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आर्यभटीय और गणित (भाग-2)

2.  ज्यामिति और ठोस ज्यामिति

आर्यभट ने sine के मानो की एक पूरी सूची दी जिसमे कि sine के सभी मान 90°/24 = 3° 45′ के अन्तराल पर दिये गये है| इसकी गणना के लिये उन्होने sin(n+1)x – sin nx का sin nx और sin (n-1)x के पदो मे एक सूत्र का प्रयोग किया| उन्होने versine (versin = 1 – cosine) को भी ज्यामिति मे शामिल किया|

वस्तुत: sine का यह नाम भी आर्यभट द्वारा दिये गये नाम का अपभ्रंश है| आर्यभट ने sine को अर्ध्-ज्या कहा, जिसे कि लोगों ने सरलता के लिये केवल ज्या (jya) कहना आरम्भ किया| जब उनके संस्कृत मे लिखी पुस्तक का अरबी मे अनुवाद हुआ तो इसे जिबा (jiba), ध्वन्यात्मक समानता के कारण, लिखा गया| हालांकि अरबी मे स्वरो का उच्चारण हटा दिया गया और इसे ज़्ब (jb) कहा जाने लगा| बाद के लेखको को लगा कि ज़्ब केवल एक लघुरूप है तो उन्होने इसे जाइब (jaib) कहा, क्योकि जिबा (jiba) का अरबी मे कोई अर्थ नहीं होता और जाइब का अर्थ होता है वक्र, अथवा कपड़े मे लिपटा हुआ (bundle, bosom, fold in a garment)| बाद मे 12 शताब्दी मे जब Gherardo of Cremona ने इन अरबी पुस्तकों को लैटिन मे अनुवाद किया तो उन्होने जाइब का लैटिन अनुवाद sinus से किया, जिसका लैटिन मे वही अर्थ होता है जो कि अरबी मे जाइब का| और सबसे अन्त मे लटिन का यह शब्द sinus अंग्रेजी मे sine बन गया| (http://www.etymonline.com/index.php?search=jaib&searchmode=none)

ज्यामिति मे आर्यभट का योगदान यहीं तक सीमित नहीं है| त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने के लिये वह स्पष्ट रूप से सूत्र देते है| गणितपाद मे उन्होने लिखा है-

आर्य२.६क/ त्रि-भुजस्य फल-शरीरम् सम-दल-कोटी-भुजा-अर्ध-संवर्गस्/

(for a triangle, the result of a perpendicular with the half-side is the area.)

आर्यभट ने जो सूत्र त्रिभुज और वृत्त का क्षेत्रफल निकालने के लिये दिये, वे तो पूर्णतः सही है, लेकिन, एक गोले और पिरामिड के आयतन के लिये दिये गये सूत्र को कई विद्वानो ने गलत बताया है| उदाहरण के लिये, गणितपाद (15) मे आर्यभट ने पिरामिड के आयतन के लिये V = Ah/2 सूत्र दिया है, जहाँ V = आयतन, A = त्रिकोणीय आधार का क्षेत्रफल, और, h = उँचाई| सही सूत्र V = Ah/3 है| इसी प्रकार गोले के आयतन के लिये भी उनका दिया सूत्र गलत लगता है| हालांकि, जैसा कि प्रायः होता है, कुछ भी सीधे सीधे नही कह कर, आर्यभट ने सब कुछ सुसज्जित श्लोको के माध्यम से कहा है, और K Elfering के अनुसार,आर्यभट ने सही सूत्र दिया था और उनके गलत होने का भ्रम गलत अनुवाद के कारण है| (K Elfering, The area of a triangle and the volume of a pyramid as well as the area of a circle and the surface of the hemisphere in the mathematics of Aryabhata I, Indian J. Hist. Sci. 12 (2) (1977), 232-236.)

3. बीजगणित: अनिश्चित समीकरण (Indeterminate Equations) -

भारतीय गणित मे प्राचीन काल से ही एक समस्या उच्च प्राथमिकता पर थी, और वह है ax+b=cy के प्रकार के समीकरणो का हल| इन्हे डायोफैंटीय समीकरण (diophantine euations) भी कहते है| Diophantine equation एक ऐसा अज्ञात पदो का बहुपदीय समीकरण है जिसमे पदो का मान केवल पूर्णांक ही हो सकता है| डायोफैंटस नामक यूनानी गणितज्ञ ने, जो संभवत: ईसा के पश्चात् तीसरी शताब्दी में रहा, बहुत से बहुपदीय अनिर्धारित समीकरणों (Undetermined Equations) का अध्ययन किया तथा पूर्णांकों में उनके हलों को ज्ञात किया। नीचे आर्यभटीय पर भास्कर की टिप्पणी का एक उदाहरण दिया गया है-

“ऐसी संख्या ज्ञात करे जिससे कि, जब उसे 8 से भाग दिया जाय तो 5 शेष बचे, और, जब 9 से भाग दिया जाय तो 4 शेष बचे, और, जब 7 से भाग दिया जाय तो 1 शेष बचे|”

उपरोक्त समस्या को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है- N = 8x+5 = 9y+4 = 7z+1. इससे निकाला जा सकता है कि N का छोटा से छोटा से मान 85 है| सामान्यतः डायोफैंटीय समीकरणो को बहुत ही कठिन माना जाता है| इनका भारतीय प्राचीन गणित मे विशेष रूप से अध्ययन किया गया| शुल्व-सूत्रो मे भी इन्हे देखा जा सकता है, जो कि आर्यभट से भी प्राचीन माने जाते है, लगभग 800 BCE के आसपास| आर्यभट ने इन समीकरणो को हल करने के लिये कुक्कुट विधि दी| कुक्कुट का अर्थ होता है छोटे छोटे भागो मे विभक्त करना| यह विधि, आर्यभट के, गणित मे सर्वश्रेष्ठ योगदानो मे से एक है| आर्यभट ने इस विधि का प्रयोग एक घात वाले डायोफैंटीय समीकरणो को हल करने मे किया, जो कि खगोल विज्ञान मे बहुत ही आवश्यक है| यही विधि, 6ठीं शताब्दी मे भास्कर के विस्तार के बाद, आज, डायोफैंटीय समीकरणो को हल करने के लिये संसार मे मानक विधि है, और इसे कई स्थानो पर Aryabhata algorithm (http://en.wikipedia.org/wiki/Aryabhata_algorithm) भी कहा जाता है|

4. खगोल विज्ञान:

ऊपर आर्यभटीय मे दिये गये गणित के बारे मे बताया गया है, परन्तु आर्यभटीय वस्तुतः खगोल विज्ञान का एक ग्रन्थ है, अतः इसमे दिये गये खगोल विज्ञान की भी चर्चा आवश्यक है| हालांकि इसके बारे मे विस्तार से पिछले लेख मे चर्चा की गयी है|
आर्यभट्ट ने अंतरिक्ष मे ग्रहो की स्थिति का एक व्यवस्थित तरीका दिया। उन्होने पृथ्वी की परिधि 24835 मील बताया, जो कि लगभग सही (वास्तविक मान 24902 मील है) बताया| पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष पर घूमती है, यह तथ्य गैलीलियो और कापरनिकस के बहुत पहले ही उन्होने आर्यभटीय मे लिख दिया|

आर्यभट्ट ने ग्रहो की कक्षाओ की त्रिज्याओ को भी पृथ्वी/सूर्य के कक्षा के त्रिज्या के पदो मे निकाल। उनका विश्वास था कि चन्द्रमा और ग्रह परावर्तित सूर्य-किरणो के कारण चमकते है, आश्चर्यजनक रूप से उन्हे विश्वास था कि ग्रहो की कक्षाये दीर्घवृत्त होती है। उन्होने सूर्य और चन्द्र ग्रहण के कारणो की एकदम सही सही व्याख्या की। एक वर्ष का काल उन्होने 365 दिन 6 घण्टे 12 मिनट और 30 सेकेण्ड जो कि अधिगणना थी क्योकि वास्तविक मान 365 दिन 6 घण्टे से कम है।

विरासत:

आर्यभट के कार्यो का भारतीय खगोल वैज्ञानिक परंपरा में काफी प्रभाव पड़ा, और अनुवाद के माध्यम से कई पड़ोसी संस्कृतियों को प्रभावित किया| इस्लामी स्वर्ण युग (ca. 820) के दौरान किया गया अरबी अनुवाद, विशेष रूप से प्रभावशाली था| आर्यभटीय ने दिये गये निष्कर्षो में से कुछ को अल-ख्वारिज्मी द्वारा उद्धृत किया गया, और 10 वीं शताब्दी के अरबी विद्वान अल-बरूनी ने अल-ख्वारिज्मी का संदर्भ लिया है| अल-बरूनी के अनुसार आर्यभट के अनुयायियो का विश्वास था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है| उन्होने sine (ज्या) परिभाषा तो दी ही, साथ ही साथ cosine (कोज्या), versine (उक्रमज्या), invers sine (व्युत्क्रम ज्या) को भी परिभाषित किया| त्रिकोणमिति के जनक आर्यभट ही है| वस्तुतः इसका अंग्रेजी नाम Trigonometry (ट्रिगोनोमेट्रि) संस्कृत शब्द त्रिकोणमिति का ही अपभ्रंश है| वह पहले व्यक्ति थे जिन्होने sine और versine (1-cosX) के 0° से 90° के बीच 3.75° के अन्तराल पर मानो की सूची दी, जो कि दशमलव के 4 स्थानो तक सही है|

आर्यभट्ट की खगोलीय गणनाएं भी बहुत प्रभावशाली थे| त्रिकोणमितीय सूची के साथ, वे व्यापक रूप से इस्लामी दुनिया में इस्तेमाल किया जाने लगे, और कई अरबी खगोलीय सारणी (zijes) की गणना मे प्रयोग किये गये| विशेष रूप से, अरबी स्पेन (स्पेन का वह भाग जो पहले अरब मे था) के वैज्ञानिक अल-ज़ारक़ाली (Al-Zarqali (11th c.)) के द्वारा दी गयी खगोलीय सारणी का लैटिन में अनुवाद किया गया Tables of Toledo (12th c.), और यूरोप मे सदियों तक सबसे सटीक Ephemeris (खगोलीय स्थितियो के लिये कैलेण्डर) माना गया|

आर्यभट्ट और अनुयायियों के द्वारा किये गये कैलेण्डर की गणनायें शताब्दियों से भारत मे पंचांग (हिन्दू कैलेण्डर) के निर्धारण के लिये प्रयुक्त की जाती रही है| ये इस्लामी दुनिया मे भी गये और वहाँ के जलाली कैलेण्डर (Jalali Calendar)का मुख्य आधार बना जिसे 1073 मे ओमर खय्याम (Omara Khayyam) और कुछ अन्य खगोलशास्त्रियो के द्वारा बनाया गया था| इसी के रूप (1925 मे संशोधित) आज ईरान और अफगानिस्तान के राष्ट्रिय कैलेण्डर हैं| जलाली कैलेण्डर मे तिथियाँ वास्तविक सौर पारगमन (solar transit) के आधार पर निकाली गयी है, ठीक उसी प्रकार जैसे आर्यभट्ट के कैलेण्डर(और पहले के सिद्धांत कैलेंडर) मे है| कैलेंडर मे इस प्रकार तिथि की गणना के लिए एक Ephemeris (खगोलीय स्थितियो के लिये कैलेण्डर) की आवश्यकता होती है| हालांकि तिथियों की गण्ना कठिन है, परन्तु मौसम की गणना मे त्रुटि, जलाली कैलेण्डर मे ग्रेगोरियन कैलेण्डर की तुलना मे कम है|

भारत के पहले उपग्रह आर्यभट को यह नाम उनके नाम पर दिया गया था| चंद्रमा गड्ढा आर्यभट्ट (lunar crater Aryabhata) का भी यह नाम उनके सम्मान में है| खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वातावरणीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए भारत मे नैनीताल के निकट संस्थापित एक संस्थान को आर्यभट्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट आफ आब्जर्वेशनल साइंस (Aryabhatta Research Institute of observational sciences (ARIES)) नाम दिया गया|

संदर्भ -

1. http://en.wikipedia.org/wiki/Aryabhata
2. http://www-history.mcs.st-andrews.ac.uk/Biographies/Aryabhata_I.html
3. ARYABHATA I, HIS LIFE AND HIS CONTRIBUTIONS by S. M. Razaullah Ansari
4. http://www.aryabhatta.net/
5. http://www.scribd.com/doc/20912413/The-Aryabhatiya-of-Aryabhata-English-Translation

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आर्यभटीय और गणित (भाग-1)

आर्यभट को उनके 400 वर्षों पश्चात एक अन्य आर्यभट से अलग करने के लिये आर्यभट प्रथम के नाम से जाना जाता है| हांलाकि अल्-बरूनी ने उनके बारे मे भ्रम पैदा किया कि एक ही समय पर दो आर्यभट थे| परन्तु 1926 मे बी दत्ता ने यह भ्रम दूर किया और यह बताया कि अल्-बरूनी के दोनो आर्यभट एक ही व्यक्ति थे|

आर्यभट ने खगोल विज्ञान और गणित बहुत से ग्रन्थ लिखे, परन्तु उनमे से कुछ लुप्त हो गये है| उनका सबसे बडा़ कार्य आर्यभटीय है, जो कि गणित और खगोल विज्ञान का समन्वय है| इस पुस्तक को भारतीय गणित के इतिहास मे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है| इसके गणितीय भाग मे अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति, तल ज्यामिति, और ठोस ज्यामिति के बहुत से महत्वपूर्ण सिद्धान्त दिये गये हैं|

आर्यभट-सिद्धान्त, उनके द्वारा रचित एक अन्य ग्रन्थ था जिसमे खगोलीय गणनायें दी गयी थी| परन्तु अब यह ग्रन्थ लुप्त हो गया है| इसकी जानकारी वाराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, और भास्कर प्रथम के लेखों से मिलती है| यह ग्रन्थ प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त पर आधारित प्रतीत होता है जिसमे अर्ध-रात्रिका (जिसमे दिन का आरम्भ अर्ध-रात्रि से माना जाता है) का प्रयोग किया गया था इस ग्रन्थ मे बहुत से खगोलीय यंत्रो के बारे मे जानकारी दी गयी थी, जैसे “शंकु-यंत्र” (gnomon), “छाया-यंत्र” (a shadow instrument), कोण मापने के यंत्र, “धनुर्यंत्र”/”चक्र-यंत्र” (semicircular and circular), “यस्ति-यंत्र” (a cylindrical stick), “छत्र-यंत्र” (an umbrella-shaped device), कम से कम दो प्रकार (चक्राकार, और धनुषाकार) के जल घडी़ (water clocks) इत्यादि|

एक तीसरा ग्रन्थ अरबी अनुवाद में बचा रह गया – अल्-नत्फ, जिसे आर्यभट के किसी ग्रन्थ का अनुवाद माना जाता है, हालांकि इसके मूल संस्कृत ग्रन्थ का नाम नही पता चल पाया है|

आर्यभटीय:

आर्यभट का सर्षश्रेष्ठ ग्रन्थ आर्यभटीय है जो कि 108 श्लोको का एक खगोलीय लघु ग्रन्थ है, और जिसमे उस काल तक का भारतीय गणित समाया है| इसके गणितीय भाग मे 33 श्लोको मे 66 गणितीय सिद्धान्त दिये गये, परन्तु उनकी विधियाँ नही दी गयी है| आर्यभटीय मे 13 श्लोको का परिचय, 33 श्लोको मे गणित, 25 श्लोको मे समय और ग्रहीय सिद्धांतो की गणनायें, और अन्तिम 50 श्लोको मे गोलो और ग्रहण के सिद्धान्त दिये गये है|

हालांकि ऊपर दिये गये प्रारूप में कुछ भ्रम है जिसे Van der Waerden ने दूर किया| उनके अनुसार आरम्भ का परिचय (13 श्लोक) को बाद मे जोडा़ गया है| इन 13 श्लोको और बाकी के भागो मे एकरूपता नही है| पुनः इसे “दशगीतिका” नाम दिया गया है जबकि इसमे कुल 13 श्लोक (11 गीति श्लोक और 2 आर्य श्लोक) है| Van der Waerden का मानना है कि ये श्लोक और बाकी पुस्तक के भी कुछ श्लोक (जिन्हे Van der Waerden ने पहचाना है) आर्यभट के बाद कुसुमपुरा मे आर्यभट विद्यालय के सदस्यो के द्वारा लिखे गये है|

इस पुस्तक का यह नाम भी बाद के टिप्पणीकारो ने दिया| आर्यभट ने सम्भवतः इसे कोई नाम नही दिया था| आर्यभट के अनुगामी भास्कर प्रथम ने इसे अश्मक-तंत्र कहा| कुछ स्थानो पर इसे आर्य-शत-अष्ट(आर्यभट के 108) भी कहा गया है| इसे सूत्रों की भांति लघु श्लोको मे लिखा गया है, जिसे प्राचीन काल मे कण्ठस्थ करने की परम्परा थी| व्याख्या के अभाव मे टिप्पणीकारो ने इसकी अपनी अपनी व्याख्यायें दी| पूरा ग्रन्थ और 13 श्लोको का परिचय चार पादो मे विभक्त है-

1. गीतिकापाद(13 श्लोक): इसमे आर्यभट के युग सिद्दान्त को दिया गया है| कल्प, मन्वन्तर, युग इत्यादि, समय के बड़े मात्राओ की अवधारणा इसमे दी गयी है जो कि पूर्व मे लगध के “वेदांग ज्योतिष” (ca. 1st c. BCE) से अलग है| एक श्लोक मे ज्या (sine) के विभिन्न मानो की सम्पूर्ण सूची दी गयी है| ग्रहो की गति के सम्बन्ध मे एक महायुग को 4.32 मिलियन वर्ष (43 लाख 20 हजार वर्ष) बताया गया है|

2. गणितपाद (33 श्लोक): इसमे क्षेत्र-व्यवहार (mensuration), अंकीय और ज्यामितीय अनुक्रम (arithmetic and geometric progressions), शंकु-छाया (gnomon/shadows), साधारण, द्विघात, द्विवर्ण, और अनिश्चित समीकरणो ( simple, quadratic, simultaneous, and indeterminate equations) को हल करने के लिय कुक्कुट विधि दी गयी है|

3. कालक्रियापाद (25 श्लोक): इसमे समय के विभिन्न मात्रक,किसी दिन विशेष को किसी ग्रह की स्थिति ज्ञात करने की विधी, अधिकमास की व्याख्या और गणना, क्षाया-तिथि, सात दिनों का सप्ताह, और सप्ताह के सातो दिनो के नाम प्रस्तुत किये गये है|

4. गोलापाद (50 श्लोक): ब्रह्माण्ड के ज्यामितीय और त्रिकोणमितीय परिप्रेक्ष्य, ग्रहण का सिद्धान्त, ग्रहो की (भू)मध्य रेखा, पृथ्वी का आकार, दिन और रात होने के कारण, क्षितिज पर राशिचक्र का उदय इत्यादि इस भाग मे दिये गये है|

आर्यभट ने गणित और खगोल विज्ञान मे बहुत से महत्वपूर्ण और साहसिक कार्य किये, जिनका प्रभाव शताब्दियो बाद भी देखा जा सकता है| भास्कर प्रथम ने भाष्य (ca 600) और नीलकान्त सोमायजी ने आर्यभटीय भाष्य (1465) मे आर्यभटीय को महत्वपूर्ण विस्तार दिया है|

आर्यभट द्वारा प्रस्तुत कुछ महानतम गणितीय उपल्ब्धियाँ प्रस्तुत की जा रही है-

1. अंकगणित -

स्थानमान पद्धति और शून्य-

संख्याओं के लिये स्थानमान पद्धति, जिसे सर्वप्रथम भक्षली पाण्डुलिपि मे देखा गया, निस्संदेह आर्यभट की उपलब्धि थी| हालांकि उन्होने संख्याओ के लिये प्रतीको का प्रयोग नही किया, लेकिन फ्रांसीसी गणितज्ञ Georges Ifrah के अनुसार, आर्यभट के स्थानमान सिद्धान्त मे शून्य एक स्थान और दस के घात के रूप मे, शून्य गुणांक के साथ विद्यमान है|

हालांकि आर्यभट ने ब्राह्मी संख्याओं का प्रयोग नहीं किया, और वैदिककाल से चले आ रहे संस्कृत परम्परा को आगे बढाया| उन्होने संख्याओ और अन्य मात्राओ (जैसे sine के मानो की सूची) के लिये संस्कृत अक्षरो का प्रयोग किया|
इस प्रकार देवनागरी लिपि के 33 व्यंजनो का प्रयोग गणित मे 1, 2, 3, 4, …, 25, 30, 40, 50, 60, 70, 80, 90, 100 संख्याओ के लिये किया गया| आगे की संख्याओ (1000, 10000,…) के लिये व्यंजन के आगे एक स्वर लगा दिया गया| इस प्रकार की व्यवस्था मे 10^18 तक की संख्याओ को व्यक्त किया जा सकता है| फ्रांसीसी गणितज्ञ Georges Ifrah ने आर्यभट की विद्वता के बारे मे लिखा है-

“… it is extremely likely that Aryabhata knew the sign for zero and the numerals of the place value system. This supposition is based on the following two facts: first, the invention of his alphabetical counting system would have been impossible without zero or the place-value system; secondly, he carries out calculations on square and cubic roots which are impossible if the numbers in question are not written according to the place-value system and zero. “

आर्यभट के द्वारा दिये गये अन्य नियमो मे n पूर्णांको का योग, इनके वर्गो का योग, और इनके तृतीय घातो (cubes) का भी योग दिया गया है|

पाई (pi) एक परिमेय (irrational) संख्या है-

आर्यभट ने पाई (pi) का मान निकालने मे महत्वपूर्ण कार्य किया, और निस्संदेह यह पाया होगा कि यह एक परिमेय संख्या है| आर्यभटीय के गणितपाद मे उन्होने लिखा है-

आर्य२.१०क/ चतुर्-अधिकम् शतम् अष्ट-गुणम् द्वाषष्टिस् तथा सहस्राणाम्/
आर्य२.१०ग/ अयुत-द्वय-विष्कम्भस्य आसन्नस् वृत्त-परिणाहस्//

“Add four to 100, multiply by eight and then add 62,000. By this rule the circumference of a circle of diameter 20,000 can be approached.”

इस श्लोक के अनुसार किसी वृत्त के परिधि काऔ सके व्यास से अनुपात ((4+100)×8+62000)/20000 = 3.1416 होता है, जो पांच अंको तक शुद्ध मान है| वास्तव मे π = 3.14159265 (8 अंको तक शुद्ध मान) होता है|

यदि यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि आर्यभट को π का शुद्ध मान ज्ञात था, तो उससे भी आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उन्होने इस मान का प्रयोग करने के बजाय √10 = 3.1622 का प्रयोग किया है| आर्यभट ने इस शुद्ध मान को कैसे पाया, इसकी जानकारी वह नही देते है| परन्तु अहमद ( A Ahmad, On the pi of Aryabhata I, Ganita Bharati 3 (3-4) (1981), 83-85.) के अनुसार 256 भुजाओ वाले बहुभुज, जो कि एक वृत्त के अन्दर बना है, के अर्धपरिमाप की गणना है| हालांकि Bruins (E M Bruins, With roots towards Aryabhata’s pi-value, Ganita Bharati 5 (1-4) (1983), 1-7.) के अनुसार यह परिणाम, भुजाओ की संख्या को दुगुना करने पर नही निकलता है| एक अन्य लेखक पी झा, आर्यभट के π के बारे मे लिखते है -

“Aryabhata I’s value of π is a very close approximation to the modern value and the most accurate among those of the ancients. There are reasons to believe that Aryabhata devised a particular method for finding this value. It is shown with sufficient grounds that Aryabhata himself used it, and several later Indian mathematicians and even the Arabs adopted it. The conjecture that Aryabhata’s value of π is of Greek origin is critically examined and is found to be without foundation. Aryabhata discovered this value independently and also realised that π is an irrational number. He had the Indian background, no doubt, but excelled all his predecessors in evaluating π. Thus the credit of discovering this exact value of π may be ascribed to the celebrated mathematician, Aryabhata I.”

आर्यभट ने “आसन्न (appeoaching) शब्द का प्रयोग किया है, जो कि यह प्रदर्शित करता है कि यह मान एक अनुमान है, साथ ही यह भी बताता है कि यह मान अतुलनीय (incommensurable : impossible to measure) है, अर्थात परिमेय (irrational) है| यही तथ्य युरोप मे 1761 मे Lambert ने सिद्ध किया|

जब आर्यभटीय का अरबी मे अनुवाद हुआ, अल्-ख्वारिज़्मी ने इस मान को अपनी बीजगणित की पुस्तक मे भी स्थान दिया|

-क्रमशः

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दुनिया को तब गिनती आयी…

“The ingenious method of expressing every possible number using a set of ten symbols (each symbol having a place value and an absolute value) emerged in India. The idea seems so simple nowadays that its significance and profound importance is no longer appreciated. It’s simplicity lies in the way it facilitated calculation and placed arithmetic foremost amongst useful inventions.”

– Laplace, French mathematician.

लाप्लास का यह कथन कितना तर्कसंगत लगता है जब हम वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति को देखते हैं| गणित और विज्ञान के वर्तमान स्वरूप की कल्पना शून्य के बिना असंभव है| सत्य ही कहा है-

जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आयी|”

भारत मे शून्य का प्रथम वास्तविक प्रमाण 876 AD के एक मन्दिर के शिलालेख मे मिलता है| यह शिलालेख ग्वालियर के चतुर्भुज मन्दिर मे मिला है| यहाँ पर 187 गुणे 270 हस्त का एक बागीचा लगाया गया था, जिससे 50 पुष्पमालाये प्रतिदिन मन्दिर को भेजी जाती थी| शिलालेख पर 270 और 50 (२७० और ५०) लगभग उसी प्रकार से लिखे गये है जिस प्रकार आज लिखे जाते है|

परन्तु ऐसा नही है की 876 AD मे शून्य का प्रथम प्रयोग किया गया हो| शून्य के संदर्भ मे सबसे प्राचीन एक जैन पुस्तक लोकविभाग” (458 BC) मानी जाती है| इसमे संख्याओं के लिये संस्कृत के शब्दो का प्रयोग किया गया था| कुछ अन्य प्राचीन भारतीय पाण्डुलिपियों मे शून्य के लिये बिन्दु के प्रयोग के भी प्रमाण मिले है, परन्तु उन्ही पाण्डुलिपियो मे अज्ञात के लिये भी बिन्दु का प्रयोग किया गया है| आर्यभट्ट वह प्रथम गणितज्ञ थे जिन्होने शून्य का गणित मे व्यापक प्रयोग किया| लगभग 498 AD मे आर्यभट्ट ने विश्व को दाशमिक संख्या पद्धति दी| वे लिखते है- स्थानम स्थानम दश गुणम्|” इसमे उन्होने शून्य के लिये एक शब्द “ख” का प्रयोग किया था|

परन्तु कथानक यहीं समाप्त नही होता है| अभी तो शून्य का गणित विकसित करना बाकी था| गणित मे शून्य एक संख्या है, तथा दाशमिक संख्या पद्धति का आधार है, परन्तु इसके गणितीय गुणो की विवेचना अभी बाकी थी| शून्य के साथ साथ ऋणात्मक संख्याओ के गणित के विकास मे तीन गणितज्ञो ने प्रमुख योगदान दिया| वे थे- ब्रह्मगुप्त, महावीर, और भास्कर|

ब्रह्मगुप्त ने 628 AD मे लिखित अपने पुस्तक ब्रह्मगुप्त सिद्धांत” मे अंकगणित के कुछ नियम दिये गये है| वे कहते है कि किसी संख्या को उसी संख्या से घटाने पर शून्य मिलता है| शून्य से संबन्धित योग के लिये निम्नलिखित नियम देते है-

शून्य और एक ऋणात्मक संख्या का योग एक ऋणात्मक संख्या होती है| शून्य और एक धनात्मक संख्या का योग एक धनात्मक संख्या होती है| शून्य और शून्य का योग शून्य होता है|

घटाने की क्रिया थोड़ी जटिल है-

किसी ऋणात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर धनात्मक संख्या मिलती है| किसी धनात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर ऋणात्मक संख्या मिलती है| किसी ऋणात्मक संख्या से शून्य को घटाने पर वही ऋणात्मक संख्या मिलती है| किसी धनात्मक संख्या से शून्य को घटाने पर वही धनात्मक संख्या मिलती है| शून्य से शून्य को घटाने पर शून्य मिलता है| एक धनात्मक और ऋणात्मक संख्या का योग उनके अन्तर के बराबर होता है, और यदि उन संख्याओं का निरपेक्ष मान बराबर हो तो योग शून्य होता है|

ब्रह्मगुप्त आगे बताते है -

किसी संख्या को शून्य से गुणा करने पर शून्य मिलता है|

परन्तु भाग की क्रिया थोड़ी जटिल है-

किसी धनात्मक अथवा ऋणात्मक संख्या को शून्य से भाग देने पर एक भिन्न संख्या (fractional number) मिलती है जिसका हर (denominator) शून्य होता है| शून्य को किसी धनात्मक अथवा ऋणात्मक संख्या से भाग देने पर निष्कर्ष शून्य अथवा एक भिन्न संख्या होती है जिसका अंश (numerator) शून्य और हर (denominator) वह संख्या होती है| शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य मिलता है|

निस्सन्देह ब्रह्मगुप्त भाग कि क्रियाओं मे थोड़े भ्रमित थे, परन्तु उनका प्रयास सराहनीय था| वह पहले ऐसे गणितज्ञ थे जिसने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं का अंकगणित प्रस्तुत किया|

ब्रह्मगुप्त से लगभग 200 वर्षो के बाद, 830 AD मे भारतीय गणितज्ञ महावीर ने गणित सार-संग्रह “ लिखा| यह पुस्तक ब्रह्मगुप्त सिद्धांत का ही एक विकसित रूप लगती है| महावीर यहाँ स्पष्टतः लिखते है-

…किसी संख्या को शून्य से गुणा करने पर शून्य प्राप्त होता है, किसी संख्या से शून्य घटाने पर वह अपरिवर्तित रहती है|

हालांकि ब्रह्मगुप्त की कमियों को दूर करने मे वह असफल रहे है-

किसी संख्या को शून्य शून्य से भाग देने पर वह अपरिवर्तित रहती है|

ब्रह्मगुप्त से लगभग 500 वर्षो के बाद भास्कर भी शून्य के बारे मे बहुत कुछ सिद्धान्त देते है, परन्तु इतना समय बीत जाने पर भी वह शून्य से भाग देने की क्रिया को नही समझा पाये| वह लिखते हैं-

किसी संख्या को शून्य से भाग देने पर एक भिन्न संख्या (fractional number) मिलती है जिसका हर (denominator) शून्य होता है| इस भिन्न संख्या को अनंत कहा जाता है| शून्य को हर के स्थान पर रखने वाली यह संख्या इसमे से कुछ भी निकाले या इसमे कुछ भी जोड़े जाने पर भी अपरिवर्तनीय है, ठीक उसी प्रकार जैसे इस संसार के निर्माण और नष्ट होने से उस अनंती ईश्वर पर कोई प्रभाव नही पड़ता है|”

इस प्रकार भास्कर ने इस समस्या को n/0 = ∞ लिख कर हल करने का प्रयास किया| परन्तु हम जानते है कि यह भी सही नही है| वस्तुतः n/0 अपरिभाषित है, किसी भी संख्या को शून्य से भाग नही दिया जा सकता| हालांकि भास्कर ने शून्य के अन्य गुणो को ठीक लिखा है, जैसे- 0X0 = 0, और √0 = 0

भारतीयो का यह उद्दीप्त कार्य मुस्लिम और अरबी गणितज्ञो ने संसार मे पहुँचाया | 9वीं शताब्दी मे एक पारसी गणितज्ञ मुहम्मद इब्न् मूसा अल्-ख़्वारिज़्मी ने एक पुस्तक Algoritmi de numero Indorum (“al-Khwārizmī on the Hindu Art of Reckoning”) लिखी जिसमे उसने दस प्रतीको 1,2,3,4,5,6,7,8,9 और 0 पर आधारित भारतीय स्थान-मान संख्या-पद्धति का वर्णन किया था| आज जहाँ पर इराक है, वहाँ पर इसी पुस्तक ने शून्य का प्रयोग शुरु किया| इस पुस्तक का यह नाम इटली के एक इतिहासकार Baldassarre Boncompagni द्वारा दिया गया, मूल अरबी नाम संभवतः किताब्-अल्-ज़ाम्-व्-ल्-तफरीक़ बी-हिसाब् अल्-हिन्द्” (“The Book of Addition and Subtraction According to the Hindu Calculation”) था| 12वीं शताब्दी मे अब्राहम-बेन्-मीर्-इब्न इर्ज़ा ने भारतीय अंको और दाशमिक भिन्न संख्याओ पर तीन पुस्तके लिखी जिसने युरोप के विद्वानो का ध्यान भी आकर्षित किया| The Book of the Number मे पूर्णांको के लिये बांये से दांये स्थान-मान संख्या-पद्धति का वर्णन किया गया है| इब्न इर्ज़ा ने इस पुस्तक मे शून्य को गलगल कहा है, जिसका अर्थ होता है वृत्त| कुछ समय पश्चात 12वीं शताब्दी मे ही  एक अरबी गणितज्ञ इब्न्-याह्या अल्-मग़रीबी अल्-समवाल ने बीजगणित की एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था- अल्-बहिर् फि-ल्-जब्र (The brilliant in algebra)| इसमे शून्य के बारे मे विस्तार से चर्चा की गयी है|

भारतीय गणित पश्चिम मे इस्लामिक देशो के साथ-साथ पूर्व मे चीन मे भी फैली| 1247AD मे चीनी विद्वान चिन् चियु-शाउ ने अपनी पुस्तक Shushu Jiuzhang (Mathematical Treatise in Nine Sections) मे शून्य के लिये O का प्रयोग किया है|

भारतीय गणित को यूरोप मे पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य प्रसिद्ध इटैलियन गणितज्ञ लियोनार्दो पिसानो फिबोनक्कि (Leonardo Pisano Fibonacci) ने किया| 1202 AD मे लिखी अपनी पुस्तक “लिबर अबेकि” (Liber abaci) मे फिबोनक्कि ने दसो भारतीय अंको (1, 2, …9 और 0 ) का प्रयोग किया है| गौरतलब है कि फिबोनक्कि ने 1,2,3,4,5,6,7,8,9 को अंक कहा है, परन्तु 0 को केवल एक प्रतीक|

पूरे संसार के लोग ध्यान देते गये और इस प्रकार धीरे धीरे पूरे संसार मे भारतीय संख्या पद्धति अपना ली गयी| आज भी संख्याओं पर भारतीय प्रभाव देखा जा सकता है| भारतीय अंको और वैश्विक अंको मे समानता स्पष्ट दिखती है| १ = 1, २ = 2, ३ = 3, ६ = 6, ० = 0| नीचे दी गयी सूची मे संस्कृत्, लैटिन्, इटैलियन और फ्रेन्च संख्याये तुलनात्मक रूप से लिखे है|

numbers

स्पष्ट है कि लैटिन शब्दो को संस्कृत से ही लिया गया है| यहाँ तक कि संख्याओं का क्रम भी अपरिवर्तित रहता है| अंग्रेजी का शब्द ज़ीरो (zero) भी संस्कृत से ही लिया गया है| संस्कृत मे इसे शून्य कहते है, अरबी मे अशिफ्र् (बाद मे शिफ्र् sifra) कहा जाने लगा| लैटिन मे सिफ्र (cifra), तत्पश्चात इटैलियन मे ज़ेफिरो (zefiro), ज़ेफ्रो (zefro), और बाद मे ज़ेवेरो (zevero) कहा जाने लगा, और अन्त मे अंग्रेजी मे ज़ीरो (zero)|

कुछ वर्षो पहले नयी सहस्त्राब्दि की शुरुआत 1 जनवरी 2000 को मनायी गयी| इसे देख कर लगता है कि संसार को अभी भी शून्य पूरी तरह से समझ नही आया है| 31 दिसम्बर 1999 की रात 12 बजे इसवी कैलेण्डर के 1999 वर्ष पूरे हुये| 2000 वर्ष तो 31 दिसम्बर 2000 को पूरे हुये थे| तो नयी सहस्त्राब्दि की शुरुआत 1 जनवरी 2000 को नही बल्कि 1 जनवरी 2001 को हुयी थी|

Ref:

http://www-history.mcs.st-andrews.ac.uk/HistTopics/Zero.html

http://en.wikipedia.org/wiki/0_(number)

http://www.timelineindex.com/content/view/1452

http://mathforum.org/k12/mayan.math/

http://mathforum.org/k12/mayan.math/mayan2.html

http://mathforum.org/k12/mayan.math/mayan3.html

http://en.wikipedia.org/wiki/Numeral_system

http://en.wikipedia.org/wiki/Al-Khwarizmi#Arithmetic

http://en.wikipedia.org/wiki/Abraham_ibn_Ezra

http://www.gap-system.org/~history/Mathematicians/Ezra.html

http://en.wikipedia.org/wiki/Al-Samawal

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जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने…..

मनोज कुमार की प्रसिद्ध फिल्म (चलचित्र) का यह गीत तो सभी ने सुना होगा| भारत के गौरवगाथा को कहता यह गीत सबसे पहले ज़ीरो की महत्ता बताता है| अब यह तो सभी मानते है कि ज़ीरो (शून्य) भारत ने ही संसार को दिया| परन्तु कब? शून्य का अविष्कार कब हुआ था? कैसे इसका प्रचार सारे संसार मे हुआ? क्या केवल भारतीय ही थे जिन्हे रिक्त को व्यक्त करने का विचार सूझा? आइये कुछ चर्चा करें इस बात पर|

zero

शून्य का प्रयोग दो तरीको से किया जाता है| प्रथमतः यह एक संख्या है जो कि “कुछ नहीं” को प्रदर्शित करती है| यदि आपके पास 5 रुपये है और वह आपने मुझे दे दिये तो आपके पास कितने रुपये बचे? कुछ नही| गणित की भाषा मे इसे शून्य कहा जाता है| शून्य का दूसरा प्रयोग दाशमिक स्थानमान संख्या पद्धति मे खाली स्थान को दिखाने के लिये किया जाता है| उदाहरण के लिये एक संख्या 304 को देखते है| इकाई स्थान पर 4 है, और सैकड़ा के स्थान पर 3 है, परन्तु दहाई के स्थान पर कुछ नही है| 304 को हम 3X10X10+0X10+4 भी लिख सकते है| अतः हम कह सकते है कि शून्य को दाशमिक आधार दिखाने के लिये प्रयोग किया जाता है|

अब आते है इतिहास पर| अंग्रेजी मे शून्य को ज़ीरो (zero) कहते है, जो कि अरबी शब्द शिफ्र से आया है| शून्य का इतिहास कुछ ऐसा नहीं है कि किसी को इसका विचार आया और फिर सभी उसका प्रयोग करने लगे| इसका इतिहास बहुत ही अस्पष्ट और विस्तृत है| प्रथम विचार भारतीय धर्म-ग्रन्थो मे मिलता है, जहाँ बताया गया है कि सृष्टि की रचना शून्य से हुई है| परन्तु यह इसका आध्यात्मिक रूप है, गणितीय नही| ऐसा भी नही है कि पहले स्थानमान संख्या पद्धति अस्तित्व मे आया फिर शून्य| क्योकि स्थानमान संख्या पद्धति का अस्तित्व तो बिना शून्य के भी विभिन्न रूपो मे था|

सबसे पहले स्थानमान संख्या-पद्धति का आविष्कार लगभग 3100 BC मे बेबीलोन मे माना जाता है| बेबीलोन मे आधार-60 (sexagesimal) वाली एक संख्या पद्धति विकसित थी| आरम्भ मे 60 से उपर की संख्याओ के लिये इसमे कुछ समस्यायें थी| आधार-60 प्रदर्शित करने के लिये कोई चिन्ह नही था, अतः 23, 23X60, 23X60X60, इत्यादि संख्यायें एक ही प्रतीत होती थी| लगभग 400 BC के आसपास बेबीलोन के विद्वानो ने इसके लिये एक चिन्ह का उपयोग करना आरम्भ किया| लगभग 700 BC मे मेसोपोटामिया मे भी इस रिक्त स्थान को दिखाने के लिये चिन्ह का प्रयोग किया जाता था| बेबीलोन की यह आधार-60 वाली संख्या पद्धति का उपयोग आज भी किया जाता है, कोण के माप मे| एक अंश को o से, 1/60 अंश को ” से तथा (1/60)” को ‘ से प्रदर्शित करते है|

babylonian_numerals

लगभग इसी समय ग्रीक विद्वानो ने भी खाली स्थान को एक संकेत से दिखाना आरम्भ किया, परन्तु उन्होने बेबीलोन कि स्थानमान संख्या पद्धति को नही लिया, क्योंकि उनका मुख्य ध्यान संख्या पद्धति पर नही बल्कि ज्यामिति पर था| ग्रीक विद्वानो ने शून्य के लिये जिस चिन्ह का प्रयोग किया वह था “O” | यह संकेत कहाँ से लिया गया, इसके बारे मे अलग-अलग मत है| कुछ का कहना है कि यह ग्रीक शब्द “ouden” (जिसका अर्थ होता है “कुछ नही”) का पहला अक्षर “omicron” है, और कुछ का कहना है कि यह लगभग शून्य मूल्य वाले सिक्के “obol” के लिये है| ऐसे भी संकेत मिलते है कि ग्रीक दार्शनिक शून्य की स्थिति के बारे मे भ्रमित थे| वह स्वयं से पूछते थे “कैसे कुछ नहीं कुछ हो सकता है?”|

दक्षिण-मध्य मैक्सिको और मध्य अमेरिका मे विकसित मेसोमेरिकन कैलेन्डर मे भी शून्य का प्रयोग किया गया था| इसमे आधार-20 (vigesimal) माया संख्या पद्धति का प्रयोग किया गया था| हालांकि इस पद्धति का उदगम स्थल कहाँ है, यह अभी विवाद का विषय है|

chinese-numbers

भारतीय गणित मे 400 BCE के आसपास गणनाओं के लिये एक गणना पटल का प्रयोग किया जाता था| इसमे भी शून्य के उपयोग के प्रमाण मिलते है| चीन मे 400BC से गणना के लिये दण्डो (counting rods) का प्रयोग किया जाता था| चीनी गणित मे शून्य के साथ-साथ ऋणात्मक संख्याओ के भी प्रमाण मिलते है, परन्तु शून्य के लिये वे किसी चिन्ह का प्रयोग नही करते थे| 13वीं

शताब्दी मे चीनी विद्वानो ने शून्य के लिये “O” का प्रयोग शुरु किया| कुछ विद्वानो का मत है यह चिन्ह भारत से 718 AD मे एक विद्वान गौतम सिद्ध (Chinese: Qútán Xīdá, fl. 8th century) द्वारा चीन मे पहुँचा| यह ध्यान देने की बात है कि चीनी संख्या पद्धति भी दाशमिक संख्या पद्धति थी, परन्तु उतनी परिष्कृत नही जितनी भारतीय संख्या पद्धति|

रोमन

अंको मे शून्य के लिये किसी चिन्ह का नही बल्कि एक शब्द null (जिसका अर्थ “कुछ नहीं” होता है) का प्रयोग करते थे|

भारत मे इसका इतिहास बहुत प्राचीन है| जैसा कि ऊपर बताया गया है, भारतीय धर्म-ग्रन्थो मे लिखा मिलता है कि सृष्टि की रचना शून्य से हुई है| जैसा कि श्री मुखर्जी (Discovery of Zero and its impact on India के लेखक) कहते है-

… the mathematical conception of zero … was also present in the spiritual form from 17 000 years back in India.


हड्प्पा की सभ्यता मे भी दाशमिक पद्धति के संकेत मिले है| हड़प्पा मे प्राप्त वस्तुओं के भारो के अनुपात 0.05, 0.1, 0.2, 0.5, 1, 2, 5, 10, 20, 50, 100, 200, और 50 मिले है, यह सभी दाशमिक भाज्य है|

शून्य का वर्तमान रूप भारत द्वारा दिया गया है| हालांकि चीनी भी दाशमिक आधार वाले संख्या पद्धति का प्रयोग कर रहे थे, उनकी पद्धति मे बहुत कमियां थी| यह भारतीय संख्या पद्धति है जो कि अरब के रास्ते पश्चिम मे पहुँची और आज वैश्विक रूप से स्वीकार की गयी है| प्रसिद्ध फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास के शब्दो मे- “प्रत्येक संभव संख्या को केवल दस प्रतीको के समूह से दर्शाने (प्रत्येक प्रतीक का एक स्थानीय मान तथा एक निरपेक्ष मान होता है) की सरल विधि भारत मे विकसित हुई| देखने मे यह विचार इतना सरल लगता है कि आज इसके महत्व की सराहना नही की जा रही है| इसकी सरलता इस बात मे है कि इसके कारण गणनाये सरल हो गयी और अंकगणित  आविष्कारो मे अग्रणी हो गया|”

जहाँ पश्चिम मे बोझिल रोमन अंक प्रणाली मे संख्याओ की अधिकता एक प्रमुख बाधा के रूप में सामने थी, वहीं चीन के सचित्र संख्याओं की जटिलता एक अन्य बाधा थी| परन्तु भारत की संख्या पद्धति मे सब कुछ व्यवस्थित और सरल था| शून्य के व्यापक उपयोग के साथ दाशमिक संख्या पद्धति ने वैज्ञानिक प्रगति मे बहुत बड़ा योगदान दिया|

भारत मे किन-किन गणितज्ञो ने शून्य के विकास मे योगदान दिया तथा यह संसार मे किस प्रकार फैली, इसकी चर्चा हम इस लेख के अगले अंक मे करेंगे| अपने विचारो से हमे अवश्य अवगत करायें|

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