हार्दिक स्वागत है आपका चर्चा मंच पर। यह मंच समर्पित है भारत चर्चा को। भारत से सम्बन्धित किसी भी विषय पर आपके विचार चर्चा के लिये आमन्त्रित हैं। भारत विश्व की सर्वाधिक धनी और प्राचीन सभ्यता का स्थान है, जिसका अस्तित्व सदियो तक रहा है, तथा जिसके प्रमाण हमे आज भी मिलते हैं। प्राचीन भारत को विश्व ज्ञान गुरु कहा जाता है। गणित और विज्ञान की कई विधाओं की जन्म-स्थली है यह भूमि। इस मंच पर आप भारत के स्वर्णिम इतिहास के बारे मे अपने विचार रख सकते हैं। भारत तो अनगिनत विविधताओ से भरा देश है। इसे पूर्णतः जानना तो असंभव प्रतीत होता है, परन्तु एक प्रयास तो हम कर ही सकते हैं। हमारे इस प्रयास मे अपना योगदान दीजिए।

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शुल्व सूत्र – गणित के अर्वाचीन सूत्र

शुल्व सूत्र हिंदू धार्मिक दस्तावेज़ों का एक संग्रह है, जिसे 800 BCE के बीच 200 BCE लिखा गया। यह पुस्तके गणितीय रुप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। कई विद्वानों का विश्वास है कि ये गणित की सबसे पुरानी पुस्तके हैं। इन पुस्तको मे बहुत से गणितीय सिद्धांत है जो कि हमे बताते है कि प्राचीन भारत में गणित अन्य प्राचीन संस्कृति से भी ज़्यादा अग्रिम था। यहाँ तक कि शुल्व सूत्र में लिखे कुछ प्रमेयो का यूरोपियो द्वारा कई शताब्दियों के बाद आविष्कार किया जा सका।

प्राचीन संस्कृतियों में गणित का प्रारंभिक विकास धार्मिक प्रथाओं और त्योहारो के कारण आवश्यक हो गया था। लोगों को बलि या पूजा के कृत्यों के लिए और कुछ त्योहारों के शुभ समय के सटीक गणना की आवश्यकता थी। उन्हे सूरज और चाँद की उदय और अस्त होने, और सौर और चन्द्र ग्रहण की घटनाओं के सही समय के ज्ञान की भी आवश्यकता थी। इन सभी के लिये खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान आवश्यक है, अर्थात गणित, तल और गोलीय ज्यामिति और त्रिकोणमिति का सही ज्ञान,और संभवतः सरल खगोलीय उपकरणों के निर्माण का भी ज्ञान आवश्यक था। प्रारंभिक चरण में गणित मुख्य रूप से दो व्यापक परंपराओं मे विकसित हुआ- ज्यामितीय और अंकगणित, बीजगणित के मूलभूत विकास सहित। पुरा-यूनानी प्राचीन सभ्यताओं मे, यह भारत ही है कि जहाँ हम गणित की इन दोनों महान धाराओ पर मजबूत जोर देखते है। अन्य प्राचीन सभ्यताओं जैसे बेबीलोन और मिस्र ने मुख्य रूप से अंकीय गणनाओ मे प्रगति की थी।

falcon

वेदांग ज्योतिष मे कहा गया है- “वेदा हि यज्ञार्थयभिप्रवृत्ता “ अर्थात् वेद भी यज्ञों के लिए प्रवृत्त हुए। यज्ञों के लिए भिन्न – भिन्न आकार प्रकार की वेदियां बनाने की आवश्यकता पड़ी जैसे- वर्गाकार, वृत्ताकार, अर्द्धवृत्ताकार, आयताकार, त्रिभुजाकार आदि। ये यज्ञ-कुण्ड प्रतीकात्मक रुप से बहुत महत्वपूर्ण थे, एवं इन्हे परिशुद्धता (accuracy) के साथ बनाना आवश्यक था। इन यज्ञ कुण्डों के निर्माण मे विभिन्न प्रकार के अभिकल्पो (designs) का प्रयोग किया जाता था। जैसे, किसी अभिकल्प में बाज को अपने घुमावदार पंखो के साथ उड़ते दिखाया गया है, किसी अभिकल्प में रथ के पहिये को दिखाया गया है, तो किसी अभिकल्प में कछुए को उसके सिर एवं पैर फैलाये हुए दिखाया गया है। जहाँ उपरोक्त अग्नि-कुण्डो का दैनिक पूजाओं के कृत्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वहीं कुछ अभिलषित वस्तुओं को प्राप्ति के लिए अधिक विस्तृत बलिदान या पूजाएं भी थी। विशिष्ट अग्नि-कुण्ड देवताओ से विशिष्ट उपहारो के साथ सम्बन्धित थे। उदाहरण के लिए, ” जिसे स्वर्ग की इच्छा है, उसके लिए एक बाज के रूप में अग्नि-कुण्ड”, “एक कछुए के रूप में अग्नि-कुण्ड का ब्राह्मण की दुनिया को जीतने के इच्छुक द्वारा का निर्माण किया जाना है” और “जो वर्तमान और भविष्य के शत्रुओं को नष्ट करना चाहते हैं उसे तिर्यग्वर्ग अग्नि-कुण्ड निर्माण करना चाहिए”। [ref:- Plofker, Kim (2007) p. 387़. इन “आग्नि-कुण्डो” के निर्माण करने के लिए कई संदर्भ ऋग्वेद संहिता में उपलब्ध हैं। इस वेदियों के निर्माण का विज्ञान तैत्तरीय संहिता और तैत्तरीय ब्राह्मण में अधिक विस्तार मे है।

मिट्टी के ईंटो से निर्मित यह वेदिया आकृति और आकार में बहुत जटिल है, और प्राय: गणितीय सूत्रो का उपयोग आवश्यक होता था। एक सामान्य उदाहरण एक वर्ग के आकार की एक वेदी (या उसका खंड) बनाना, जिसका क्षेत्रफल किसी वृत्तीय वेदी के बराबर हो, (ऐसा गणित, जिसने गणितज्ञो को वर्षो से परेशान किया)।इस के लिए उन्हे pi का अनुमान, प्रक्रियाओं की गणना, और सटीक निर्माण विधियों की आवश्यकता थी। इन प्रक्रियाओं के लिये त्रिकोण, वर्ग और आयत के गुणो, समरुप आकृतियो के गुणो, वृत्त को वर्ग बनाने तथा इसके विलोम, वर्ग को वृत्त बनाने (अर्थात् वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाने तथा इसके विलोम) जैसी समस्याओ के हल का अच्छा ज्ञान आवश्यक है।

भारतीय गणितज्ञो ने इस क्षेत्र में बहुत काम किया है, जो शुल्व सूत्र के रूप में जाना जाता है। केवल सात शुल्व सूत्र को वर्तमान में जाना जाता है। इन्हे बोधायन (Bodhayana), आपस्तम्ब (Apasthamba), कात्यायन (Katyayana), मानव (Manava), मैत्रियन (Maitrayana), वाराह (Varaha) और वधुला (Vadhula )के नाम से जाना जाता है उन ऋषियो या साधुओ के बाद जिन्होने उन्हें लिखा था। कात्यायन सूत्र वेदों के उस भाग से है, जिसे शुक्ल तजुर्वेद (Shukla Tajurveda) कहते है। जबकि अन्य सभी कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda) से लिये गये है। बोधायन, आपस्तम्ब और कात्यायन सूत्र गणितीय बिंदु से महत्वपूर्ण हैं। मैत्रियन मानव सूत्रो के समान है। एक अन्य शुल्व सूत्र हिरण्यकशिन भी पाया गया है, जो आपस्तम्ब सूत्र के समान है।

शुल्व सूत्रो से कुछ जटिल ज्यामितीय निर्माण के नीचे सूचीबद्ध हैं।

1.    किसी दिए गए वर्ग के अपवर्त्य के बराबर वर्ग की रचना करना
2.    किसी वर्ग के अपवर्तक के बराबर वर्ग की रचना करना
3.    दो विभिन्न वर्गों के योग के बराबर वर्ग की रचना करना
4.    दो विभिन्न वर्गों के अंतर के बराबर वर्ग की रचना करना
5.    आयत के बराबर वर्ग की रचना करना
6.    वर्ग के बराबर आयत की रचना करना
7.    वर्ग के बराबर त्रिभुज की रचना करना
8.    वृत्त के बराबर वर्ग की रचना करना तथा इसका विपरीत
9.    भुजाये ज्ञात होने पर आयत की रचना करना
10.    किसी दी हुई रेखा पर वर्ग की रचना करना
11.    दो भुजाओ और उनके झुकाव दिए रहने पर समांतर चतुर्भुज की रचना करना और इसी प्रकार की अन्य रचनाये एवं रुपान्तरण

ऊपरोक्त केवल कुछ उदाहरण हैं। असल में शुल्व-सूत्र बहुत से जटिल गणितीय निर्माणो से भरे पड़े हैं।

भारतीय गणित के इतिहास पर दृष्टि डालने पर ज्ञात होता है कि “शुल्व काल” या “वेदांग ज्योतिषकाल” (1000BC से 500BC) मे ही रेखागणित की नींव पड चुकी थी। उस काल मे इसे विभिन्न नामो से जाना जाता था, जैसे- शुल्व-गणित, शुल्व-विज्ञान, रज्जु-गणित, रज्जु-संख्यान, रज्जु-क्षेत्रगणित, क्षेत्र समास, क्षेत्र व्यवहार, क्षेत्रमिति, ज्यामिति, और भूमिति नामो से व्यक्त किया गया है। शुल्व का अर्थ है  रज्जु या रस्सी। अत: वह विज्ञान या गणित जो शुल्व की सहायता लेकर विकसित किया गया, उसे शुल्व-विज्ञान या शुल्व-गणित का नाम दिया गया। शुल्व का पर्यायवाची रज्जु होने के कारण इसे रज्जु-गणित भी कहा गया है, जो आगे चल कर रेखागणित मे परिणत हो गया। शुल्व का दूसरा अर्थ यज्ञीय कार्य भी है। चूकि विभिन्न प्रकार की यज्ञ वेदियो के निर्माण मे रज्जु की सहायता से पृ्थ्वी पर अभीष्ट दूरीयाँ मापने के अतिरिक्त कृ्षि योग्य भूमि की माप भी की जाती थी, इसीलिये इस्की सहायता से विकसित गणित का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति, तथा भूमिति भी पड़ गया। क्षेत्र, ज्या, भू, का एक ही अर्थ है- भूमि, तथा, मिति का अर्थ है, मापन। अत गणित की इस शाखा का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति या भूमिति अत्यन्त सार्थक है।

शुल्व-सूत्र वैदिक अवधि से भारतीय गणित का ज्ञान के एकमात्र स्रोत हैं। इस सूत्रो के समय का अनुमान अन्य वैदिक ग्रंथों की शब्दावली के साथ उनके व्याकरण और शब्दावली की तुलना करके किया गया हैं। सबसे पुराना शुल्व-सूत्र बोधायन द्वारा 800 BCE से 600 BCE के आसपास लिखा गया , और सभी सूत्रों की अवधि 800 BCE से 200BCE अनुमान किया गया है लिखा गया था। हालांकि यह वेदों की उत्पत्ति के थोड़ा बाद का समय है,परन्तु इसमें लिखे सिद्धांत वैदिक सभ्यता से पूर्व के है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि शुल्व सूत्र के लेखको ने वेदियों कि उन रचना विधियों को केवल लिखा है जो कि , जो कि प्राचीन काल से ही निर्दिष्ट रूप में थे। वे उन वेदियों के मूल रचनाकार नहीं है।

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श्री युक्तेश्वर गिरि के चार युग

जैसा कि मैने पहले भी बताया है कि युग व्यवस्था बहुत ही भ्रामक है और अलग अलग विद्वानों ने इसकी व्याख्या अपने तरीके से की है| (पढ़ें- युग-युग की बातें (भारतीय युग सिद्धान्त))इस लेख का उद्देश्य भारतीय युग व्यवस्था पर एक सकारात्मक चर्चा कर उसकी प्रामाणिकता की खोज करनी है| मैं यहाँ पर अपनी कोई व्याख्या न देकर केवल उन विद्वानों की व्याख्या दे रहा हूँ| यह चर्चा पहले भी की जा चुकी है|(पढ़ें- भारतीय युग सिद्धान्त – Indian Yuga Theory: Some Ideas ) आज इसी कड़ी में प्रस्तुत है श्री युक्तेश्वर गिरि के विचार|

श्री युक्तेश्वर गिरि – 1 युग चक्र = 12000 वर्ष

Sriyukteswarपरमहंस योगानन्द के गुरु श्री युक्तेश्वर गिरि के अनुसार हमारा पारम्परिक दृष्टिकोण ज्योतिषियो और खगोलशास्त्रियो के द्वारा किये गये गलत गणनाओ पर आधारित है। अपनी पुस्तक The Holy Science मे वह प्रत्येक युग चक्र को संधिकाल के साथ 12000 वर्षो का बताते हैं। प्रत्येक संधिकाल मुख्य काल का 10% होता है तथा आरम्भ एवं अन्त दोनो मे होता है। उदाहरण के लिये, कलियुग 1000 वर्षो का तथा इसकी 100 वर्षो की दो संधियां, इस प्रकार कुल 1200 वर्षो का होता है। इसी प्रकार द्वापरयुग 2000 वर्षो का तथा इसकी 200 वर्षो की दो संधियां, इस प्रकार कुल 2400 वर्षो का होता है। त्रेतायुग 3600 वर्षो (संधियों सहित) का तथा सत्ययुग 4800 वर्षो (संधियों सहित) का होता है। इस प्रकार कुल 12000 वर्षो का युग चक्र हुआ। श्री युक्तेश्वर गिरि के अनुसार यह युग चक्र भी जोड़ियो मे आते है। पहले अवरोही युगो मे सत्ययुग से त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग, फिर आरोही युगो मे कलियुग से द्वापरयुग, त्रेतायुग, तथा सत्ययुग का आगमन होगा। इन आरोही युगो और अवरोही युगो की संधि 499AD मे हुयी थी। कलियुग का आरोहण सितम्बर 499AD मे आरम्भ हुआ। इस गणना के अनुसार हम सितम्बर 1699AD से द्वापरयुग के आरोहण मे है।

श्री युक्तेश्वर के अनुसार कोई भी विद्वान अवरोही कलियुग के आरम्भ की बुरी घोषणा नही करना चाहता था, अतः वह द्वापर को ही बढ़ाते गये। जैसे ही कलियुग का आरोहण शुरु हुआ, तब उन्हे लगा की काल गणना मे उनसे गलती हो गयी है। समाधान के लिये उन्होने एक नयी व्यवस्था की। कलियुग को 1200 वास्तविक वर्षो के बजाय 1200 दिव्य वर्षो का बताया। प्रत्येक दिव्य वर्ष मे 12 दिव्य महीने और प्रत्येक दिव्य महीना 30 दिव्य दिवसो का होता है। एक दिव्य दिवस पृथ्वी के एक वास्तविक (सौर) वर्ष के बराबर होता है। तो इस प्रकार कलियुग 1200x12x30=432000 वर्षो का हुआ।
श्री युक्तेश्वर बताते है कि जिस प्रकार दिन-रात्रि का चक्र एक celestial गति (पृ्थ्वी का अपने अक्ष पर घूमना) के कारण होता है और मौसमो का चक्र भी एक celestial गति ( पृ्थ्वी का सूर्य के चारो ओर घूमना ) के कारण् होता है, उसी प्रकार युग चक्र भी एक celestial गति के कारण होता है। यह celestial गति हमारे सौर-मण्डल के किसी अन्य बिन्दु के चारो ओर घूमने के कारण होती है। इस मूल-बिन्दु को उन्होने “विष्णुनाभि” कहा है।

परन्तु 12000 वर्षो के चक्र के लिये यह बिन्दु अन्तरिक्ष मे कहां है?

डेविड फ्राले, जो कि एक खगोलशास्त्री और वैदिक परम्परा के बहुत से पुस्तको के लेखक है, भी समान व्याख्या प्रस्तुत करते है। इनकी व्याख्या मनु-संहिता पर आधारित है, जिसमे  बहुत छोटे, 2400 वर्षो का युग चक्र बताया गया है। मनु का युग चक्र लगभग उसी लम्बाई का है जैसा कि खगोलशास्त्री Precession of the Equinoxes के लिये बताते है। Precession of the Equinoxes का समय 2580 वर्ष माना जाता है। उनका कहना है कि छोटे युग चक्र के द्वारा हम रामायण और महाभारत तथा अन्य ऎतिहासिक तथ्यो के समय को दूसरे तरीको से बेहतर तरीके से निकाल सकते है। अन्य तरीको से इन घटनाओ का समय लाखो वर्ष पहले निकलता है जो कि धरती पर मानव इतिहास के परिप्रेक्ष्य मे अस्वीकार करने योग्य है।

Proposal of Sri Yukteshwar—

Ascending Dwapara Yuga proper 1900 – 3900 AD
Satya subyuga 3100 – 3900 AD
Treta subyuga 2500 – 3100 AD
Dwapara subyuga 2100 – 2500 AD
Kali subyuga 1900 – 2100 AD
Dwapara Yuga sandhi 1700 – 1900 AD
Kali Yuga sandhi 1600 – 1700 AD
Ascending Kali Yuga proper 600 – 1600 AD
Satya subyuga 1200 – 1600 AD
Treta subyuga 900 – 1200 AD
Dwapara subyuga 700 -   900 AD
Kali subyuga 600 -  700 AD
Ascending Kali Yuga sandhi 500 -  600 AD
Descending Kali Yuga sandhi 400 -  500 AD
Descending Kali Yuga proper 600 BCE -  400 AD
Kali subyuga 300 –   400 AD
Dwapara subyuga 100 -   300 AD
Treta subyuga 200 BCE – 100 AD
Satya subyuga 600  –   200 BCE
Kali Yuga sandhi 700 -   600 BCE
Dwapara Yuga sandhi 900 –   700 BCE
Descending Dwapara Yuga proper 2900 –   900 BCE
Kali subyuga 1100 –   900 BCE
Dwapara subyuga 1500 – 1100 BCE
Treta subyuga 2100 – 1500 AD
Satya subyuga 2900 – 2100 BCE
Dwapara Yuga sandhi 3100 – 2900 BCE
Treta Yuga sandhi 3400 – 3100 BCE
Descending Treta Yuga proper 6400 – 3400 BCE
Kali subyuga 3700 – 3400 BCE
Dwapara subyuga 4300 – 3700 BCE
Treta subyuga 5200 – 4300 AD
Satya subyuga 6400 – 5200 BCE
Treta Yuga sandhi 6700 – 6400 BCE
Satya Yuga sandhi 7100 – 6700 BCE
Descending Satya Yuga proper 11,100 – 7100 BCE
Kali subyuga 7500 – 7100 BCE
Dwapara subyuga 8300 – 7500 BCE
Treta subyuga 9500 – 8300 BCE
Satya subyuga 11,100 – 9500 BCE

[ref: Sri Yukteswar, Swami (1949). The Holy Science. Yogoda Satsanga Society of India.]

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दुनिया को तब गिनती आयी…

“The ingenious method of expressing every possible number using a set of ten symbols (each symbol having a place value and an absolute value) emerged in India. The idea seems so simple nowadays that its significance and profound importance is no longer appreciated. It’s simplicity lies in the way it facilitated calculation and placed arithmetic foremost amongst useful inventions.”

– Laplace, French mathematician.

लाप्लास का यह कथन कितना तर्कसंगत लगता है जब हम वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति को देखते हैं| गणित और विज्ञान के वर्तमान स्वरूप की कल्पना शून्य के बिना असंभव है| सत्य ही कहा है-

जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आयी|”

भारत मे शून्य का प्रथम वास्तविक प्रमाण 876 AD के एक मन्दिर के शिलालेख मे मिलता है| यह शिलालेख ग्वालियर के चतुर्भुज मन्दिर मे मिला है| यहाँ पर 187 गुणे 270 हस्त का एक बागीचा लगाया गया था, जिससे 50 पुष्पमालाये प्रतिदिन मन्दिर को भेजी जाती थी| शिलालेख पर 270 और 50 (२७० और ५०) लगभग उसी प्रकार से लिखे गये है जिस प्रकार आज लिखे जाते है|

परन्तु ऐसा नही है की 876 AD मे शून्य का प्रथम प्रयोग किया गया हो| शून्य के संदर्भ मे सबसे प्राचीन एक जैन पुस्तक लोकविभाग” (458 BC) मानी जाती है| इसमे संख्याओं के लिये संस्कृत के शब्दो का प्रयोग किया गया था| कुछ अन्य प्राचीन भारतीय पाण्डुलिपियों मे शून्य के लिये बिन्दु के प्रयोग के भी प्रमाण मिले है, परन्तु उन्ही पाण्डुलिपियो मे अज्ञात के लिये भी बिन्दु का प्रयोग किया गया है| आर्यभट्ट वह प्रथम गणितज्ञ थे जिन्होने शून्य का गणित मे व्यापक प्रयोग किया| लगभग 498 AD मे आर्यभट्ट ने विश्व को दाशमिक संख्या पद्धति दी| वे लिखते है- स्थानम स्थानम दश गुणम्|” इसमे उन्होने शून्य के लिये एक शब्द “ख” का प्रयोग किया था|

परन्तु कथानक यहीं समाप्त नही होता है| अभी तो शून्य का गणित विकसित करना बाकी था| गणित मे शून्य एक संख्या है, तथा दाशमिक संख्या पद्धति का आधार है, परन्तु इसके गणितीय गुणो की विवेचना अभी बाकी थी| शून्य के साथ साथ ऋणात्मक संख्याओ के गणित के विकास मे तीन गणितज्ञो ने प्रमुख योगदान दिया| वे थे- ब्रह्मगुप्त, महावीर, और भास्कर|

ब्रह्मगुप्त ने 628 AD मे लिखित अपने पुस्तक ब्रह्मगुप्त सिद्धांत” मे अंकगणित के कुछ नियम दिये गये है| वे कहते है कि किसी संख्या को उसी संख्या से घटाने पर शून्य मिलता है| शून्य से संबन्धित योग के लिये निम्नलिखित नियम देते है-

शून्य और एक ऋणात्मक संख्या का योग एक ऋणात्मक संख्या होती है| शून्य और एक धनात्मक संख्या का योग एक धनात्मक संख्या होती है| शून्य और शून्य का योग शून्य होता है|

घटाने की क्रिया थोड़ी जटिल है-

किसी ऋणात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर धनात्मक संख्या मिलती है| किसी धनात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर ऋणात्मक संख्या मिलती है| किसी ऋणात्मक संख्या से शून्य को घटाने पर वही ऋणात्मक संख्या मिलती है| किसी धनात्मक संख्या से शून्य को घटाने पर वही धनात्मक संख्या मिलती है| शून्य से शून्य को घटाने पर शून्य मिलता है| एक धनात्मक और ऋणात्मक संख्या का योग उनके अन्तर के बराबर होता है, और यदि उन संख्याओं का निरपेक्ष मान बराबर हो तो योग शून्य होता है|

ब्रह्मगुप्त आगे बताते है -

किसी संख्या को शून्य से गुणा करने पर शून्य मिलता है|

परन्तु भाग की क्रिया थोड़ी जटिल है-

किसी धनात्मक अथवा ऋणात्मक संख्या को शून्य से भाग देने पर एक भिन्न संख्या (fractional number) मिलती है जिसका हर (denominator) शून्य होता है| शून्य को किसी धनात्मक अथवा ऋणात्मक संख्या से भाग देने पर निष्कर्ष शून्य अथवा एक भिन्न संख्या होती है जिसका अंश (numerator) शून्य और हर (denominator) वह संख्या होती है| शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य मिलता है|

निस्सन्देह ब्रह्मगुप्त भाग कि क्रियाओं मे थोड़े भ्रमित थे, परन्तु उनका प्रयास सराहनीय था| वह पहले ऐसे गणितज्ञ थे जिसने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं का अंकगणित प्रस्तुत किया|

ब्रह्मगुप्त से लगभग 200 वर्षो के बाद, 830 AD मे भारतीय गणितज्ञ महावीर ने गणित सार-संग्रह “ लिखा| यह पुस्तक ब्रह्मगुप्त सिद्धांत का ही एक विकसित रूप लगती है| महावीर यहाँ स्पष्टतः लिखते है-

…किसी संख्या को शून्य से गुणा करने पर शून्य प्राप्त होता है, किसी संख्या से शून्य घटाने पर वह अपरिवर्तित रहती है|

हालांकि ब्रह्मगुप्त की कमियों को दूर करने मे वह असफल रहे है-

किसी संख्या को शून्य शून्य से भाग देने पर वह अपरिवर्तित रहती है|

ब्रह्मगुप्त से लगभग 500 वर्षो के बाद भास्कर भी शून्य के बारे मे बहुत कुछ सिद्धान्त देते है, परन्तु इतना समय बीत जाने पर भी वह शून्य से भाग देने की क्रिया को नही समझा पाये| वह लिखते हैं-

किसी संख्या को शून्य से भाग देने पर एक भिन्न संख्या (fractional number) मिलती है जिसका हर (denominator) शून्य होता है| इस भिन्न संख्या को अनंत कहा जाता है| शून्य को हर के स्थान पर रखने वाली यह संख्या इसमे से कुछ भी निकाले या इसमे कुछ भी जोड़े जाने पर भी अपरिवर्तनीय है, ठीक उसी प्रकार जैसे इस संसार के निर्माण और नष्ट होने से उस अनंती ईश्वर पर कोई प्रभाव नही पड़ता है|”

इस प्रकार भास्कर ने इस समस्या को n/0 = ∞ लिख कर हल करने का प्रयास किया| परन्तु हम जानते है कि यह भी सही नही है| वस्तुतः n/0 अपरिभाषित है, किसी भी संख्या को शून्य से भाग नही दिया जा सकता| हालांकि भास्कर ने शून्य के अन्य गुणो को ठीक लिखा है, जैसे- 0X0 = 0, और √0 = 0

भारतीयो का यह उद्दीप्त कार्य मुस्लिम और अरबी गणितज्ञो ने संसार मे पहुँचाया | 9वीं शताब्दी मे एक पारसी गणितज्ञ मुहम्मद इब्न् मूसा अल्-ख़्वारिज़्मी ने एक पुस्तक Algoritmi de numero Indorum (“al-Khwārizmī on the Hindu Art of Reckoning”) लिखी जिसमे उसने दस प्रतीको 1,2,3,4,5,6,7,8,9 और 0 पर आधारित भारतीय स्थान-मान संख्या-पद्धति का वर्णन किया था| आज जहाँ पर इराक है, वहाँ पर इसी पुस्तक ने शून्य का प्रयोग शुरु किया| इस पुस्तक का यह नाम इटली के एक इतिहासकार Baldassarre Boncompagni द्वारा दिया गया, मूल अरबी नाम संभवतः किताब्-अल्-ज़ाम्-व्-ल्-तफरीक़ बी-हिसाब् अल्-हिन्द्” (“The Book of Addition and Subtraction According to the Hindu Calculation”) था| 12वीं शताब्दी मे अब्राहम-बेन्-मीर्-इब्न इर्ज़ा ने भारतीय अंको और दाशमिक भिन्न संख्याओ पर तीन पुस्तके लिखी जिसने युरोप के विद्वानो का ध्यान भी आकर्षित किया| The Book of the Number मे पूर्णांको के लिये बांये से दांये स्थान-मान संख्या-पद्धति का वर्णन किया गया है| इब्न इर्ज़ा ने इस पुस्तक मे शून्य को गलगल कहा है, जिसका अर्थ होता है वृत्त| कुछ समय पश्चात 12वीं शताब्दी मे ही  एक अरबी गणितज्ञ इब्न्-याह्या अल्-मग़रीबी अल्-समवाल ने बीजगणित की एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था- अल्-बहिर् फि-ल्-जब्र (The brilliant in algebra)| इसमे शून्य के बारे मे विस्तार से चर्चा की गयी है|

भारतीय गणित पश्चिम मे इस्लामिक देशो के साथ-साथ पूर्व मे चीन मे भी फैली| 1247AD मे चीनी विद्वान चिन् चियु-शाउ ने अपनी पुस्तक Shushu Jiuzhang (Mathematical Treatise in Nine Sections) मे शून्य के लिये O का प्रयोग किया है|

भारतीय गणित को यूरोप मे पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य प्रसिद्ध इटैलियन गणितज्ञ लियोनार्दो पिसानो फिबोनक्कि (Leonardo Pisano Fibonacci) ने किया| 1202 AD मे लिखी अपनी पुस्तक “लिबर अबेकि” (Liber abaci) मे फिबोनक्कि ने दसो भारतीय अंको (1, 2, …9 और 0 ) का प्रयोग किया है| गौरतलब है कि फिबोनक्कि ने 1,2,3,4,5,6,7,8,9 को अंक कहा है, परन्तु 0 को केवल एक प्रतीक|

पूरे संसार के लोग ध्यान देते गये और इस प्रकार धीरे धीरे पूरे संसार मे भारतीय संख्या पद्धति अपना ली गयी| आज भी संख्याओं पर भारतीय प्रभाव देखा जा सकता है| भारतीय अंको और वैश्विक अंको मे समानता स्पष्ट दिखती है| १ = 1, २ = 2, ३ = 3, ६ = 6, ० = 0| नीचे दी गयी सूची मे संस्कृत्, लैटिन्, इटैलियन और फ्रेन्च संख्याये तुलनात्मक रूप से लिखे है|

numbers

स्पष्ट है कि लैटिन शब्दो को संस्कृत से ही लिया गया है| यहाँ तक कि संख्याओं का क्रम भी अपरिवर्तित रहता है| अंग्रेजी का शब्द ज़ीरो (zero) भी संस्कृत से ही लिया गया है| संस्कृत मे इसे शून्य कहते है, अरबी मे अशिफ्र् (बाद मे शिफ्र् sifra) कहा जाने लगा| लैटिन मे सिफ्र (cifra), तत्पश्चात इटैलियन मे ज़ेफिरो (zefiro), ज़ेफ्रो (zefro), और बाद मे ज़ेवेरो (zevero) कहा जाने लगा, और अन्त मे अंग्रेजी मे ज़ीरो (zero)|

कुछ वर्षो पहले नयी सहस्त्राब्दि की शुरुआत 1 जनवरी 2000 को मनायी गयी| इसे देख कर लगता है कि संसार को अभी भी शून्य पूरी तरह से समझ नही आया है| 31 दिसम्बर 1999 की रात 12 बजे इसवी कैलेण्डर के 1999 वर्ष पूरे हुये| 2000 वर्ष तो 31 दिसम्बर 2000 को पूरे हुये थे| तो नयी सहस्त्राब्दि की शुरुआत 1 जनवरी 2000 को नही बल्कि 1 जनवरी 2001 को हुयी थी|

Ref:

http://www-history.mcs.st-andrews.ac.uk/HistTopics/Zero.html

http://en.wikipedia.org/wiki/0_(number)

http://www.timelineindex.com/content/view/1452

http://mathforum.org/k12/mayan.math/

http://mathforum.org/k12/mayan.math/mayan2.html

http://mathforum.org/k12/mayan.math/mayan3.html

http://en.wikipedia.org/wiki/Numeral_system

http://en.wikipedia.org/wiki/Al-Khwarizmi#Arithmetic

http://en.wikipedia.org/wiki/Abraham_ibn_Ezra

http://www.gap-system.org/~history/Mathematicians/Ezra.html

http://en.wikipedia.org/wiki/Al-Samawal

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पाइथागोरस प्रमेय पाइथागोरस से पहले

pythagorasसमकोण त्रिभुज प्रमेय को पाइथागोरस प्रमेय के नाम से गणित के सभी विद्यार्थी जानते है| समकोण त्रिभुज के कर्ण का वर्ग उसके अधार और लम्ब के वर्गो के योग के बराबर होता है| शुल्व सूत्रो मे बिना निष्पादन के इसकी चर्चा की गयी है| आपस्तम्ब और बोधायन के आरम्भिक कार्यो मे यह दिखायी देता है| बोधायन 74 मे कहा है  “एक आयत के विकर्ण (पर बनाये गये वर्ग) का क्षेत्रफल आयत के छोटे और बड़े भुजाओ (पर बने वर्गो) के क्षेत्रफल के योग के बराबर होता है|”बोधायन सूत्रो मे दिये गये समकोण त्रिभुज से सम्बन्धित कुछ अन्य प्रमेय निम्नलिखित है-

1.9. एक वर्ग का विकर्ण (वर्ग के) क्षेत्रफल के दोगुना क्षेत्रफल देता है|
1.12. एक आयत की दो भुजाओं (लम्बाई और चौड़ाई) के (वर्गो का) क्षेत्रफल का योग उसके विकर्ण के (वर्ग) के क्षेत्रफल के बराबर होता है|
1.13. ऐसा 3 और 4, 12 और 5, 15 और 8, 7 और 24, 12 और 35, 15 और 36 की भुजाओ वाले आयतो मे देखा गया है|

पाइथागोरियन त्रय एक समकोण त्रिभुज के पूर्णाक भुजाओ के समुच्चय को कहते है, जैसे ३,४,५ और ५,१२,१३ आदि, और इनका प्रयोग समकोण बनाने मे होता था| पाइथागोरियन त्रय आपस्तम्ब सुत्रो मे बहुत मिलते है|katyayana
katyayana
शतपथ ब्रह्मण और तैतरीय संहिता मे भी समकोण त्रिभुज प्रमेय का ज्ञान मिलता है| ए. सीडेनबर्ग का तर्क है कि सम्भवतः प्रचीन बेबीलोन को समकोण त्रिभुज प्रमेय का ज्ञान भारत से मिला अथवा प्रचीन बेबीलोन और भारत , दोनो को यह किसी तीसरे स्रोत से मिला| उनके अनुसार यह तीसरा स्रोत सुमेर सभ्यता (1700 BC) हो सकती है| कॉर्ल बी. बॉयर का कुछ ऐसा ही कहना है| उनके अनुसार पाइथागोरियन त्रय प्राचीन बेबीलोन के गणित से निष्पादित किये जा सकते है, अत: शुल्व सूत्रो पर मेसोपोटामिया की सभ्यता के प्रभाव की सम्भावना से इंकार नही किया जा सकता| आपस्तम्ब को ज्ञात था कि एक आयत के दोनो भुजाओ (लम्बाइ और चौड़ाई) के (वर्गो का) क्षेत्रफल का योग उसके विकर्ण के (वर्ग) के क्षेत्रफल के बराबर होता है, और इसी प्रकार के सूत्र मेसोपोटामिया से भी मिलते है|

[ref: Boyer (1991). "China and India". p. 207.]

यहाँ पर यह ध्यान देने की बात है कि बोधायन तथा अन्य शुल्व सूत्रो का रचनाकाल 1000BC से 200BC माना जाता है और पाइथागोरस का जन्म 580BC के आसपास हुआ था| स्पष्ट है कि भारतीयो को यह प्रमेय पाइथागोरस से 500 वर्ष पहले ज्ञात था, परन्तु फिर भी इसका श्रेय भारतीयो को नही मिला| इसका कारण स्पष्ट है कि भारतीयो ने इसका निष्पादन नही दिया|

“While the theorem that now bears his name (Pythagoras) was known and previously utilized by the Babylonians and Indians, he, or his students, are often said to have constructed the first proof.”

[ref: http://en.wikipedia.org/wiki/Pythagoras]

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