Vadhula )के नाम से जाना जाता है उन ऋषियो या साधुओ के बाद जिन्होने उन्हें लिखा था। कात्यायन सूत्र वेदों के उस भाग से है, जिसे शुक्ल तजुर्वेद (Shukla Tajurveda) कहते है। जबकि अन्य सभी कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda) से लिये गये है। बोधायन, आपस्तम्ब और कात्यायन सूत्र गणितीय बिंदु से महत्वपूर्ण हैं। मैत्रियन मानव सूत्रो के समान है। एक अन्य शुल्व सूत्र हिरण्यकशिन भी पाया गया है, जो आपस्तम्ब सूत्र के समान है।

शुल्व सूत्रो से कुछ जटिल ज्यामितीय निर्माण के नीचे सूचीबद्ध हैं।

1.    किसी दिए गए वर्ग के अपवर्त्य के बराबर वर्ग की रचना करना
2.    किसी वर्ग के अपवर्तक के बराबर वर्ग की रचना करना
3.    दो विभिन्न वर्गों के योग के बराबर वर्ग की रचना करना
4.    दो विभिन्न वर्गों के अंतर के बराबर वर्ग की रचना करना
5.    आयत के बराबर वर्ग की रचना करना
6.    वर्ग के बराबर आयत की रचना करना
7.    वर्ग के बराबर त्रिभुज की रचना करना
8.    वृत्त के बराबर वर्ग की रचना करना तथा इसका विपरीत
9.    भुजाये ज्ञात होने पर आयत की रचना करना
10.    किसी दी हुई रेखा पर वर्ग की रचना करना
11.    दो भुजाओ और उनके झुकाव दिए रहने पर समांतर चतुर्भुज की रचना करना और इसी प्रकार की अन्य रचनाये एवं रुपान्तरण

ऊपरोक्त केवल कुछ उदाहरण हैं। असल में शुल्व-सूत्र बहुत से जटिल गणितीय निर्माणो से भरे पड़े हैं।

भारतीय गणित के इतिहास पर दृष्टि डालने पर ज्ञात होता है कि “शुल्व काल” या “वेदांग ज्योतिषकाल” (1000BC से 500BC) मे ही रेखागणित की नींव पड चुकी थी। उस काल मे इसे विभिन्न नामो से जाना जाता था, जैसे- शुल्व-गणित, शुल्व-विज्ञान, रज्जु-गणित, रज्जु-संख्यान, रज्जु-क्षेत्रगणित, क्षेत्र समास, क्षेत्र व्यवहार, क्षेत्रमिति, ज्यामिति, और भूमिति नामो से व्यक्त किया गया है। शुल्व का अर्थ है  रज्जु या रस्सी। अत: वह विज्ञान या गणित जो शुल्व की सहायता लेकर विकसित किया गया, उसे शुल्व-विज्ञान या शुल्व-गणित का नाम दिया गया। शुल्व का पर्यायवाची रज्जु होने के कारण इसे रज्जु-गणित भी कहा गया है, जो आगे चल कर रेखागणित मे परिणत हो गया। शुल्व का दूसरा अर्थ यज्ञीय कार्य भी है। चूकि विभिन्न प्रकार की यज्ञ वेदियो के निर्माण मे रज्जु की सहायता से पृ्थ्वी पर अभीष्ट दूरीयाँ मापने के अतिरिक्त कृ्षि योग्य भूमि की माप भी की जाती थी, इसीलिये इस्की सहायता से विकसित गणित का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति, तथा भूमिति भी पड़ गया। क्षेत्र, ज्या, भू, का एक ही अर्थ है- भूमि, तथा, मिति का अर्थ है, मापन। अत गणित की इस शाखा का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति या भूमिति अत्यन्त सार्थक है।

शुल्व-सूत्र वैदिक अवधि से भारतीय गणित का ज्ञान के एकमात्र स्रोत हैं। इस सूत्रो के समय का अनुमान अन्य वैदिक ग्रंथों की शब्दावली के साथ उनके व्याकरण और शब्दावली की तुलना करके किया गया हैं। सबसे पुराना शुल्व-सूत्र बोधायन द्वारा 800 BCE से 600 BCE के आसपास लिखा गया , और सभी सूत्रों की अवधि 800 BCE से 200BCE अनुमान किया गया है लिखा गया था। हालांकि यह वेदों की उत्पत्ति के थोड़ा बाद का समय है,परन्तु इसमें लिखे सिद्धांत वैदिक सभ्यता से पूर्व के है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि शुल्व सूत्र के लेखको ने वेदियों कि उन रचना विधियों को केवल लिखा है जो कि , जो कि प्राचीन काल से ही निर्दिष्ट रूप में थे। वे उन वेदियों के मूल रचनाकार नहीं है।

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आर्यभट्ट प्रथम-एक परिचय

“जब पंच सिद्धान्तो के परिणाम पुराने अवलोकनो के उलट परिणाम देने लगे, जैसे ग्रहों की कक्षा और ग्रहण इत्यादि, तो कलियुग मे, कुसुमपुर नामक स्थान मे, ज्योतिष मे प्रवीण, आर्यभट्ट के रूप मे सूर्य स्वयं अवतरित हुये।”
- एक प्राचीन संस्कृत कथन।

aryabhatt-1कितना तेजोमय और प्रबल वर्णन है यह आर्यभट्ट और खगोल विज्ञान मे उनके योगदान का! जब समस्त संसार अभी गिनती भी नहीं सीख पाया था, तभी इस महान व्यक्ति ने ब्रह्माण्ड के रहस्यो को खोलना आरम्भ कर दिया था। गणित और खगोल विज्ञान मे इनके कार्यो ने विश्व को एक दिशा दी। इन्हे सम्मान देने के लिये, भारत ने अपने प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम इन्ही के नाम पर “आर्यभट्ट” रखा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र (ISRO) द्वारा निर्मित इस उपग्रह को 19 अप्रैल 1975 को सोवियत यूनियन (अब संयुक्त राज्य रूस, USR) के कापुस्तिन यार (Kapustin Yar) से कास्मोस – 3M (Cosmos-3M) नामक लांच व्हीकल (launch vehicle) से छोडा गया था और 11 फरवरी 1992 को यह वापस पृथ्वी के वायुमण्डल मे आ गया।

विडम्बना है कि हम आर्यभट्ट के जन्म और जीवन के बारे मे अधिक नही जानते। आधुनिक जानकारियो के अनुसार आर्यभट्ट के बारे मे खोज की शुरुआत तब हुई जब 1874 मे एच. केर्न (H.Kern(Ed.), The Aryabhatiya with the commentary Bhatadipika of Paramesvara, E.J.Brill, Leiden, 1874.) ने आर्यभट्ट द्वारा रचित एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ “आर्यभटीय” का सम्पादन किया।

आर्यभट्ट के जन्मकाल के बारे मे जानकारी उनके ग्रन्थ आर्यभटीय मे मिलती है। इसी ग्रंथ में इन्होंने अपना जन्मस्थान कुसुमपुर और जन्मकाल शक संवत् 398 लिखा है।  आर्यभटीय के एक श्लोक में आर्यभट जानकारी देते हैं कि उन्होंने इस पुस्तक की रचना कुसुमपुर में की है और उस समय उनकी आयु 23 साल की थी। वे लिखते हैं : ”कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके हैं और मेरी आयु 23 साल की है, जबकि मैं यह ग्रंथ लिख रहा हूं।”  भारतीय ज्योतिष की परंपरा के अनुसार कलियुग का आरंभ ईसा पूर्व 3101 में हुआ था। इस हिसाब से 499 ईस्वी  में आर्यभटीय की रचना हुई। इस प्रकार आर्यभट्ट का जन्म 476 मे हुआ माना जाता है। परन्तु इनके जन्मस्थान के बारे मे मतभेद हैं। कुछ विद्वानो का कहना है कि इनका जन्म नर्मदा और गोदावरी के बीच के किसी स्थान पर हुआ था,जिसे संस्कृत साहित्य मे अश्मकदेश के नाम से लिखा गया है। अश्मक की पहचान एक ओर जहाँ कौटिल्य के “अर्थशास्त्र” के विवेचक आधुनिक महाराष्ट्र के रूप मे करते हैं, वहीं प्राचीन बौद्ध स्रोतो के अनुसार अश्मक अथवा अस्सक दक्षिणपथ (Daccan) मे स्थित था। कुछ अन्य स्रोतो से इस देश को सुदूर उत्तर मे माना जाता है, क्योकि अश्मक ने ग्रीक आक्रमणकारी सिकन्दर (Alexander, 4 BC) से युद्ध किया था। इसका वर्णन ग्रीक इतिहासकारो Aspasioi और Assakenoi ने भी किया है।

इनकी मृत्यु 550 मे हुई थी।

हालांकि यह स्पष्ट है कि उच्च शिक्षा के लिये आर्यभट्ट कुसुमपुर गये और वहां काफी समय बिताया। भास्कर (629) ने कुसुमपुर को वर्तमान पटना बताया है। वहाँ पर आर्यभट्ट गुप्त साम्राज्य के समय रहे थे, जब इसका पूर्वोत्तर हुण आक्रमणकारियो द्वारा दमित था, विष्णुगुप्त से पहले, बुद्धगुप्त के राजकाल मे। बुद्धगुप्त का शासनकाल 477 से 497 तक था, और वह गुप्तवंश का आखिरी महान शासक था, तथा अपने दादा कुमारगुप्त के बाद गद्दी पर बैठा। गुप्त साम्राज्य एक बडा साम्राज्य था और बंगाल की खाडी से अरब सागर तक और दक्षिण मे नर्मदा तक फैला था। गुप्तकाल को भारतीय ज्ञान और अध्ययन के संदर्भ मे भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता है। इसके राज्य का नाम मगध और राजधानी पाटलिपुत्र थी, जिसे आज पटना कहते है। यहाँ पर अध्ययन का एक महान केन्द्र, नालन्दा विश्वविद्यालय स्थापित था और संभव है कि आर्यभट्ट इसके खगोल वेधशाला के कुलपति रहे हो। ऐसे प्रमाण है कि आर्यभट्ट-सिद्धान्त मे उन्होने ढेरो खगोलीय उपकरणो का वर्णन किया है।

आर्यभट्ट ने अपने खगोलीय संस्थापनाओं मे श्रीलंका का संदर्भ लिया है और आर्यभटीय मे बहुत से स्थानो पर इसका प्रयोग किया है। Florian Cajori के अनुसार आर्यभट्ट का गणित भारतीय गणित की तुलना मे श्रीलंकाई गणित के अधिक निकट है। [Florian Cajori (February 28, 1859 in St Aignan (near Thusis), Graubünden, Switzerland—August 15, 1930, Berkeley, California) was one of the most celebrated historians of mathematics in his day.]

आर्यभट के ग्रंथ का दक्षिण भारत में अधिक प्रचार रहा है और मलयालम लिपि में इस ग्रंथ की हस्तलिखित प्रतियां मिली हैं। इस आधार पर आर्यभट के कर्नाटक या केरल का निवासी होने की संभावना भी जताई जाती है। Institute of Reservoir Studies of Oil and Natural Gas Commission, Ahmedabad के वरिष्ठ भूवैज्ञानिक श्री के चन्द्र हरी का कहना है कि आर्यभट्ट वर्तमान केरल के उत्तरी तटीय प्रदेशो मे पोन्नणि नामक स्थान पर रहते थे। INSA द्वारा प्रकाशित A Concise History of Science in India मे भी यही दिया गया है। श्री हरी के अनुसार आर्यभटीय मे दिये गये गणनाओ के आधार पर आर्यभट्ट का स्थान आधुनिक पोन्नणि – चम्रवट्टम क्षेत्र ((latitude 10N51 and longitude 75E45) था। आर्यभट्ट द्वारा भूमध्य रेखा पर दिये गये पृथ्वी के परिधि के दो मान यह बताते है कि उनका अक्षांश 10N51 था, जहाँ भारतपुझा समुद्र मे मिलता है और उज्जैनी की मध्य रेखा केरल के तट को छूती है।

कृतियाँ

आर्यभट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है। दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। लेकिन जानकारों के अनुसार उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था- ‘आर्यभट्ट सिद्धांत‘। इस समय उसके केवल 34 श्लोक ही उपलब्ध हैं। उनके इस ग्रंथ का सातवे शतक में व्यापक उपयोग होता था। लेकिन इतना उपयोगी ग्रंथ लुप्त कैसे हो गया इस विषय में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती।

उन्होंने आर्यभटीय नामक महत्वपूर्ण ज्योतिष ग्रन्थ लिखा, जिसमें वर्गमूल, घनमूल, सामानान्तर श्रेणी तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का वर्णन है। उन्होंने अपने आर्यभट्टीय नामक ग्रन्थ में कुल 3 पृष्ठों के समा सकने वाले 33 श्लोकों में गणितविषयक सिद्धान्त तथा 5 पृष्ठों में 75 श्लोकों में खगोल-विज्ञान विषयक सिद्धान्त तथा इसके लिये यन्त्रों का भी निरूपण किया। आर्यभट्ट ने अपने इस छोटे से ग्रन्थ में अपने से पूर्ववर्ती तथा पश्चाद्वर्ती देश के तथा विदेश के सिद्धान्तों के लिये भी क्रान्तिकारी अवधारणाएँ उपस्थित की।

क्रमशः…

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मेण्डलीव की आवर्त सारणी में संस्कृत

यदि आप कभी विज्ञान के छात्र रहे है तो रासायनिक तत्वो की आवर्त सारणी के बारे मे अवश्य जानते होंगे| लेकिन क्या आप यह जानते है कि इसके रचयिता मेण्डलीव ने इसमे तत्वो के लिये संस्कृत शब्दो का प्रयोग किया है? है ना आश्चर्यजनक!

Medeleeff_by_repinपहले इस बात पर चर्चा करते है कि रासायनिक तत्वो की आवर्त सारणी है क्या? आवर्त सारणी अथवा तत्वों की आवर्त सारणी रासायनिक तत्वों को उनकी संगत विशेषताओं के साथ एक सारणी के रूप में दर्शाने की एक व्यवस्था है। वर्तमान आवर्त सारणी मै 117 ज्ञात तत्व सम्मिलित हैं। रूसी रसायन-शास्त्री मेंडलीफ (सही उच्चारण- मेन्देलेयेव) ने सन 1869 में आवर्त नियम प्रस्तुत किया। इसके अनुसार तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुण उनके परमाणुभारों के आवर्तफलन होते हैं। अर्थात यदि तत्वों को परमाणु भार के वृद्धिक्रम में रखा जाय तो वो तत्व जिनके गुण समान होते हैं एक निश्चित अवधि के बाद आते हैं। मेंडलीव ने इस सारणी के सहारे तत्वों के भौतिक एवं रासायनिक गुणों के आवर्ती होने के पहलू को प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया। 1815 से 1913 तक इसमें बहुत से सुधार हुए ताकि नये आविष्कृत तत्वों को उचित स्थान दिया जा सके और सारणी नयी जानकारियों के अनुरूप हो। रसायन शास्त्रियों के लिये आवर्त सारणी अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है। इसके कारण कम तत्वों के गुणधर्मों को ही याद रखने से काम चल जाता है क्योंकि आवर्त सारणी में किसी समूह (उर्ध्वाधर पंक्ति) या किसी आवर्त (क्षैतिज पंक्ति) में गुणधर्म एक निश्चित क्रम से एवं तर्कसम्मत तरीके से बदलते हैं।

तत्वों के परमाणु भार के वृद्धि क्रम में क्रमबद्ध करने पर क्षैतिज कतारें प्राप्त होती हैं जिन्हें आवर्त कहते हैं। आवर्त नियम के अनुसार तत्वों को परमाणु भार के वृद्धि क्रम में क्षैतिज कतारों में सजाने पर सामन गुण वाले तत्व एक ही उर्ध्वाधर कालम में उपस्थित रहते हैं। इन्हें उर्ध्वाधर कालम के वर्ग कहते हैं। मैंडलीफ की आवर्त सारणी में कुल 8 वर्ग थे क्योंकि उस समय निष्क्रिय गैसों की खोज नहीं हुई थी। बाद में निष्क्रिय गैसों की खोज के पश्चात आधुनिक आवर्त सारणी में 9वें वर्ग को सामिल किया गया। इस 9वें वर्ग को 0 (शून्य वर्ग) कहते हैं। वर्ग एक से आठवें वर्ग को रोमन अक्षर I, II, III, IV, V, VI, VII तथा VIII द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नवें वर्ग को 0 द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इसके विकास के अंतिम चरण में राग, वर्नर, बोहर और बरी आदि वैज्ञानिकों ने आवर्त सारणी का आधुनिकतम रूप बनाया जो वर्तमान तक चलन में है। इन्होंने मेंडेलिव की आवर्त सारणी में उपस्थित श्रेणियों को खत्म किया तथा वर्गो की संख्या को 9 से बढ़ाकर 18 किया। इसके बाद भी हाइड्रोजन का दो स्थानों पर होना और लेंथेनाइड और एक्टीनाइड तत्वों को सारणी में स्थान न होना दो मुख्य दोष अब तक हैं।

आइये देखते है मेण्डलीव द्वारा 1872 मे प्रस्तुत आवर्त सारणी को|
mendeleev's 2nd table

इस आवर्त सारणी मे कुछ स्थान खाली है| वस्तुतः ये स्थान नये तत्वो की भविष्यवाणी करते है| जैसे – गैलियम (gallium) और जर्मेनियम (germanium)| इन तत्वो की भविष्यवाणी मेण्डलीव ने 1869 मे की थी और 1875 और 1886 मे इन तत्वों की खोज की गयी| इन संभावित तत्वो को मेण्डलीव ने उनके उपर लिखे तत्वो के अनुसार नाम दिया| जैसे ग्रुप-3 मे बोरान के नीचे, संभावित तत्व को एक-बोरान (eka-boron), एलुमिनियम के नीचे संभावित तत्व को एक-एलुमिनियम (eka-alluminium) इत्यादि| मेण्डलीव ने कुल 8 तत्वो के लिये संस्कृत शब्दो का प्रयोग किया था|

Eka-aluminium (एक-एलुमिनियमम)  -  Gallium
Eka-boron(एक-बोरोन)  -  Scandium
Eka-silicon(एक-सिलिकान)  -  Germanium
Eka-manganese(एक-मैंगनीज)  -  Technetium
Tri-manganese(त्रि-मैंगनीज)  -  Rhenium
Dvi-tellurium(द्वि-टेल्लुरियम)  -  Polonium
Dvi-caesium(द्वि-कैस्मियम)  -  Francium
Eka-tantalum(एक-टेन्टेलम)  -  Pratactinium

केवल इतना ही नही, आवर्त सारणी कई दृष्टिकोणो से देवनागरी वर्णमाला से भी मिलती जुलती है| देवनागरी वर्णमाला नीचे दी गयी|

अ आ इ ई उ ऊ         a ā i ī u ū
ऋ ॠ ऌ ॡ             ŗi ŗī lŗi lŗī
ए ऐ ओ औ अं अ:      e ai o au am ah

क ख ग घ ङ           k kh g gh ṅ
च छ ज झ ञ           c ch j jh ñ
ट ठ ड ढ ण            ṭ ṭh ḍ ḍh ṇ
त थ द ध न           t th d dh n
प फ ब भ म           p ph b bh m
य र ल व              y  r  l   v
श ष स ह              ś  ş  s  h

सोलह वर्णो का प्रथम समूह “स्वर” कहलाता है, और बाकी के अक्षर “व्यंजन”| सभी स्वर कंठ से निकलते है| व्यंजनो को पुनः पाँच समूहो मे बाँटा गया है|

इस प्रकार देवनागरी वर्णमाला द्वि-आयामी व्यवस्था है, जिसमे प्रत्येक अक्षर अपने क्षैतिज समूह के अन्य अक्षरो के समान है, साथ ही साथ वह उर्ध्व रेखा मे, अन्य समूहो के अक्षरो के समान गुण प्रदर्शित करता है| जैसे ‘क’ के साथ ‘ह’ का उच्चारण करने पर वह ‘ख’ बनता है, और ‘च’ को ‘ह’ से मिलाने पर ‘छ’ बनता है, तथा वर्णमाला मे ‘ख’ और ‘छ’ ऊपर-नीचे है| ध्यान देने योग्य बात है कि संसार की अन्य वर्णमालाये रैखिक है, जैसे रोमन (A, B, ….Z)|

मेण्डलीफ की आवर्त सारणी भी द्वि-आयामी है| इसमे क्षैतिज समूह और उर्ध्व समूह दोनो है|

तो क्या मेण्डलीव को संस्कृत का ज्ञान था? यदि हाँ तो क्या इस भाषा के लिये इतना सम्मान था कि अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि मे भी इसे प्रदर्शित कर दिया?

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) के प्रोफेसर पॉल किपास्की (Paul Kiparsky) के अनुसार, मेण्डलीव एक संस्कृतविद बौदलिंक (Böhtlingk) के साथी एवं मित्र थे, जो कि उस समय पाणिनि पर अपनी पुस्तक (Otto Böhtlingk, Panini’s Grammatik: Herausgegeben, Ubersetzt, Erlautert und MIT Verschiedenen Indices Versehe. St. Petersburg, 1839-40) लिख रहे थे, और मेण्डलीफ ने पाणिनि को सम्मान देने की इच्छा से ही संभावित तत्वो को ऐसे नाम दिये|

पॉल किपास्की आगे मेण्डलीफ की सारणी और देवनागरी वर्णमाला मे समानता की भी बाते करते है| उनके शब्दो मे-

” [T]he analogies between the two systems are striking.  Just as Panini found that the phonological patterning of sounds in the language is a function of their articulatory properties, so Mendeleev found that the chemical properties of elements are a function of their atomic weights.  Like Panini, Mendeleev arrived at his discovery through a search for the “grammar” of the elements (using what he called the principle of isomorphism, and looking for general formulas to generate the possible chemical compounds).  Just as Panini arranged the sounds in order of increasing phonetic complexity (e.g. with the simple stops k,p… preceding the other stops, and representing all of them in expressions like kU, pU) so Mendeleev arranged the elements in order of increasing atomic weights, and called the first row (oxygen, nitrogen, carbon etc.)  “typical (or representative) elements”.  Just as Panini broke the phonetic parallelism of sounds when the simplicity of the system required it, e.g. putting the velar to the right of the labial in the nasal row, so Mendeleev gave priority to isomorphism over atomic weights when they conflicted, e.g. putting beryllium in the magnesium family because it patterns with it even though by atomic weight it seemed to belong with nitrogen and phosphorus.  In both cases, the periodicities they discovered would later be explained by a theory of the internal structure of the elements.”

किपास्की का यह भी कहना है कि सम्भवत: पाणिनि के “शिव-सूत्र” से प्रभावित हो कर तत्वो की दो-आयामी व्यवस्था का विचार उनके मन मे आया| हालांकि इस बात के संकेत नही है कि उन्हे संस्कृत भाषा का गहरा ज्ञान था| निश्चित रूप से यह केवल संस्कृत वर्णमाला के सारणिक रूप का प्रभाव था, क्योकि यह तो किसी भी नये विद्यार्थी को भी मालूम रहता है| संस्कृत वर्णमाला के सारणिक रूप के दो कारण है- कंठ और श्वास का प्रयोग, और मेण्डलीव ने इस बात को ध्यान दिया होगा कि रासायनिक बन्ध और परमाणु भार के आधार पर तत्वो की दो-आयामी सारणी बनायी जा सकती है|

इस सिद्धान्त को ध्यान मे रखकर सारणी बनाते समय, जो स्थान खाली रह गये, मेण्डलीव के अनुसार, उस पर निश्चित रूप से कोइ तत्व होना चहिये, जो कि उस समय खोजा नही गया था| इस प्रकार उन्होने 8 नये तत्वो की भविष्यवाणी की, और उनके नामो के लिये ‘एक’,'द्वि’, और ‘त्रि’ प्रत्यय का प्रयोग किया|

उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं शताब्दी के बहुत से यूरोपीय विद्वानो ने संस्कृत का अध्ययन किया था| बौदलिंक (Böhtlingk) भी उनमे से एक थे और मेण्डलीव के मित्र भी थे| मेण्डलीव St. Petersburg Academy of Sciences मे लेक्चर देते थे जब उन्हे उनकी पुस्तक “Organic Chemistry” के लिये Demidov prize दिया गया| बौदलिंक (Böhtlingk) उस पुरस्कार के नामांकन समिति के सदस्य थे|

सन्दर्भ-
Mendeleev and the Periodic Table of Elements by Subhash  Kak

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पाणिनि – व्याकरण के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार

“मैं निर्भय कह सकता हूँ कि अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके । इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 250,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है । …. अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक विश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके ।”

- प्रसिद्ध जर्मन भारतविद मैक्स मूलर (1823 – 1900), अपनी पुस्तक साइंस आफ थाट में|

केवल मैक्समूलर ही नही, बल्कि विश्व के अनेक विद्वानो ने धीरे धीरे यह मान लिया है कि संस्कृत का व्याकरण संसार की सभी भाषाओ के व्याकरण से श्रेष्ठ और त्रुटिहीन है| विश्व के इस सर्वोत्तम भाषा के महान व्याकरण की रचना पाणिनि ने की थी तथा ऐसी मान्यता है कि उन्होने भगवान शिव के डमरु से निकली ध्वनियो के आधार पर इसका निर्माण किया था| अब यह कहाँ तक सत्य है, यह तो नही मालूम, परन्तु केवल 14 मुख्यसूत्रो के आधार पर संसार के सर्वश्रेष्ठ व्याकरण की रचना करना एक अदभुत कार्य है| पाणिनि ने ध्वनि, उच्चारण, और शब्दो के निर्माण का विस्तृत और वैज्ञानिक सिद्धान्त दिया| संस्कृत भारत की प्राचीन साहित्यिक भाषा है और पाणिनि इसके संस्थापक माने जाते है| ध्यान देने योग्य यह बात है कि “संस्कृत” शब्द का अर्थ होता है- “पूर्ण” अथवा “त्रुटिहीन”, और इसे देवभाषा भी मानी जाती है|

30 अगस्त 2004, भारतीय डाक विभाग ने पाणिनि के सम्मान मे 5 रूपये का एक डाक टिकट किया था| Panini

पाणिनि का समयकाल अनिश्चित तथा विवादित है । कोई उन्हें 7वीं शती ई. पू., कोई 5वीं शती या चौथी शती ई. पू. का कहते हैं। इतना तय है कि छठी सदी ईसा पूर्व के बाद और चौथी सदी ईसापूर्व से पहले की अवधि में इनका अस्तित्व रहा होगा । इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है ।

पाणिनि के जीवनकाल को मापने के लिए यवनानी शब्द के उद्धरण का सहारा लिया जाता है । इसका अर्थ यूनान की स्त्री या यूनान की लिपि से लगाया जाता है । गांधार में यवनो (Greeks) के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी सिकंदर के आक्रमण के पहले नहीं थी । सिकंदर भारत में ईसा पूर्व 330 के आसपास आया था । पर ऐसा हो सकता है कि पाणिनि को फारसी यौन के जरिये यवनों की जानकारी होगी और पाणिनि दारा प्रथम (शासनकाल – 421 – 485 ईसा पूर्व) के काल में भी हो सकते हैं । प्लूटार्क के अनुसार सिकंदर जब भारत आया था तो यहां पहले से कुछ यूनानी बस्तियां थीं ।

इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि इनका जन्म पंजाब के शालातुला में हुआ था जो आधुनिक पेशावर (पाकिस्तान) के करीब है। जहाँ काबुल नदी सिंधु में मिली है उस संगम से कुछ मील दूर यह गाँव था। उसे अब लहर कहते हैं। अपने जन्मस्थान के अनुसार पाणिनि शालातुरीय भी कहे गए हैं। और अष्टाध्यायी में स्वयं उन्होंने इस नाम का उल्लेख किया है। चीनी यात्री युवान्च्वाङ् (Xuanxang), (7वीं शती) उत्तर-पश्चिम से आते समय शालातुर गाँव में गए थे, जहाँ पर उन्होने पाणिनि की मूर्ति स्थापित देखी| पंचतंत्र की एक कथा के अनुसार, एक शेर इनकी मृत्यु का कारण बना|

पाणिनि का समय वैदिक काल के अन्त मे था, ऐसा उनके द्वारा दिये गये व्याकरण को देख कर कहा जा सकता है| वैदिक ग्रन्थो मे छन्दो के रूप के लिये उन्होने कुछ विशेष नियम दिये थे, जो कि उस समय के सामान्य बोलचाल के भाषा मे प्रयुक्त नही होते थे| इस प्रकार हम कह सकते है कि वैदिक संस्कृत पहले से ही विद्यमान थी, परन्तु वह लोक भाषा नही थी| पाणिनि के गुरु का नाम उपवर्ष और माता का नाम दाक्षी था। पाणिनि जब बड़े हुए तो उन्होंने व्याकरणशास्त्र का गहरा अध्ययन किया। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। पाणिनि से पहले शब्दविद्या के अनेक आचार्य हो चुके थे। उनके ग्रंथों को पढ़कर और उनके परस्पर भेदों को देखकर पाणिनि के मन में वह विचार आया कि उन्हें व्याकरणशास्त्र को व्यवस्थित करना चाहिए। पहले तो पाणिनि से पूर्व वैदिक संहिताओं, शाखाओं, ब्राह्मण, आरण्यक्, उपनिषद् आदि का जो विस्तार हो चुका था उस वाङ्मय से उन्होंने अपने लिये शब्दसामग्री ली जिसका उन्होंने अष्टाध्यायी में उपयोग किया है। दूसरे निरुक्त और व्याकरण की जो सामग्री पहले से थी उसका उन्होंने संग्रह और सूक्ष्म अध्ययन किया। इसका प्रमाण भी अष्टाध्यायी में है, जैसा शाकटायन, शाकल्य, भारद्वाज, गाग्र्य, सेनक, आपिशलि, गालब और स्फोटायन आदि आचार्यों के मतों के उल्लेख से ज्ञात होता है।

पाणिनि ने सहस्रों शब्दों की व्युत्पत्ति बताई जो अष्टाध्यागी के चौथे पाँचवें अध्यायों में है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, सैनिक, व्यापारी किसान, रँगरेज, बढ़ई, रसोइए, मोची, ग्वाले, चरवाहे, गड़रिये, बुनकर, कुम्हार आदि सैकड़ों पेशेवर लोगों से मिलजुलकर पाणिनि ने उनके विशेष पेशे के शब्दों का संग्रह किया।

पाणिनि ने यह बताया कि किस शब्द में कौन सा प्रत्यय लगता है। वर्णमाला के स्वर और व्यंजन रूप जो अक्षर है उन्हीं से प्रत्यय बनाए गए। जैसे- वर्षा से वार्षिक, यहाँ मूल शब्द वर्षा है उससे इक् प्रत्यय जुड़ गया और वार्षिक अर्थात् वर्षा संबंधी यह शब्द बन गया।

अष्टाध्यायी में तद्वितों का प्रकरण रोचक है। कहीं तो पाणिनि की सूक्ष्म छानबीन पर आश्चर्य होता हैं, जैसे व्यास नदी के उत्तरी किनारे की बाँगर भूमि में जो पक्के बारामासी कुएँ बनाए जाते थे उनके नामों का उच्चारण किसी दूसरे स्वर में किया जाता था और उसी के दक्खिनी किनारे पर खादर भूमि में हर साल जो कच्चे कुएँ खोद लिए जाते थे उनके नामों का स्वर कुछ भिन्न था। यह बात पाणिनि ने “उदक् च बिपाशा” सूत्र में कही है। गायों और बैलों की तो जीवनकथा ही पाणिनि ने सूत्रों में भर दी है।

आर्थिक जीवन का अध्ययन करते हुए पाणिनि ने उन सिक्कों को भी जाँचा जो बाजारों में चलते थे। जैसे “शतमान”, “कार्षापण”, “सुवर्ण”, “अंध”, “पाद”, “माशक” “त्रिंशत्क” (तीस मासे या साठ रत्ती तौल का सिक्का), “विंशतिक” (बीस मासे की तोल का सिक्का)। कुछ लोग अबला बदली से भी माल बेचते थे। उसे “निमान” कहा जाता था।

पाणिनि के काल में शिक्षा और वाङ्मय का बहुत विस्तार था। संस्कृत भाषा का उन्होंने बहुत ही गहरा अध्ययन किया था। वैदिक और लौकिक दोनों भाषाओं से वे पूर्णतया परिचित थे। उन्हीं की सामग्री से पाणिनि ने अपने व्याकरण की रचना की पर उसमें प्रधानता लौकिक संस्कृत की ही रखी। बोलचाल की लौकिक संस्कृत को उन्होंने भाषा कहा है। उन्होंने न केवल ग्रंथरचना को किंतु अध्यापन कार्य भी किया। (व्याकरण के उदाहरणों में उनके विषय का नाम कोत्स कहा है)। पाणिनि का शिक्षा विषयक संबंध, संभव है, तक्षशिला के विश्वविद्यालय से रहा हो। कहा जाता है, जब वे अपनी सामग्री का संग्रह कर चुके तो उन्होंने कुछ समय तक एकांतवास किया और अष्टाध्यायी की रचना की।

ऐसा माना जाता है कि पाणिनि ने लिखने के लिए किसी न किसी माध्यम का प्रयोग किया होगा क्योंकि उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द अति क्लिष्ट थे तथा बिना लिखे उनका विश्लेषण संभव नहीं लगता है । कई लोग कहते है कि उन्होंने अपने शिष्यों की स्मरण शक्ति का प्रयोग अपनी लेखन पुस्तिका के रूप में किया था । भारत में लिपि का पुन: प्रयोग (सिन्धु घाटी सभ्यता के बाद) ६ठी सदी ईसा पूर्व में हुआ और ब्राह्मी लिपि का प्रथम प्रयोग दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हुआ जो उत्तर पश्चिम भारत के गांधार से दूर था। गांधार में ६ठी सदी ईसा पूर्व में फारसी शासन था और ऐसा संभव है कि उन्होने आर्माइक वर्णों का प्रयोग किया होगा ।

पतंजलि ने लिखा है कि पाणिनि की अष्टाध्यायी का संबंध किसी एक वेद से नहीं बल्कि सभी वेदों की परिषदों से था (सर्व वेद परिषद)। पाणिनि के ग्रंथों की सर्वसम्मत प्रतिष्ठा का यह भी कारण हुआ।

पाणिनि को किसी मतविशेष में पक्षपात न था। वे बुद्ध की मज्झिम पटिपदा या मध्यमार्ग के अनुयायी थे। शब्द का अर्थ एक व्यक्ति है या जाति, इस विषय में उन्होंने दोनों पक्षों को माना है। गऊ शब्द एक गाय का भी वाचक है और गऊ जाति का भी। वाजप्यायन और व्याडि नामक दो आचार्यों में भिन्न मतों का आग्रह या, पर पाणिनि ने सरलता से दोनों को स्वीकार कर लिया।

पाणिनि से पूर्व एक प्रसिद्ध व्याकरण इंद्र का था। उसमें शब्दों का प्रातिकंठिक या प्रातिपदिक विचार किया गया था। उसी की परंपरा पाणिनि से पूर्व भारद्वाज आचार्य के व्याकरण में ली गई थी। पाणिनि ने उसपर विचार किया। बहुत सी पारिभाषिक संज्ञाएँ उन्होंने उससे ले लीं, जैसे सर्वनाम, अव्यय आदि और बहुत सी नई बनाई, जैसे टि, घु, भ आदि।

पाणिनि को मांगलिक आचार्य कहा गया है। उनके हृदय की उदार वृत्ति मंगलात्मक कर्म और फल की इच्छुक थी। इसकी साक्षी यह है कि उन्होंने अपने शब्दानुशासन का आरंभ “वृद्ध” शब्द से किया। कुछ विद्वान् कहते हैं कि पाणिनि के ग्रंथ में न केवल आदिमंगल बल्कि मध्यमंगल और अंतमंगल भी है। उनका अंतिम सूत्र अ आ है। ह्रस्वकार वर्णसमन्वय का मूल है। पाणिनि को सुहृद्भूत आचार्य अर्थात् सबके मित्र एवं प्रमाणभूत आचार्य भी कहा है।

पंतजलि का कहना है कि पाणिनि ने जो सूत्र एक बार लिखा उसे काटा नहीं। व्याकरण में उनके प्रत्येक अक्षर का प्रमाण माना जाता है। शिष्य, गुरु, लोक और वेद धातुलि शब्द और देशी शब्द जिस ओर आचार्य ने दृष्टि डाली उसे ही रस से सींच दिया। आज भी पाणिनि “शब्द:लोके प्रकाशते”, अर्थात् उनका नाम सर्वत्र प्रकाशित है। यदि महर्षि पाणिनि न होते तो दुनिया की किसी भी भाषा कोई बड़ा लेखक नहीं हो पाता। महर्षि पाणिनि ने ही भाषा की शुद्घता की जिस परंपरा को स्थापित किया, उसीका अनुरण आज दुनिया भर की भाषाओं में हो रहा है। संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है और भाषा विज्ञान की उत्पत्ति भी संस्कृत से ही हुई है।

कृतियां
पाणिनि का संस्कृत व्याकरण चार भागों में है -

माहेश्वर सूत्र – स्वर शास्त्र
अष्टाध्यायी – शब्द विश्लेषण
धातुपाठ – धातुमूल (क्रिया के मूल रूप)
गणपाठ
पतञ्जलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर अपनी टिप्पणी लिखी जिसे महाभाष्य का नाम दिया (महा+भाष्य(समीक्षा,टिप्पणी,विवेचना,आलोचना))

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