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जन्मदिन की बधाई, डा० नार्लीकर!!

एक सफल और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, एक लेखक, उपन्यासकार, एक अध्यापक, अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त, कई पुरस्कारो के विजेता| ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व पद्म विभूषण डा० जयन्त विष्णु नार्लीकर को उनके जन्मदिन पर बहुत बहुत बधाईयां|

डा० नार्लीकर ऐसे वैज्ञानिक जो वैज्ञानिक समुदाय के अलावा सामान्यजन मे भी लोकप्रिय है| विज्ञान को केवल विज्ञान के विद्यार्थियो के अलावा सामान्यजन मे भी लोकप्रिय बनाने मे डा० नार्लीकर का प्रयास सराहनीय है| अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी में अनेक रोचक पुस्तके, उपन्यास, और कहानी-संग्रह के लेखक है वे| इसके अतिरिक्त वे टेलीविजन पर भी नियमित रूप से दिखायी देते है, विशेषरूप से विज्ञान प्रश्नोत्तरी कार्यक्रमो में| विज्ञान के जटिल सिद्धान्तो को सरल शब्दो मे समझाकर वह नयी पीढ़ी को वैज्ञानिक बना रहे है|


इनका जन्म 19 जुलाई 1938 को कोल्हापुर महाराष्ट्र में हुआ था। पिता विष्णु वासुदेव नार्लीकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में गणित के अध्यापक थे तथा माँ संस्कृत की विदुषी थीं। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा वाराणसी में हुई। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से स्नातक की उपाधि लेने के बाद वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गये। वहां कैम्ब्रिज से गणित की उपाधि ली और खगोल-शास्त्र एवं खगोल-भौतिकी में दक्षता प्राप्त की।

वैज्ञानिक नार्लीकर का पहला कार्य अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक डा० फ्रेड हॉयल के साथ ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति के सम्बन्ध मे “स्थायी अवस्था सिद्धान्त” (Steady State Theory) पर थी| वर्तमान मे महाविस्फोट सिद्धान्त लगभग सर्वमान्य है, परन्तु इस स्थायी अवस्था सिद्धान्त का भी बहुत महत्व है| इसमे अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति किसी विस्फोट के परिणामस्वरूप नही हुई, बल्कि यह अनन्त काल से विद्यमान है और अनन्त काल तक विद्यमान रहेगा| अपने इंग्लैंड के प्रवास के दौरान, नार्लीकर ने इस सिद्धान्त पर फ्रेड हॉयल के साथ काम किया। इसके साथ ही उन्होंने आइन्स्टीन के सापेक्षता सिद्धान्त और माक सिद्धान्त को मिलाते हुए हॉयल-नार्लीकर सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

चित्र- डॉ० फ्रेड हॉयल और डॉ० नार्लीकर

डा० नार्लीकर और हॉयल ने साथ मे कार्य करते हुये, द्रव्य के सतत निर्माण की प्रक्रिया को आईन्स्टीन के सापेक्षिकता के सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य मे सिद्ध किया| उन्होने क्वांटिक इलेक्ट्रोडाइनामिक्स (quantic electrodynamic) की भी पूरी व्याख्या की| इलेक्ट्रोडाइनामिक्स पर उनके कार्यो के परिणामस्वरूप गुरुत्वाकर्षण के एक नये सिद्धान्त का जन्म हुआ जिसे (conformal theory of gravity) कहते है|

भारत मे भी डा० नार्लीकर ने कास्मिक विज्ञान एवं खगोल-भौतिकी मे अनुसंधान जारी रखे| अपने गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त के अन्य निष्कर्षो का अध्ययन किया और बाद मे Indian Institute of Astrophysics के पी०के० दास के साथ उन्होने क्वासरो के तरंगो के अनियमितता (abnormal redshifts of quasars) की व्याख्या की|

अपने साथियो के०एम०वी० अप्पाराव (TIFR), और एन० दधिच (Poma University) के साथ नार्लीकर ने उर्जा के फटते हुए स्रोत के रूप मे श्वेत-छिद्र सिद्धान्त (white hole concept) का विकास किया, और इस प्रकार ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध मे कुछ क्रान्तिकारी सिद्धान्त दिये| 1978 मे एस०एमएस० चित्रे (TIFR) के साथ कुछ क्वासरो के अत्यधिक गति (प्रकाश से भी अधिक) को समझाने के लिये, रेडिओ तरंगो के गुरुत्वीय वक्रता सिद्धान्त दिया जो कि कुछ गैलेक्सियों की उपस्थिति के कारण होता है| नार्लीकर ने तीव्र गुरुत्वाकर्षण मे टेक्योन (tachyons) के व्यवहार पर भी अध्ययन किया|

फ्रेड हॉयल और ज्याफरी बर्बिज (Fred Hoyle and Geoffrey Burbidge) के साथ उन्होने ब्रह्माण्ड के विकास के एक पुराने सिद्धान्त के एक नये रूप Quasi-Steady State Cosmology पुनरोदय मे सक्रिय सहयोग दिया|

इनको दिये पुरस्कारो और उपाधियो की सूची बहुत लम्बी है| वे Indian National Sciences Academy (INSA), Philosophical Society (Cambridge) (Associated member), Indian Society of Physics, Indian Astronomical Society और Indian General Relativity and Gravitation Society के सक्रिय सदस्य है| Science Institute of Bombay द्वारा 1973 मे उन्हे गोल्डेन जुबिली का स्वर्णपदक प्रदान किया गया| भौतिकी के लिये प्रतिष्ठित शान्ति स्वरूप भटनागर पुरस्कार उन्हे 1978 मे दिया गया| 1983 मे उन्हे लन्दन के Royal Astronomical Society ने सहभागी बनाया| FIE Foundation ने उन्हे अपने सर्वोच्च पुरस्कार Golden Medal of the Asian Society से नवाजा| 2004 मे फ्रांस के Société Astronomique de France ने इन्हे 2004 Janssen Price दिया| इसके अलावा अन्य पुरस्कारो मे स्मिथ पुरस्कार (1962), पद्म भूषण (1965), एडम्स पुरस्कार (1967), शांतिस्वरूप पुरस्कार (1979), इन्दिरा गांधी पुरस्कार (1990), कलिंग पुरस्कार (1996) और पद्म विभूषण (2004) प्रमुख है|

नार्लीकर न केवल विज्ञान में किये कार्य के लिये जाने जाते हैं पर वे विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में भी पहचाने जाते हैं। वैज्ञानिक शोधो के अलावा, नार्लीकर ने बहुत से गैरतकनीकी पुस्तके और लेख लिखे है जो कि सामान्यजन मे विज्ञान को लोकप्रिय बनाते है| खगोल विज्ञान पर उनकी पुस्तक Maharashtra State Board Literature of and Culture द्वारा प्रकाशित हुई| उन्होने बहुत से विज्ञान कथाये और तीन उपन्यास लिखे है| रेडिओ और टेलीविजन पर भी उनकी उपस्थिति सक्रिय रही है| उन्हें अक्सर दूरदर्शन या रेडियो पर विज्ञान के लोकप्रिय भाषण देते हुऐ या फिर विज्ञान पर सवालों के जवाब देते हुए देखा एवं सुना जा सकता है। विज्ञान से सम्बन्धित कार्यक्रमो के अलावा 1997 मे दूरदर्शन पर दिखाया जाना वाला सांस्कृतिक कार्यक्रम “सुरभि” मे भी वह नियमित रूप से विज्ञान प्रश्नोत्तरी मे आते थे| विज्ञान के प्रसार के लिये उन्हे बहुत से राष्ट्रीय पुरस्कारो से नवाजा गया है जैसे- INSA’s Indira Gandhi Award” of INSA, the “UNESCO’s Kalinga Award” और “Godavari Gaurav Puraskar” of the “Kusumagraj Pratishthan”.

1986 से 1990 तक नार्लीकर बहुत से राष्ट्रीय समितियो के सदस्य रहे थे विशेष रूप से प्रधानमंत्री द्वारा गठित Science Advisory Council| 1985 से 1989 तक वे Indo-US Sub-Commission on Education and Culture के सदस्य थे| 1994 मे उन्हे International Astronomical Union के Commission Cosmologie का अध्यक्ष बनाया गया|

1988 मे नार्लीकर को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा पुणे मे स्थापित Inter-University Center for Astronomy and Astrophysics (IUCAA) का संस्थापक निदेशक बनाया गया| उन्होने यहाँ से 2003 में अवकाश ग्रहण कर लिया। अब वे वहीं प्रतिष्ठित अध्यापक हैं।

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