दुनिया को तब गिनती आयी…
“The ingenious method of expressing every possible number using a set of ten symbols (each symbol having a place value and an absolute value) emerged in India. The idea seems so simple nowadays that its significance and profound importance is no longer appreciated. It’s simplicity lies in the way it facilitated calculation and placed arithmetic foremost amongst useful inventions.”
– Laplace, French mathematician.
लाप्लास का यह कथन कितना तर्कसंगत लगता है जब हम वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति को देखते हैं| गणित और विज्ञान के वर्तमान स्वरूप की कल्पना शून्य के बिना असंभव है| सत्य ही कहा है-
“जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आयी|”
भारत मे शून्य का प्रथम वास्तविक प्रमाण 876 AD के एक मन्दिर के शिलालेख मे मिलता है| यह शिलालेख ग्वालियर के चतुर्भुज मन्दिर मे मिला है| यहाँ पर 187 गुणे 270 हस्त का एक बागीचा लगाया गया था, जिससे 50 पुष्पमालाये प्रतिदिन मन्दिर को भेजी जाती थी| शिलालेख पर 270 और 50 (२७० और ५०) लगभग उसी प्रकार से लिखे गये है जिस प्रकार आज लिखे जाते है|
परन्तु ऐसा नही है की 876 AD मे शून्य का प्रथम प्रयोग किया गया हो| शून्य के संदर्भ मे सबसे प्राचीन एक जैन पुस्तक “लोकविभाग” (458 BC) मानी जाती है| इसमे संख्याओं के लिये संस्कृत के शब्दो का प्रयोग किया गया था| कुछ अन्य प्राचीन भारतीय पाण्डुलिपियों मे शून्य के लिये बिन्दु के प्रयोग के भी प्रमाण मिले है, परन्तु उन्ही पाण्डुलिपियो मे अज्ञात के लिये भी बिन्दु का प्रयोग किया गया है| आर्यभट्ट वह प्रथम गणितज्ञ थे जिन्होने शून्य का गणित मे व्यापक प्रयोग किया| लगभग 498 AD मे आर्यभट्ट ने विश्व को दाशमिक संख्या पद्धति दी| वे लिखते है- “स्थानम स्थानम दश गुणम्|” इसमे उन्होने शून्य के लिये एक शब्द “ख” का प्रयोग किया था|
परन्तु कथानक यहीं समाप्त नही होता है| अभी तो शून्य का गणित विकसित करना बाकी था| गणित मे शून्य एक संख्या है, तथा दाशमिक संख्या पद्धति का आधार है, परन्तु इसके गणितीय गुणो की विवेचना अभी बाकी थी| शून्य के साथ साथ ऋणात्मक संख्याओ के गणित के विकास मे तीन गणितज्ञो ने प्रमुख योगदान दिया| वे थे- ब्रह्मगुप्त, महावीर, और भास्कर|
ब्रह्मगुप्त ने 628 AD मे लिखित अपने पुस्तक “ब्रह्मगुप्त सिद्धांत” मे अंकगणित के कुछ नियम दिये गये है| वे कहते है कि किसी संख्या को उसी संख्या से घटाने पर शून्य मिलता है| शून्य से संबन्धित योग के लिये निम्नलिखित नियम देते है-
शून्य और एक ऋणात्मक संख्या का योग एक ऋणात्मक संख्या होती है| शून्य और एक धनात्मक संख्या का योग एक धनात्मक संख्या होती है| शून्य और शून्य का योग शून्य होता है|
घटाने की क्रिया थोड़ी जटिल है-
किसी ऋणात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर धनात्मक संख्या मिलती है| किसी धनात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर ऋणात्मक संख्या मिलती है| किसी ऋणात्मक संख्या से शून्य को घटाने पर वही ऋणात्मक संख्या मिलती है| किसी धनात्मक संख्या से शून्य को घटाने पर वही धनात्मक संख्या मिलती है| शून्य से शून्य को घटाने पर शून्य मिलता है| एक धनात्मक और ऋणात्मक संख्या का योग उनके अन्तर के बराबर होता है, और यदि उन संख्याओं का निरपेक्ष मान बराबर हो तो योग शून्य होता है|
ब्रह्मगुप्त आगे बताते है -
किसी संख्या को शून्य से गुणा करने पर शून्य मिलता है|
परन्तु भाग की क्रिया थोड़ी जटिल है-
किसी धनात्मक अथवा ऋणात्मक संख्या को शून्य से भाग देने पर एक भिन्न संख्या (fractional number) मिलती है जिसका हर (denominator) शून्य होता है| शून्य को किसी धनात्मक अथवा ऋणात्मक संख्या से भाग देने पर निष्कर्ष शून्य अथवा एक भिन्न संख्या होती है जिसका अंश (numerator) शून्य और हर (denominator) वह संख्या होती है| शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य मिलता है|
निस्सन्देह ब्रह्मगुप्त भाग कि क्रियाओं मे थोड़े भ्रमित थे, परन्तु उनका प्रयास सराहनीय था| वह पहले ऐसे गणितज्ञ थे जिसने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं का अंकगणित प्रस्तुत किया|
ब्रह्मगुप्त से लगभग 200 वर्षो के बाद, 830 AD मे भारतीय गणितज्ञ महावीर ने “गणित सार-संग्रह “ लिखा| यह पुस्तक ब्रह्मगुप्त सिद्धांत का ही एक विकसित रूप लगती है| महावीर यहाँ स्पष्टतः लिखते है-
…किसी संख्या को शून्य से गुणा करने पर शून्य प्राप्त होता है, किसी संख्या से शून्य घटाने पर वह अपरिवर्तित रहती है|
हालांकि ब्रह्मगुप्त की कमियों को दूर करने मे वह असफल रहे है-
किसी संख्या को शून्य शून्य से भाग देने पर वह अपरिवर्तित रहती है|
ब्रह्मगुप्त से लगभग 500 वर्षो के बाद भास्कर भी शून्य के बारे मे बहुत कुछ सिद्धान्त देते है, परन्तु इतना समय बीत जाने पर भी वह शून्य से भाग देने की क्रिया को नही समझा पाये| वह लिखते हैं-
“किसी संख्या को शून्य से भाग देने पर एक भिन्न संख्या (fractional number) मिलती है जिसका हर (denominator) शून्य होता है| इस भिन्न संख्या को अनंत कहा जाता है| शून्य को हर के स्थान पर रखने वाली यह संख्या इसमे से कुछ भी निकाले या इसमे कुछ भी जोड़े जाने पर भी अपरिवर्तनीय है, ठीक उसी प्रकार जैसे इस संसार के निर्माण और नष्ट होने से उस अनंती ईश्वर पर कोई प्रभाव नही पड़ता है|”
इस प्रकार भास्कर ने इस समस्या को n/0 = ∞ लिख कर हल करने का प्रयास किया| परन्तु हम जानते है कि यह भी सही नही है| वस्तुतः n/0 अपरिभाषित है, किसी भी संख्या को शून्य से भाग नही दिया जा सकता| हालांकि भास्कर ने शून्य के अन्य गुणो को ठीक लिखा है, जैसे- 0X0 = 0, और √0 = 0
भारतीयो का यह उद्दीप्त कार्य मुस्लिम और अरबी गणितज्ञो ने संसार मे पहुँचाया | 9वीं शताब्दी मे एक पारसी गणितज्ञ मुहम्मद इब्न् मूसा अल्-ख़्वारिज़्मी ने एक पुस्तक Algoritmi de numero Indorum (“al-Khwārizmī on the Hindu Art of Reckoning”) लिखी जिसमे उसने दस प्रतीको 1,2,3,4,5,6,7,8,9 और 0 पर आधारित भारतीय स्थान-मान संख्या-पद्धति का वर्णन किया था| आज जहाँ पर इराक है, वहाँ पर इसी पुस्तक ने शून्य का प्रयोग शुरु किया| इस पुस्तक का यह नाम इटली के एक इतिहासकार Baldassarre Boncompagni द्वारा दिया गया, मूल अरबी नाम संभवतः “किताब्-अल्-ज़ाम्-व्-ल्-तफरीक़ बी-हिसाब् अल्-हिन्द्” (“The Book of Addition and Subtraction According to the Hindu Calculation”) था| 12वीं शताब्दी मे अब्राहम-बेन्-मीर्-इब्न इर्ज़ा ने भारतीय अंको और दाशमिक भिन्न संख्याओ पर तीन पुस्तके लिखी जिसने युरोप के विद्वानो का ध्यान भी आकर्षित किया| The Book of the Number मे पूर्णांको के लिये बांये से दांये स्थान-मान संख्या-पद्धति का वर्णन किया गया है| इब्न इर्ज़ा ने इस पुस्तक मे शून्य को गलगल कहा है, जिसका अर्थ होता है वृत्त| कुछ समय पश्चात 12वीं शताब्दी मे ही एक अरबी गणितज्ञ इब्न्-याह्या अल्-मग़रीबी अल्-समवाल ने बीजगणित की एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था- अल्-बहिर् फि-ल्-जब्र (The brilliant in algebra)| इसमे शून्य के बारे मे विस्तार से चर्चा की गयी है|
भारतीय गणित पश्चिम मे इस्लामिक देशो के साथ-साथ पूर्व मे चीन मे भी फैली| 1247AD मे चीनी विद्वान चिन् चियु-शाउ ने अपनी पुस्तक Shushu Jiuzhang (Mathematical Treatise in Nine Sections) मे शून्य के लिये O का प्रयोग किया है|
भारतीय गणित को यूरोप मे पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य प्रसिद्ध इटैलियन गणितज्ञ लियोनार्दो पिसानो फिबोनक्कि (Leonardo Pisano Fibonacci) ने किया| 1202 AD मे लिखी अपनी पुस्तक “लिबर अबेकि” (Liber abaci) मे फिबोनक्कि ने दसो भारतीय अंको (1, 2, …9 और 0 ) का प्रयोग किया है| गौरतलब है कि फिबोनक्कि ने 1,2,3,4,5,6,7,8,9 को अंक कहा है, परन्तु 0 को केवल एक प्रतीक|
पूरे संसार के लोग ध्यान देते गये और इस प्रकार धीरे धीरे पूरे संसार मे भारतीय संख्या पद्धति अपना ली गयी| आज भी संख्याओं पर भारतीय प्रभाव देखा जा सकता है| भारतीय अंको और वैश्विक अंको मे समानता स्पष्ट दिखती है| १ = 1, २ = 2, ३ = 3, ६ = 6, ० = 0| नीचे दी गयी सूची मे संस्कृत्, लैटिन्, इटैलियन और फ्रेन्च संख्याये तुलनात्मक रूप से लिखे है|

स्पष्ट है कि लैटिन शब्दो को संस्कृत से ही लिया गया है| यहाँ तक कि संख्याओं का क्रम भी अपरिवर्तित रहता है| अंग्रेजी का शब्द ज़ीरो (zero) भी संस्कृत से ही लिया गया है| संस्कृत मे इसे शून्य कहते है, अरबी मे अशिफ्र् (बाद मे शिफ्र् sifra) कहा जाने लगा| लैटिन मे सिफ्र (cifra), तत्पश्चात इटैलियन मे ज़ेफिरो (zefiro), ज़ेफ्रो (zefro), और बाद मे ज़ेवेरो (zevero) कहा जाने लगा, और अन्त मे अंग्रेजी मे ज़ीरो (zero)|
कुछ वर्षो पहले नयी सहस्त्राब्दि की शुरुआत 1 जनवरी 2000 को मनायी गयी| इसे देख कर लगता है कि संसार को अभी भी शून्य पूरी तरह से समझ नही आया है| 31 दिसम्बर 1999 की रात 12 बजे इसवी कैलेण्डर के 1999 वर्ष पूरे हुये| 2000 वर्ष तो 31 दिसम्बर 2000 को पूरे हुये थे| तो नयी सहस्त्राब्दि की शुरुआत 1 जनवरी 2000 को नही बल्कि 1 जनवरी 2001 को हुयी थी|
Ref:
http://www-history.mcs.st-andrews.ac.uk/HistTopics/Zero.html
http://en.wikipedia.org/wiki/0_(number)
http://www.timelineindex.com/content/view/1452
http://mathforum.org/k12/mayan.math/
http://mathforum.org/k12/mayan.math/mayan2.html
http://mathforum.org/k12/mayan.math/mayan3.html
http://en.wikipedia.org/wiki/Numeral_system
http://en.wikipedia.org/wiki/Al-Khwarizmi#Arithmetic
http://en.wikipedia.org/wiki/Abraham_ibn_Ezra
http://www.gap-system.org/~history/Mathematicians/Ezra.html
http://en.wikipedia.org/wiki/Al-Samawal
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