कहा जाता है कि बीता हुआ समय वापस नही आता| लेकिन भारतीय समय व्यवस्था मे बीता युग जरुर वापस आता है| हिन्दू ग्रन्थो मे समय की अवधारणा रैखिक नही वरन् चक्रीय है। एक पूर्ण समय चक्र को कल्प कहा गया। प्रत्येक कल्प मे एक हज़ार महायुगो तथा प्रत्येक महायुग मे चार युगो की व्यव्स्था की गयी। सर्वप्रथम सत्ययुग (अथवा कृ्तयुग), तत्पश्चात् त्रेतायुग, द्वापरयुग, तथा कलियुग आते है। कलियुग के पश्चात (अर्थात् एक महायुग पूर्ण होने के पश्चात), पुन: सत्ययुग तथा अन्य युग आते है। यह चक्र चलता रहता है, तथा एक हज़ार महायुगो के पश्चात एक कल्प पूरा हो जाता है। एक कल्प को ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) के एक दिवस के बराबर माना जाता है।
सत्ययुग से कलियुग की यह समय यात्रा धर्म मे एक क्रमिक गिरावट को दर्शाता है। मानव के नैतिक मानदंडों और धार्मिक पुण्यशीलता में भी कमी की बात की गयी है। मनुष्य के आयु की भी कम होता बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि सत्ययुग मे सभी मनुष्यो मे भगवद् चेतना थी; जो कि त्रेतायुग मे गिर कर केवल 75% मनुष्यो मे रह गयी; द्वापरयुग मे यह 50% तथा कलियुग (वर्तमान युग) मे यह केवल 25% मनुष्यो मे बची है। ध्यान देने योग्य बात है कि वर्तमान समय को कलियुग बताया गया है। हम लोग इस समय सबसे खराब समय मे है। अब केवल सुधार ही हो सकता है। कल्पना कीजिये यदि हम किसी और युग मे होते, तो सुधार से पहले स्थितियो को अभी और खराब होना होता। तो यह एक आशावादी व्यवस्था है, कि वर्तमान समय कलियुग है।
भ्रामक स्थिति
आइये जाने इन युगो के काल को। हिन्दू ग्रन्थो मे एक वर्ष 12 महीनो (360 दिन) का होता है। इन संख्याओ को गुणा करने पर मिलता है 360X12=4320. । अब इस संख्या के पीछे उपयुक्त शून्य लगाकर दीर्घ काल-खण्ड बनाये गये। एक महायुग 4,320,000 वर्षो के बराबर होता है। इस प्रकार एक कल्प 4,320,000,000 वर्षो का हुआ। एक कलियुग एक महायुग के दसवे भाग के बराबर होता है।
* 1 कल्प = 1000 X महायुग = 4,320,000,000 वर्ष = ब्रह्मा का एक दिन
* 1 महायुग = 10 X कलियुग = 4,320,000 वर्ष = चार युगो का एक चक्र
* 1 सत्ययुग = 4 X कलियुग = 1728,000 वर्ष
* 1 त्रेतायुग = 3 X कलियुग = 1296,000 वर्ष
* 1 द्वापरयुग = 2 X कलियुग = 864,000 वर्ष
* 1 कलियुग = 432,000 वर्ष

सूर्य – सिद्धान्त मे कहा गया है कि एक महायुग मे शनि कुल 146,568 कक्षाए पूर्ण करता है। इस प्रकार शनि का कक्षीय काल 29.4743 वर्ष होना चाहिये, जो कि आधुनिक विज्ञान के प्रकाश मे 29.657296 वर्ष निकाला गया है।
ध्यान देने योग्य बात है कि प्रसिद्ध खगोलशास्त्री आर्यभट्ट (जन्म 476AD) कुछ बिन्दूओं पर वैदिक युग सिद्धान्त से अलग जाते है। उन्होने एक कल्प को 1000 महायुगो के बजाय 1008 महायुगो के बराबर लिखा है। 1008 को 7 से पूर्णत: भाग दिया जा सकता है, अत: इस व्यव्स्था मे सभी कल्प सप्ताह के एक ही दिन से आरम्भ होंगे। यह एक दूरदर्शी विचार है। उन्होने एक महायुग को चार बराबर भागो मे विभाजित किया। आर्यभट्ट के सभी युग बराबर काल-खण्ड के है।
प्राचीन भारतीय ही सम्भवत: एकमात्र थे जो कि इतनी बड़ी संख्याओ की बात करते थे। बहुत से विद्वान इन बड़ी संख्याओ और इस प्रकार के ज्योतिष को अस्वीकार करते है। कुछ अनुसंधानकर्ता एक कलियुग की गणना 1200 वर्ष करते है, कुछ अन्य इसे 2160 वर्ष बताते है, जबकि कुछ इसे 2580 वर्ष के बराबर बताते है। पुराणो ने इस भ्रम को और बढ़ाया। पुराणो मे दिये गये इतिहास के अनुसार द्वापरयुग का अन्त समय 950BC बैठता है, जबकि आर्यभट्ट ने इसी समय को 3102BC दिया है। कुछ विद्वान रामायण को लगभग 7200BC पूर्व बताते है और महाभारत को 5500BC पूर्व। यह सभी गणनाएं हिन्दू ग्रन्थो से ही निकाले गये है।
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