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क्यों श्रेष्ठतम है संस्कृत?

संस्कृत भारत की एक शास्त्रीय भाषा है। यह दुनिया की सबसे पुरानी उल्लिखित भाषाओं में से एक है। संस्कृत को श्रेष्ठतम कहने के बहुत से कारण है, जैसे सर्वश्रेष्ठ व्याकरण, त्रुटिहीन व्याकरण, सरल एवं वैज्ञानिक, और प्राचीनता| यहाँ पर संस्कृत की कुछ विशेषताओ को बताना चाहता हूँ जो कि इसे एक विशिष्ट स्थान प्रदान करते है|

संस्कृत हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की हिन्द-ईरानी शाखा की हिन्द-आर्य उपशाखा में शामिल है। लेकिन कुछ विद्वान इसे ग्रीक और लैटिन के साथ रखने पर आपत्ति करते है| आपत्ति भी ध्यान देने योग्य है| यह एक स्थापित तथ्य है कि इन प्राचीन भाषाओं मे संस्कृत के अपभ्रंश मिलते है| निश्चित रूप से संस्कृत इन भाषाओ से पुरानी होनी चाहिये| इस प्रकार संस्कृत सबसे प्राचीन भाषा है| ये आदिम-हिन्द-यूरोपीय भाषा से बहुत ज़्यादा मेल खाती है। आधुनिक भारतीय भाषाएँ जैसे हिन्दी, उर्दू, कश्मीरी, उड़िया, बांग्ला, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, नेपाली, असमी आदि इसी से उत्पन्न हुई हैं। इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है।

संस्कृत में हिन्दू धर्म के लगभग सभी धर्मग्रन्थ लिखे हुए हैं। आज भी हिन्दू धर्म के ज़्यादातर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही होती हैं। संस्कृत का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है जो हिन्दू धर्म की प्रमुख किताब वेद की भाषा है। अधिकांश लोग पाणिनि की अष्टाध्यायी से काव्य संस्कृत की शुरुआत मानते हैं। रामायण, महाभारत और पुराण, काव्य संस्कृत में लिखे गये हैं।

संस्कृत शब्द दो शब्दों “सम्” (अर्थात्, सम्पूर्ण) और “कृतम्” (अर्थात्, किया गया) से मिलकर बना है| इस शब्द का अर्थ होता है- सम्पूर्ण, त्रुटिहीन| संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। बहुत प्राचीन काल से ही अनेक व्याकरणाचार्यों ने संस्कृत व्याकरण पर बहुत कुछ लिखा है। किन्तु पाणिनि का संस्कृत व्याकरण पर किया गया कार्य सबसे प्रसिद्ध है। उनका अष्टाध्यायी किसी भी भाषा के व्याकरण का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।

ध्वनि-तन्त्र और लिपि

संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन विशेष रूप से यह देवनागरी मे लिखी जाती रही है|। देवनागरी शब्द वस्तुतः “देवनाम गरिही” से व्युत्पन्न हुआ है और इसका अर्थ है “देवों की भाषा”| देवनागरी लिपि असल में संस्कृत के लिये ही बनी है, इसलिये इसमें हरेक चिह्न के लिये एक और सिर्फ़ एक ही ध्वनि है। देवनागरी में 16 (10+6) स्वर और 34 व्यंजन हैं। देवनागरी से रोमन लिपि में लिप्यन्तरण के लिये दो पद्धतियाँ अधिक प्रचलित हैं : IAST और ITRANS. शून्य, एक या अधिक व्यंजनों और एक स्वर के मेल से एक अक्षर बनता है।

स्वर

ये स्वर संस्कृत के लिये दिये गये हैं। हिन्दी में इनके उच्चारण थोड़े अलग होते हैं।

vovels

संस्कृत में ऐ दो स्वरों का युग्म होता है और “अ-इ” या “आ-इ” की तरह बोला जाता है। इसी तरह औ “अ-उ” या “आ-उ” की तरह बोला जाता है।
इसके अलावा हिन्दी और संस्कृत में ये वर्णाक्षर भी स्वर माने जाते हैं :
•    ऋ — आधुनिक हिन्दी में “रि” की तरह, संस्कृत में American English syllabic / r / की तरह
•    ॠ — केवल संस्कृत में (दीर्घ ऋ)
•    ऌ — केवल संस्कृत में (syllabic retroflex l)
•    ॡ — केवल संस्कृत में (दीर्घ ऌ)
•    अं — आधे न्, म्, ङ्, ञ्, ण् के लिये या स्वर का नासिकीकरण करने के लिये
•    अँ — स्वर का नासिकीकरण करने के लिये (संस्कृत में नहीं उपयुक्त होता)
•    अः — अघोष “ह्” (निःश्वास) के लिये

व्यंजन

जब किसी स्वर प्रयोग नहीं हो, तो वहाँ पर ‘अ’ माना जाता है । स्वर के न होने को हलन्त्‌ अथवा विराम से दर्शाया जाता है । जैसे कि क्‌ ख्‌ ग्‌ घ्‌ ।

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नोट करें :
•    इनमें से ळ (मूर्धन्य पार्विक अन्तस्थ) एक अतिरिक्त वयंजन है जिसका प्रयोग हिन्दी में नहीं होता है। मराठी और वैदिक संस्कृत में इसका प्रयोग किया जाता है।
•    संस्कृत में ष का उच्चारण ऐसे होता था : जीभ की नोक को मूर्धा (मुँह की छत) की ओर उठाकर श जैसी आवाज़ करना। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनि शाखा में कुछ वाक़्यात में ष का उच्चारण ख की तरह करना मान्य था। आधुनिक हिन्दी में ष का उच्चारण पूरी तरह श की तरह होता है।
•    हिन्दी में ण का उच्चारण ज़्यादातर ड़ँ की तरह होता है, यानि कि जीभ मुँह की छत को एक ज़ोरदार ठोकर मारती है। हिन्दी में क्षणिक और क्शड़िंक में कोई फ़र्क नहीं । पर संस्कृत में ण का उच्चारण न की तरह बिना ठोकर मारे होता था, फ़र्क सिर्फ़ इतना कि जीभ ण के समय मुँह की छत को कोमलता से छूती है।

संस्कृत भाषा की विशेषताएं-

1- अक्षरों का स्वर-व्यंजन उच्चारण-

यह सबसे विशिष्ट बात है संस्कृत की, कि इसमें कोई भी व्यंजन तभी पूर्ण अक्षर बनता है, जबकि उसे किसी स्वर से मिलाया जाता है| 16 स्वर, वस्तुतः विभिन्न ध्वनियो के नमूने (‘voice pattern’) है और 34  व्यंजन इन ध्वनियों के प्रकार (‘form’ of the ‘voice pattern’ of the sound)| अतः एक व्यंजन (जैसे – क्, ख्, ट्, इत्यादि) अकेले उच्चारित नहीं किया जा सकता| लेकिन स्वरो का स्वतंत्र उच्चारण किया जा सकता है|
इस व्यवस्था को विश्व की अन्य भाषा मे नही पाया जाता है| इसलिये उन भाषाओ के अक्षरो के उच्चारण मे समानता नही दिखती| जैसे come (कम) और coma(कोमा) मे ‘co’ के दो भिन्न उच्चारण देखने को मिलते है| अंग्रेजी मे इस प्रकार के अनेक उदाहरण मिलते है|
ग्रीक भाषा ने संस्कृत के पाँच स्वरो को ग्रहण किया, और कुछ दैनिक प्रयोग के अपभ्रंश शब्दो और संख्याओ को भी| जैसे-त्रय (trias) और पंच (pente)| यह शब्द उनके पास भारत और ग्रीस के मध्य व्यापार के समय व्यापारियो के मध्य संवाद के द्वारा पहुँचे| बाद मे अंग्रेजी का जन्म हुआ| लेकिन अभी भी इन भाषाओ मे स्वरो की संख्या बहुत कम है| यही कारण है कि एक ही स्वर का कई प्रकार से प्रयोग किया जाता है|

2- संस्कृत शब्दो का निर्माण-

संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग्, और सन्धियो की सहायता से नये शब्दो का निर्माण भी सरल है| संस्कृत मे शब्दो का निर्माण पूर्णतः वैज्ञानिक तरीके किया जाता है| संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द-रूप बनाये जाते हैं, जो व्याकरणिक अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूलशब्द के अन्त में प्रत्यय लगाकर बनाये जाते हैं। शब्दो के आरम्भ मे उपसर्ग लगाकर भी नये शब्द बनाये जा सकते है|  विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 शब्द-रूप होते हैं। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।  संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। इस तरह ये कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अन्त-श्लिष्टयोगात्मक भाषा है। संस्कृत के व्याकरण को वागीश शास्त्री ने वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है।

3- विराट् शब्दावली-

संस्कृत की शब्दावली सबसे विराट् है| किसी अन्य भाषा मे इतनी बडी शब्दावली नही मिलती| यहाँ तक कि संसार की लगभग सभी प्रमुख भाषाओ मे संस्कृत से लिये गये शब्द मिलते है| उनके अपने शब्दकोश भी संस्कृत के शब्दो के बिना अधूरे है| अंग्रेजी मे बहुत से शब्द संस्कृत से लिये गये है, यह तथ्य तो आज सभी जानते है|
इसके अलावा, संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग्, और सन्धियो की सहायता से नये शब्दो का निर्माण भी सरल है|

4- व्याकरण-

इसके सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है। प्राचीन काल हो या आधुनिक काल, उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, संस्कृत का व्याकरण अपरिवर्तित रहा है| यजुर्वेद का एक उदाहरण लीजिये-
ताँस्ते प्रेताभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ||(ई.)
यहाँ एक संज्ञा है- जनः, और एक क्रिया है- गच्छन्ति जो कि गम् धातु से बना है| गम् धातु के सभी 90 रूप और, जन् संज्ञा के सभी 21 रूप बिना किसी परिवर्तन के, एक ही प्रकार से, वेदो मे, पुराणो मे और अन्य संस्कृत साहित्यो मे किया गया है| ध्यान देने योग्य बात है कि ये सभी ग्रन्थ अलग अलग समय मे अलग अलग लेखको द्वारा लिखे गये है| अन्य भाषाओ का रूप समय के साथ बदलता जाता है|

5- प्राचीनता

वैदिक संस्कृत का परिष्कृत रूप हजारो वर्ष पहले से विद्यमान है, यहाँ तक कि ग्रीक, लैटिन, और हीब्रू के आरम्भिक विकास से भी बहुत पहले|  वेद संसार के पहले साहित्य है, यह अब एक निर्विवाद तथ्य है| संस्कृत दुनिया की पहली पुस्तक की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं कोई संशय की गुंजाइश नहीं हैं।

6- प्रचुर साहित्य-

सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी हाने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है। यद्यपि संस्कृत आधुनिक विश्व मे उतनी प्रचलित नही है जितनी कि इसे होना चाहिये, फिर भी इस भाषा मे पर्याप्त साहित्य प्राचीनकाल से ही वर्तमान है| चारो वेदो की भाषा तो संस्कृत है ही, अठ्ठारह पुराण और 108 उपनिषद भी इसी संस्कारित भाषा मे लिखे गये है| श्रीमदभागवद्गीता, रामायण, महाभारत भी संस्कृत मे लिखे है| महाभारत को तो संसार का सबसे बडा महाकाव्य माना जाता है|

7- संस्कारित भाषा-

संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं वल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं वल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है ।

8- सरल भाषा-

संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे – अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।

9- त्रुटिहीन भाषा-

इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।  संस्कृत व्याकरण तर्कशास्त्र पर पूरी तरह से खरी उतरती है, और मशीनो की भाषा के लिये पूरी तरह से उपयुक्त है| 1985 मे Rick Briggs ने अपने एक लेख “Knowledge Representation in Sanskrit and Artificial Intelligence” मे इस प्रकार के विचार प्रस्तुत किये| Forbes magazine, (July, 1987) के अनुसार “Sanskrit is the most convenient language for computer software programming.” [ref - http://www.stephen-knapp.com/indian_contributions_to_american_progress.htm]

10- मष्तिष्क विकास

आधुनिक शोधो मे पाया गया है कि संस्कृत के अध्ययन से मानसिक दृढता और स्मरणशक्ति का विकास होता है और यह सर्वश्रेष्ठ अल्जाइमर-प्रतिरोधी दवाओ (anti-Alzeimer drugs) मे से एक है| [ref-http://www.galendobbs.com/theck/sanskrit.html]

भारत और विश्व के लिए संस्कृत का महत्त्व

•    संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की माता है। इनकी अधिकांश शब्दावली या तो संस्कृत से ली गयी है या संस्कृत से प्रभावित है। पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक एकरूपता आयेगी जिससे भारतीय एकता बलवती होगी। यदि इच्छा-शक्ति हो तो संस्कृत को हिब्रू की भाँति पुनः प्रचलित भाषा भी बनाया जा सकता है।
•    हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में हैं।
•    हिन्दुओं के सभी पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कार की भाषा संस्कृत ही है।
•    हिन्दुओं, बौद्धों और जैनों के नाम भी संस्कृत पर आधारित होते हैं।
•    भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली भी संस्कृत से ही व्युत्पन्न की जाती है।
•    संस्कृत, भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है। भारत की लगभग सभी भाषाएं संस्कृत से ही उत्पन्न हुई है|
•    संस्कृत का प्राचीन साहित्य अत्यन्त प्राचीन, विशाल और विविधतापूर्ण है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, और साहित्य का खजाना है। इसके अध्ययन से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति को बढावा मिलेगा। संस्कृत को कम्प्यूटर के लिये (कृत्रिम बुद्धि के लिये) सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।

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मेण्डलीव की आवर्त सारणी में संस्कृत

यदि आप कभी विज्ञान के छात्र रहे है तो रासायनिक तत्वो की आवर्त सारणी के बारे मे अवश्य जानते होंगे| लेकिन क्या आप यह जानते है कि इसके रचयिता मेण्डलीव ने इसमे तत्वो के लिये संस्कृत शब्दो का प्रयोग किया है? है ना आश्चर्यजनक!

Medeleeff_by_repinपहले इस बात पर चर्चा करते है कि रासायनिक तत्वो की आवर्त सारणी है क्या? आवर्त सारणी अथवा तत्वों की आवर्त सारणी रासायनिक तत्वों को उनकी संगत विशेषताओं के साथ एक सारणी के रूप में दर्शाने की एक व्यवस्था है। वर्तमान आवर्त सारणी मै 117 ज्ञात तत्व सम्मिलित हैं। रूसी रसायन-शास्त्री मेंडलीफ (सही उच्चारण- मेन्देलेयेव) ने सन 1869 में आवर्त नियम प्रस्तुत किया। इसके अनुसार तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुण उनके परमाणुभारों के आवर्तफलन होते हैं। अर्थात यदि तत्वों को परमाणु भार के वृद्धिक्रम में रखा जाय तो वो तत्व जिनके गुण समान होते हैं एक निश्चित अवधि के बाद आते हैं। मेंडलीव ने इस सारणी के सहारे तत्वों के भौतिक एवं रासायनिक गुणों के आवर्ती होने के पहलू को प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया। 1815 से 1913 तक इसमें बहुत से सुधार हुए ताकि नये आविष्कृत तत्वों को उचित स्थान दिया जा सके और सारणी नयी जानकारियों के अनुरूप हो। रसायन शास्त्रियों के लिये आवर्त सारणी अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है। इसके कारण कम तत्वों के गुणधर्मों को ही याद रखने से काम चल जाता है क्योंकि आवर्त सारणी में किसी समूह (उर्ध्वाधर पंक्ति) या किसी आवर्त (क्षैतिज पंक्ति) में गुणधर्म एक निश्चित क्रम से एवं तर्कसम्मत तरीके से बदलते हैं।

तत्वों के परमाणु भार के वृद्धि क्रम में क्रमबद्ध करने पर क्षैतिज कतारें प्राप्त होती हैं जिन्हें आवर्त कहते हैं। आवर्त नियम के अनुसार तत्वों को परमाणु भार के वृद्धि क्रम में क्षैतिज कतारों में सजाने पर सामन गुण वाले तत्व एक ही उर्ध्वाधर कालम में उपस्थित रहते हैं। इन्हें उर्ध्वाधर कालम के वर्ग कहते हैं। मैंडलीफ की आवर्त सारणी में कुल 8 वर्ग थे क्योंकि उस समय निष्क्रिय गैसों की खोज नहीं हुई थी। बाद में निष्क्रिय गैसों की खोज के पश्चात आधुनिक आवर्त सारणी में 9वें वर्ग को सामिल किया गया। इस 9वें वर्ग को 0 (शून्य वर्ग) कहते हैं। वर्ग एक से आठवें वर्ग को रोमन अक्षर I, II, III, IV, V, VI, VII तथा VIII द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नवें वर्ग को 0 द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इसके विकास के अंतिम चरण में राग, वर्नर, बोहर और बरी आदि वैज्ञानिकों ने आवर्त सारणी का आधुनिकतम रूप बनाया जो वर्तमान तक चलन में है। इन्होंने मेंडेलिव की आवर्त सारणी में उपस्थित श्रेणियों को खत्म किया तथा वर्गो की संख्या को 9 से बढ़ाकर 18 किया। इसके बाद भी हाइड्रोजन का दो स्थानों पर होना और लेंथेनाइड और एक्टीनाइड तत्वों को सारणी में स्थान न होना दो मुख्य दोष अब तक हैं।

आइये देखते है मेण्डलीव द्वारा 1872 मे प्रस्तुत आवर्त सारणी को|
mendeleev's 2nd table

इस आवर्त सारणी मे कुछ स्थान खाली है| वस्तुतः ये स्थान नये तत्वो की भविष्यवाणी करते है| जैसे – गैलियम (gallium) और जर्मेनियम (germanium)| इन तत्वो की भविष्यवाणी मेण्डलीव ने 1869 मे की थी और 1875 और 1886 मे इन तत्वों की खोज की गयी| इन संभावित तत्वो को मेण्डलीव ने उनके उपर लिखे तत्वो के अनुसार नाम दिया| जैसे ग्रुप-3 मे बोरान के नीचे, संभावित तत्व को एक-बोरान (eka-boron), एलुमिनियम के नीचे संभावित तत्व को एक-एलुमिनियम (eka-alluminium) इत्यादि| मेण्डलीव ने कुल 8 तत्वो के लिये संस्कृत शब्दो का प्रयोग किया था|

Eka-aluminium (एक-एलुमिनियमम)  -  Gallium
Eka-boron(एक-बोरोन)  -  Scandium
Eka-silicon(एक-सिलिकान)  -  Germanium
Eka-manganese(एक-मैंगनीज)  -  Technetium
Tri-manganese(त्रि-मैंगनीज)  -  Rhenium
Dvi-tellurium(द्वि-टेल्लुरियम)  -  Polonium
Dvi-caesium(द्वि-कैस्मियम)  -  Francium
Eka-tantalum(एक-टेन्टेलम)  -  Pratactinium

केवल इतना ही नही, आवर्त सारणी कई दृष्टिकोणो से देवनागरी वर्णमाला से भी मिलती जुलती है| देवनागरी वर्णमाला नीचे दी गयी|

अ आ इ ई उ ऊ         a ā i ī u ū
ऋ ॠ ऌ ॡ             ŗi ŗī lŗi lŗī
ए ऐ ओ औ अं अ:      e ai o au am ah

क ख ग घ ङ           k kh g gh ṅ
च छ ज झ ञ           c ch j jh ñ
ट ठ ड ढ ण            ṭ ṭh ḍ ḍh ṇ
त थ द ध न           t th d dh n
प फ ब भ म           p ph b bh m
य र ल व              y  r  l   v
श ष स ह              ś  ş  s  h

सोलह वर्णो का प्रथम समूह “स्वर” कहलाता है, और बाकी के अक्षर “व्यंजन”| सभी स्वर कंठ से निकलते है| व्यंजनो को पुनः पाँच समूहो मे बाँटा गया है|

इस प्रकार देवनागरी वर्णमाला द्वि-आयामी व्यवस्था है, जिसमे प्रत्येक अक्षर अपने क्षैतिज समूह के अन्य अक्षरो के समान है, साथ ही साथ वह उर्ध्व रेखा मे, अन्य समूहो के अक्षरो के समान गुण प्रदर्शित करता है| जैसे ‘क’ के साथ ‘ह’ का उच्चारण करने पर वह ‘ख’ बनता है, और ‘च’ को ‘ह’ से मिलाने पर ‘छ’ बनता है, तथा वर्णमाला मे ‘ख’ और ‘छ’ ऊपर-नीचे है| ध्यान देने योग्य बात है कि संसार की अन्य वर्णमालाये रैखिक है, जैसे रोमन (A, B, ….Z)|

मेण्डलीफ की आवर्त सारणी भी द्वि-आयामी है| इसमे क्षैतिज समूह और उर्ध्व समूह दोनो है|

तो क्या मेण्डलीव को संस्कृत का ज्ञान था? यदि हाँ तो क्या इस भाषा के लिये इतना सम्मान था कि अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि मे भी इसे प्रदर्शित कर दिया?

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) के प्रोफेसर पॉल किपास्की (Paul Kiparsky) के अनुसार, मेण्डलीव एक संस्कृतविद बौदलिंक (Böhtlingk) के साथी एवं मित्र थे, जो कि उस समय पाणिनि पर अपनी पुस्तक (Otto Böhtlingk, Panini’s Grammatik: Herausgegeben, Ubersetzt, Erlautert und MIT Verschiedenen Indices Versehe. St. Petersburg, 1839-40) लिख रहे थे, और मेण्डलीफ ने पाणिनि को सम्मान देने की इच्छा से ही संभावित तत्वो को ऐसे नाम दिये|

पॉल किपास्की आगे मेण्डलीफ की सारणी और देवनागरी वर्णमाला मे समानता की भी बाते करते है| उनके शब्दो मे-

” [T]he analogies between the two systems are striking.  Just as Panini found that the phonological patterning of sounds in the language is a function of their articulatory properties, so Mendeleev found that the chemical properties of elements are a function of their atomic weights.  Like Panini, Mendeleev arrived at his discovery through a search for the “grammar” of the elements (using what he called the principle of isomorphism, and looking for general formulas to generate the possible chemical compounds).  Just as Panini arranged the sounds in order of increasing phonetic complexity (e.g. with the simple stops k,p… preceding the other stops, and representing all of them in expressions like kU, pU) so Mendeleev arranged the elements in order of increasing atomic weights, and called the first row (oxygen, nitrogen, carbon etc.)  “typical (or representative) elements”.  Just as Panini broke the phonetic parallelism of sounds when the simplicity of the system required it, e.g. putting the velar to the right of the labial in the nasal row, so Mendeleev gave priority to isomorphism over atomic weights when they conflicted, e.g. putting beryllium in the magnesium family because it patterns with it even though by atomic weight it seemed to belong with nitrogen and phosphorus.  In both cases, the periodicities they discovered would later be explained by a theory of the internal structure of the elements.”

किपास्की का यह भी कहना है कि सम्भवत: पाणिनि के “शिव-सूत्र” से प्रभावित हो कर तत्वो की दो-आयामी व्यवस्था का विचार उनके मन मे आया| हालांकि इस बात के संकेत नही है कि उन्हे संस्कृत भाषा का गहरा ज्ञान था| निश्चित रूप से यह केवल संस्कृत वर्णमाला के सारणिक रूप का प्रभाव था, क्योकि यह तो किसी भी नये विद्यार्थी को भी मालूम रहता है| संस्कृत वर्णमाला के सारणिक रूप के दो कारण है- कंठ और श्वास का प्रयोग, और मेण्डलीव ने इस बात को ध्यान दिया होगा कि रासायनिक बन्ध और परमाणु भार के आधार पर तत्वो की दो-आयामी सारणी बनायी जा सकती है|

इस सिद्धान्त को ध्यान मे रखकर सारणी बनाते समय, जो स्थान खाली रह गये, मेण्डलीव के अनुसार, उस पर निश्चित रूप से कोइ तत्व होना चहिये, जो कि उस समय खोजा नही गया था| इस प्रकार उन्होने 8 नये तत्वो की भविष्यवाणी की, और उनके नामो के लिये ‘एक’,'द्वि’, और ‘त्रि’ प्रत्यय का प्रयोग किया|

उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं शताब्दी के बहुत से यूरोपीय विद्वानो ने संस्कृत का अध्ययन किया था| बौदलिंक (Böhtlingk) भी उनमे से एक थे और मेण्डलीव के मित्र भी थे| मेण्डलीव St. Petersburg Academy of Sciences मे लेक्चर देते थे जब उन्हे उनकी पुस्तक “Organic Chemistry” के लिये Demidov prize दिया गया| बौदलिंक (Böhtlingk) उस पुरस्कार के नामांकन समिति के सदस्य थे|

सन्दर्भ-
Mendeleev and the Periodic Table of Elements by Subhash  Kak

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पाणिनि – व्याकरण के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार

“मैं निर्भय कह सकता हूँ कि अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके । इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 250,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है । …. अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक विश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके ।”

- प्रसिद्ध जर्मन भारतविद मैक्स मूलर (1823 – 1900), अपनी पुस्तक साइंस आफ थाट में|

केवल मैक्समूलर ही नही, बल्कि विश्व के अनेक विद्वानो ने धीरे धीरे यह मान लिया है कि संस्कृत का व्याकरण संसार की सभी भाषाओ के व्याकरण से श्रेष्ठ और त्रुटिहीन है| विश्व के इस सर्वोत्तम भाषा के महान व्याकरण की रचना पाणिनि ने की थी तथा ऐसी मान्यता है कि उन्होने भगवान शिव के डमरु से निकली ध्वनियो के आधार पर इसका निर्माण किया था| अब यह कहाँ तक सत्य है, यह तो नही मालूम, परन्तु केवल 14 मुख्यसूत्रो के आधार पर संसार के सर्वश्रेष्ठ व्याकरण की रचना करना एक अदभुत कार्य है| पाणिनि ने ध्वनि, उच्चारण, और शब्दो के निर्माण का विस्तृत और वैज्ञानिक सिद्धान्त दिया| संस्कृत भारत की प्राचीन साहित्यिक भाषा है और पाणिनि इसके संस्थापक माने जाते है| ध्यान देने योग्य यह बात है कि “संस्कृत” शब्द का अर्थ होता है- “पूर्ण” अथवा “त्रुटिहीन”, और इसे देवभाषा भी मानी जाती है|

30 अगस्त 2004, भारतीय डाक विभाग ने पाणिनि के सम्मान मे 5 रूपये का एक डाक टिकट किया था| Panini

पाणिनि का समयकाल अनिश्चित तथा विवादित है । कोई उन्हें 7वीं शती ई. पू., कोई 5वीं शती या चौथी शती ई. पू. का कहते हैं। इतना तय है कि छठी सदी ईसा पूर्व के बाद और चौथी सदी ईसापूर्व से पहले की अवधि में इनका अस्तित्व रहा होगा । इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है ।

पाणिनि के जीवनकाल को मापने के लिए यवनानी शब्द के उद्धरण का सहारा लिया जाता है । इसका अर्थ यूनान की स्त्री या यूनान की लिपि से लगाया जाता है । गांधार में यवनो (Greeks) के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी सिकंदर के आक्रमण के पहले नहीं थी । सिकंदर भारत में ईसा पूर्व 330 के आसपास आया था । पर ऐसा हो सकता है कि पाणिनि को फारसी यौन के जरिये यवनों की जानकारी होगी और पाणिनि दारा प्रथम (शासनकाल – 421 – 485 ईसा पूर्व) के काल में भी हो सकते हैं । प्लूटार्क के अनुसार सिकंदर जब भारत आया था तो यहां पहले से कुछ यूनानी बस्तियां थीं ।

इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि इनका जन्म पंजाब के शालातुला में हुआ था जो आधुनिक पेशावर (पाकिस्तान) के करीब है। जहाँ काबुल नदी सिंधु में मिली है उस संगम से कुछ मील दूर यह गाँव था। उसे अब लहर कहते हैं। अपने जन्मस्थान के अनुसार पाणिनि शालातुरीय भी कहे गए हैं। और अष्टाध्यायी में स्वयं उन्होंने इस नाम का उल्लेख किया है। चीनी यात्री युवान्च्वाङ् (Xuanxang), (7वीं शती) उत्तर-पश्चिम से आते समय शालातुर गाँव में गए थे, जहाँ पर उन्होने पाणिनि की मूर्ति स्थापित देखी| पंचतंत्र की एक कथा के अनुसार, एक शेर इनकी मृत्यु का कारण बना|

पाणिनि का समय वैदिक काल के अन्त मे था, ऐसा उनके द्वारा दिये गये व्याकरण को देख कर कहा जा सकता है| वैदिक ग्रन्थो मे छन्दो के रूप के लिये उन्होने कुछ विशेष नियम दिये थे, जो कि उस समय के सामान्य बोलचाल के भाषा मे प्रयुक्त नही होते थे| इस प्रकार हम कह सकते है कि वैदिक संस्कृत पहले से ही विद्यमान थी, परन्तु वह लोक भाषा नही थी| पाणिनि के गुरु का नाम उपवर्ष और माता का नाम दाक्षी था। पाणिनि जब बड़े हुए तो उन्होंने व्याकरणशास्त्र का गहरा अध्ययन किया। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। पाणिनि से पहले शब्दविद्या के अनेक आचार्य हो चुके थे। उनके ग्रंथों को पढ़कर और उनके परस्पर भेदों को देखकर पाणिनि के मन में वह विचार आया कि उन्हें व्याकरणशास्त्र को व्यवस्थित करना चाहिए। पहले तो पाणिनि से पूर्व वैदिक संहिताओं, शाखाओं, ब्राह्मण, आरण्यक्, उपनिषद् आदि का जो विस्तार हो चुका था उस वाङ्मय से उन्होंने अपने लिये शब्दसामग्री ली जिसका उन्होंने अष्टाध्यायी में उपयोग किया है। दूसरे निरुक्त और व्याकरण की जो सामग्री पहले से थी उसका उन्होंने संग्रह और सूक्ष्म अध्ययन किया। इसका प्रमाण भी अष्टाध्यायी में है, जैसा शाकटायन, शाकल्य, भारद्वाज, गाग्र्य, सेनक, आपिशलि, गालब और स्फोटायन आदि आचार्यों के मतों के उल्लेख से ज्ञात होता है।

पाणिनि ने सहस्रों शब्दों की व्युत्पत्ति बताई जो अष्टाध्यागी के चौथे पाँचवें अध्यायों में है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, सैनिक, व्यापारी किसान, रँगरेज, बढ़ई, रसोइए, मोची, ग्वाले, चरवाहे, गड़रिये, बुनकर, कुम्हार आदि सैकड़ों पेशेवर लोगों से मिलजुलकर पाणिनि ने उनके विशेष पेशे के शब्दों का संग्रह किया।

पाणिनि ने यह बताया कि किस शब्द में कौन सा प्रत्यय लगता है। वर्णमाला के स्वर और व्यंजन रूप जो अक्षर है उन्हीं से प्रत्यय बनाए गए। जैसे- वर्षा से वार्षिक, यहाँ मूल शब्द वर्षा है उससे इक् प्रत्यय जुड़ गया और वार्षिक अर्थात् वर्षा संबंधी यह शब्द बन गया।

अष्टाध्यायी में तद्वितों का प्रकरण रोचक है। कहीं तो पाणिनि की सूक्ष्म छानबीन पर आश्चर्य होता हैं, जैसे व्यास नदी के उत्तरी किनारे की बाँगर भूमि में जो पक्के बारामासी कुएँ बनाए जाते थे उनके नामों का उच्चारण किसी दूसरे स्वर में किया जाता था और उसी के दक्खिनी किनारे पर खादर भूमि में हर साल जो कच्चे कुएँ खोद लिए जाते थे उनके नामों का स्वर कुछ भिन्न था। यह बात पाणिनि ने “उदक् च बिपाशा” सूत्र में कही है। गायों और बैलों की तो जीवनकथा ही पाणिनि ने सूत्रों में भर दी है।

आर्थिक जीवन का अध्ययन करते हुए पाणिनि ने उन सिक्कों को भी जाँचा जो बाजारों में चलते थे। जैसे “शतमान”, “कार्षापण”, “सुवर्ण”, “अंध”, “पाद”, “माशक” “त्रिंशत्क” (तीस मासे या साठ रत्ती तौल का सिक्का), “विंशतिक” (बीस मासे की तोल का सिक्का)। कुछ लोग अबला बदली से भी माल बेचते थे। उसे “निमान” कहा जाता था।

पाणिनि के काल में शिक्षा और वाङ्मय का बहुत विस्तार था। संस्कृत भाषा का उन्होंने बहुत ही गहरा अध्ययन किया था। वैदिक और लौकिक दोनों भाषाओं से वे पूर्णतया परिचित थे। उन्हीं की सामग्री से पाणिनि ने अपने व्याकरण की रचना की पर उसमें प्रधानता लौकिक संस्कृत की ही रखी। बोलचाल की लौकिक संस्कृत को उन्होंने भाषा कहा है। उन्होंने न केवल ग्रंथरचना को किंतु अध्यापन कार्य भी किया। (व्याकरण के उदाहरणों में उनके विषय का नाम कोत्स कहा है)। पाणिनि का शिक्षा विषयक संबंध, संभव है, तक्षशिला के विश्वविद्यालय से रहा हो। कहा जाता है, जब वे अपनी सामग्री का संग्रह कर चुके तो उन्होंने कुछ समय तक एकांतवास किया और अष्टाध्यायी की रचना की।

ऐसा माना जाता है कि पाणिनि ने लिखने के लिए किसी न किसी माध्यम का प्रयोग किया होगा क्योंकि उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द अति क्लिष्ट थे तथा बिना लिखे उनका विश्लेषण संभव नहीं लगता है । कई लोग कहते है कि उन्होंने अपने शिष्यों की स्मरण शक्ति का प्रयोग अपनी लेखन पुस्तिका के रूप में किया था । भारत में लिपि का पुन: प्रयोग (सिन्धु घाटी सभ्यता के बाद) ६ठी सदी ईसा पूर्व में हुआ और ब्राह्मी लिपि का प्रथम प्रयोग दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हुआ जो उत्तर पश्चिम भारत के गांधार से दूर था। गांधार में ६ठी सदी ईसा पूर्व में फारसी शासन था और ऐसा संभव है कि उन्होने आर्माइक वर्णों का प्रयोग किया होगा ।

पतंजलि ने लिखा है कि पाणिनि की अष्टाध्यायी का संबंध किसी एक वेद से नहीं बल्कि सभी वेदों की परिषदों से था (सर्व वेद परिषद)। पाणिनि के ग्रंथों की सर्वसम्मत प्रतिष्ठा का यह भी कारण हुआ।

पाणिनि को किसी मतविशेष में पक्षपात न था। वे बुद्ध की मज्झिम पटिपदा या मध्यमार्ग के अनुयायी थे। शब्द का अर्थ एक व्यक्ति है या जाति, इस विषय में उन्होंने दोनों पक्षों को माना है। गऊ शब्द एक गाय का भी वाचक है और गऊ जाति का भी। वाजप्यायन और व्याडि नामक दो आचार्यों में भिन्न मतों का आग्रह या, पर पाणिनि ने सरलता से दोनों को स्वीकार कर लिया।

पाणिनि से पूर्व एक प्रसिद्ध व्याकरण इंद्र का था। उसमें शब्दों का प्रातिकंठिक या प्रातिपदिक विचार किया गया था। उसी की परंपरा पाणिनि से पूर्व भारद्वाज आचार्य के व्याकरण में ली गई थी। पाणिनि ने उसपर विचार किया। बहुत सी पारिभाषिक संज्ञाएँ उन्होंने उससे ले लीं, जैसे सर्वनाम, अव्यय आदि और बहुत सी नई बनाई, जैसे टि, घु, भ आदि।

पाणिनि को मांगलिक आचार्य कहा गया है। उनके हृदय की उदार वृत्ति मंगलात्मक कर्म और फल की इच्छुक थी। इसकी साक्षी यह है कि उन्होंने अपने शब्दानुशासन का आरंभ “वृद्ध” शब्द से किया। कुछ विद्वान् कहते हैं कि पाणिनि के ग्रंथ में न केवल आदिमंगल बल्कि मध्यमंगल और अंतमंगल भी है। उनका अंतिम सूत्र अ आ है। ह्रस्वकार वर्णसमन्वय का मूल है। पाणिनि को सुहृद्भूत आचार्य अर्थात् सबके मित्र एवं प्रमाणभूत आचार्य भी कहा है।

पंतजलि का कहना है कि पाणिनि ने जो सूत्र एक बार लिखा उसे काटा नहीं। व्याकरण में उनके प्रत्येक अक्षर का प्रमाण माना जाता है। शिष्य, गुरु, लोक और वेद धातुलि शब्द और देशी शब्द जिस ओर आचार्य ने दृष्टि डाली उसे ही रस से सींच दिया। आज भी पाणिनि “शब्द:लोके प्रकाशते”, अर्थात् उनका नाम सर्वत्र प्रकाशित है। यदि महर्षि पाणिनि न होते तो दुनिया की किसी भी भाषा कोई बड़ा लेखक नहीं हो पाता। महर्षि पाणिनि ने ही भाषा की शुद्घता की जिस परंपरा को स्थापित किया, उसीका अनुरण आज दुनिया भर की भाषाओं में हो रहा है। संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है और भाषा विज्ञान की उत्पत्ति भी संस्कृत से ही हुई है।

कृतियां
पाणिनि का संस्कृत व्याकरण चार भागों में है -

माहेश्वर सूत्र – स्वर शास्त्र
अष्टाध्यायी – शब्द विश्लेषण
धातुपाठ – धातुमूल (क्रिया के मूल रूप)
गणपाठ
पतञ्जलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर अपनी टिप्पणी लिखी जिसे महाभाष्य का नाम दिया (महा+भाष्य(समीक्षा,टिप्पणी,विवेचना,आलोचना))

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