आर्यभट्ट का खगोल ज्ञान
“आर्यभट्ट ने अंतरिक्ष मे ग्रहो की स्थिति का एक व्यवस्थित तरीका दिया। उन्होने पृथ्वी की परिधि 4967 योजन और व्यास 1581 1/24 योजन बताया। चूंकि 1 योजन = 5 मील, अतः इस प्रकार परिधि 24835 मील हुयी, जो कि वर्तमान मे स्वीकार्य मान 24902 मील के बहुत निकट है। उनका विश्वास था कि स्वर्ग (आकाश/अंतरिक्ष) की आभासी गति पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने के कारण होती है। यह सौरमण्डल का बहुत ही मुख्य गुण है जिसे बाद के टिप्पणीकारो ने अनुसरण योग्य नही समझा और कुछ ने तो इसे आर्यभट्ट को उनकी इस कथित गलती से बचाने के लिये उनके लिखे को भी बदल दिया।
आर्यभट्ट ने ग्रहो की कक्षाओ की त्रिज्याओ को भी पृथ्वी/सूर्य के कक्षा के त्रिज्या के पदो मे निकाल। उनका विश्वास था कि चन्द्रमा और ग्रह परावर्तित सूर्य-किरणो के कारण चमकते है, आश्चर्यजनक रूप से उन्हे विश्वास था कि ग्रहो की कक्षाये दीर्घवृत्त होती है। उन्होने सूर्य और चन्द्र ग्रहण के कारणो की एकदम सही सही व्याख्या की। उस समय तक भारतीय विश्वास यह था कि ग्रहण एक दैत्य राहु के कारण होता है। एक वर्ष का काल उन्होने 365 दिन 6 घण्टे 12 मिनट और 30 सेकेण्ड जो कि अधिगणना थी क्योकि वास्तविक मान 365 दिन 6 घण्टे से कम है।”
–J J O’Connor and E F Robertson
आर्यभट्ट, जिन्हे अरबो ने आर्जबह्र (ARJABAHR) कहा, की मुख्य रचना आर्यभटीय है, जिसका लैटिन अनुवाद 13वीं शताब्दी (आर्यभट्ट के मृत्यु के 700 वर्षो के बाद) मे किया गया। इस पुस्तक मे त्रिभुज का क्षेत्रफल, गोले (sphere) के पृष्ठ का क्षेत्रफल और आयत निकालने की विधियाँ दी गयी है, और साथ ही साथ वर्गमूल और घनमूल निकालने की भी विधियाँ दी गयी है| आर्यभट्ट द्वारा दी गयी ग्रहण की व्याख्या, और ग्रहो और चन्द्रमा के चमकने का कारण यूरोपीय खगोलशास्त्रियो को आकर्षित नही कर सका, और कापरनिकस और गैलीलियो के स्वतंत्र अध्ययनो के बाद ही पाश्चात्य जगत ने इसे माना|
आर्यभट्ट के विलक्षण खगोल ज्ञान ने कई ऐसे सिद्धान्तो को बहुत पहले ही बता दिया, जिसे यूरोप और बाकी संसार ने शताब्दियों बाद जाना| उनके खगोल सिद्धान्त को औदायक सिद्धान्त (दिनो को, लंका के नीचे, भूमध्य रेखा के पास, उनके उदय के अनुसार लिया गया था) कहा गया है। हालांकि उनके कुछ कार्यो मे प्रदर्शित एक दूसरा सिद्धान्त, अर्द्धरात्रिका, नष्ट हो चुकी है, परन्तु, इसे ब्रह्मगुप्त के खन्डखाद्यक से पुनः निकाला जा सकता है। अपने कुछ लेखो मे वह पृथ्वी के सापेक्ष स्वर्ग की आभासी गति का वर्णन करते दिखायी पडते है।
कुछ प्रमुख खगोल ज्ञान, आर्यभट्ट के द्वारा-
पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष पर घूमती है|
पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष के सापेक्ष घूमती है। यह सिद्धान्त आर्यभट्ट ने सबसे पहले दिया। आर्यभटीय के 4.9वें श्लोक मे आर्यभट्ट ने स्पष्ट लिखा है- कि जैसे गतिमान नाव मे बैठे मनुष्य को नदी का स्थिर किनारा और अन्य वस्तुये गतिमान दिखायी पड़ते है, ठीक उसी प्रकार लंका (भूमध्य रेखा) के मनुष्यो को स्थिर तारे हमे गतिमान दिखायी पड़ते है।
आर्य४.९क/ अनुलोम-गतिस् नौ-स्थस् पश्यति अचलम् विलोम-गम् यद्-वत्/
आर्य४.९ग/ अचलानि भानि तद्-वत् सम-पश्चिम-गानि लङ्कायाम्//
एक अन्य श्लोक मे तो वह पृथ्वी का कोणीय वेग (angular velocity) भी बताते है- 1 मिनट का चाप (ark) प्रति प्राण (prana) (एक प्राण=4 seconds)। लंका को यहां संदर्भ बिन्दु (reference point) लिया गया है, जिसे कि खगोलीय गणनाओं के लिये संदर्भ याम्योत्तर रेखा (reference meridian) माना गया।
यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि आर्यभट्ट ने ग्रहों की कक्षीय अथवा दीर्घवृत्तीय गति का बिलकुल भी उल्लेख नही किया| आर्यभट्ट ने पृथ्वी केन्द्रित सौर मण्डल का सिद्धान्त दिया। उनके अन्य श्लोको (3.15 और 4.6) मे ऐसे संकेत मिले है जिसके अनुसार पृथ्वी अंतरिक्ष के केन्द्र मे स्थित है , और सभी ग्रहो की कक्षाये पृथ्वी के चारो ओर है और उनका क्रम इस प्रकार है- सूदूर तारो की पट्टी, शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्रमा, और पृथ्वी| इस सिद्धान्त , जो कि पैतामसिद्धान्त (c.a. AD 425) मे भी मिलता है, के अनुसार ग्रहो की गति दो अधिचक्रो (epicycle) से निर्देशित होती है- एक लघु – मन्द अधिचक्र, और दूसरा, दीर्घ – शीघ्र अधिचक्र।
यह उल्लेखनीय है इस प्रकार के सापेक्षिक गति के विचार अन्य सभ्यताओ मे भी मिले हैं| चीनी संदर्भ मे पृथ्वी के कक्षीय गति के बारे मे कहा गया है- “पृथ्वी .. सदा गतिमान है और स्थिर नही है, जिस प्रकार एक मनुष्य, जो कि एक नाव मे बैठा होता है| नाव, मनुष्य की जानकारी के बिना चलती है| (Shang-shu K’ao-ling-yao)” (Originally from German book given in E. Eberhard, Das Astronotllische Weltbild im Alten China, Die Naturwissenschaften 24 (1936), 517-519.)
O. Neugebauer के अनुसार Cleomedes, (writing in 370 ± 50 B.C.) ने ग्रहो की गति की तुलना गतिमान नाव पर बैठे मनुष्य अथवा के एक कुम्हार के घूमते हुये चाक पर बैठे एक चींटी से गति से किया है| (O. Neugebauer, A History of Ancient Mathematics. Astronomy in three parts, Springer Verlag, Berlin, 1975.) कुछ इसी प्रकार की समानताये ब्रह्मगुप्त ने भी उल्लिखित की जिसे अल्-बरूनी ने अनूदित किया- “..लेकिन ग्रह बहुत धीमी गति से पूर्व की ओर गतिमान रहते है, जैसे कुम्हार के चाक पर एक धूल के कण चाक की उल्टी दिशा मे गतिमान रहता है| इस कण की गति, जो कि दिखायी देती है, चाक की गति के बराबर ही दिखायी देती है, जबतक यह कण कुछ अलग (निरपेक्ष) गति प्राप्त नही करता है| इस दृष्टिकोण से लता, आर्यभट्ट और वशिष्ठ सहमत है, परन्तु कुछ लोग सोचते है कि पृथ्वी (सूर्य के चारो ओर) घूमती है और सूर्य स्थिर है|”
ग्रहो की सापेक्ष गति का यह सिद्धान्त आर्यभट्ट के बाद के बहुत से भारतीय विद्वानो द्वारा ही नकार दिया गया| कुछ तो उनके पुस्तको को विरोधाभासो की ओर ले गये और विवादित किया| सम्भवतः यही कारण हे कि आर्यभट्ट के ग्रहीय घूर्णन के सिद्धान्त का, ग्रहो के कक्षीय गति के सिद्धान्त की ओर पर्याप्त विकास नही हो सका, जैसा कि 15/16 सदी मे युरोप मे कॉपरनिकस (Copernicus) द्वारा किया गया|
सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण
प्राचीनकाल मे प्रत्येक वह प्राकृतिक क्रिया जो कि मनुष्य के समझ से परे होती थी, चमत्कारिक मान ली जाती थी, और उसके साथ कुछ मिथक भी जोड दिये जाते थे| ग्रहण के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ| चन्द्रमा की कक्षा के दो काल्पनिक बिन्दुओं, जहाँ पर सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होता प्रतीत होता था, को राहु और केतु नाम के दैत्य माने गये, जो कि, मिथक कथाओ के अनुसार, अमर है, और सूर्य और चन्द्रमा को खाकर ग्रहण करता है| आर्यभट्ट ने इस कपोल-कल्पना को शुद्ध-वैज्ञानिक व्याख्या से गलत सिद्ध किया|
आर्यभट्ट ने बताया कि वस्तुतः सूर्य के प्रकाश से चमकता है और जब उसे यह प्रकाश नही मिलता है तो वह नही दिखायी देता है| आर्यभटीय के चौथे अध्याय के आरम्भिक कुछ श्लोको मे छाया,जो कि पृथ्वी, चन्द्रमा और अन्य ग्रहो पर पड़ती है, का सिद्धान्त दिया गया है| 37वें श्लोक मे वह लिखते है कि जब चन्द्रमा पृथ्वी की छाया मे आ जाता है तो चन्द्रग्रहण होता है|
आर्य४.३७क/ चन्द्रस् जलम् अर्कस् अग्निस् मृद्-भू-छाया अपि या तमस् तत् हि/
आर्य४.३७ग/ छादयति शशी सूर्यम् शशिनम् महती च भू-छाया//
आगे के श्लोको (38-48) मे वह इस छाया का व्यास और लम्बाई, ग्रहण का आरम्भिक समय और काल, और सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहण हुए भाग को निकालने के लिये सूत्र भी देते है|
ग्रहण के इस सिद्धान्त का बाद के भारतीय खगोल विज्ञानियो द्वारा विस्तार किया गया| एक फ्रांसीसी खगोल विज्ञानी Guillaume le Gentil ने भी इसकी पुष्टि की है| उन्हे फ्रांसीसी राजा द्वारा 1761 मे पाण्डिचेरी भेजा गया था, शुक्र के संक्रमण(transit) का अध्ययन करने के लिये| हालांकि वह 1761 और 1769 दोनो मे असफल रहा, और पुनः 8 साल प्रतीक्षा के बाद Mauritius और Madagascar मे सफलता मिली| Le Gentil द्वारा 30 अगस्त 1765 के चन्द्रग्रहण के वर्णन के अनुसार भारतीय (तमिल) खगोल विज्ञान के विधियो से निकाला गया ग्रहण का समय और वास्तविक समय मे केवल 41 second का अन्तर था, जो कि बहुत कम है, जबकि Tobias Mayer(1752) की विधि से यह अन्तर 68 second मिलता है| निश्चित रूप से भारतीय गणना अधि शुद्ध है| हालांकि ग्रहण का पूरा काल निकालने के लिये Tobias Mayer की सूची अधिक योग्य सिद्ध हुई|
आर्यभट्ट के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 Kms है जो कि वास्तविक मान 40,075.0167 Kms से केवल 0.2% कम है, जबकि ग्रीक गणितज्ञ Eratosthenes (c. 200 BCE) की गणना मे 5-10% की त्रुटि थी|
आकाशीय पिण्डो का परिक्रमा और घूर्णन काल-
आर्यभट्ट ने पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन काल (स्थिर तारो के सापेक्ष) 23 घण्टे 56 मिनट और 4.1 सेकेण्ड निकाला, जो कि वास्तविक मान (23:56:4.091) के लगभग बराबर ही है| इसी प्रकार एक वर्ष, आर्यभट्ट के अनुसार, 365 दिन 6 घण्टे 12 मिनट और 30 सेकेण्ड का होता है| यह भी वास्तविक मान से केवल 3 मिनट 20 सेकेण्ड अधिक है| हालांकि इस प्रकार के अनुमान अन्य खगोलशास्त्रियो ने भी किये थे, परन्तु आर्यभट्ट की गणना सर्वशुद्ध थी|
… क्रमशः
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कितना तेजोमय और प्रबल वर्णन है यह आर्यभट्ट और खगोल विज्ञान मे उनके योगदान का! जब समस्त संसार अभी गिनती भी नहीं सीख पाया था, तभी इस महान व्यक्ति ने ब्रह्माण्ड के रहस्यो को खोलना आरम्भ कर दिया था। गणित और खगोल विज्ञान मे इनके कार्यो ने विश्व को एक दिशा दी। इन्हे सम्मान देने के लिये, भारत ने अपने प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम इन्ही के नाम पर “आर्यभट्ट” रखा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र (ISRO) द्वारा निर्मित इस उपग्रह को 19 अप्रैल 1975 को सोवियत यूनियन (अब संयुक्त राज्य रूस, USR) के कापुस्तिन यार (Kapustin Yar) से कास्मोस – 3M (Cosmos-3M) नामक लांच व्हीकल (launch vehicle) से छोडा गया था और 11 फरवरी 1992 को यह वापस पृथ्वी के वायुमण्डल मे आ गया।