हार्दिक स्वागत है आपका चर्चा मंच पर। यह मंच समर्पित है भारत चर्चा को। भारत से सम्बन्धित किसी भी विषय पर आपके विचार चर्चा के लिये आमन्त्रित हैं। भारत विश्व की सर्वाधिक धनी और प्राचीन सभ्यता का स्थान है, जिसका अस्तित्व सदियो तक रहा है, तथा जिसके प्रमाण हमे आज भी मिलते हैं। प्राचीन भारत को विश्व ज्ञान गुरु कहा जाता है। गणित और विज्ञान की कई विधाओं की जन्म-स्थली है यह भूमि। इस मंच पर आप भारत के स्वर्णिम इतिहास के बारे मे अपने विचार रख सकते हैं। भारत तो अनगिनत विविधताओ से भरा देश है। इसे पूर्णतः जानना तो असंभव प्रतीत होता है, परन्तु एक प्रयास तो हम कर ही सकते हैं। हमारे इस प्रयास मे अपना योगदान दीजिए।

Currently browsing Shani

श्री युक्तेश्वर गिरि के चार युग

जैसा कि मैने पहले भी बताया है कि युग व्यवस्था बहुत ही भ्रामक है और अलग अलग विद्वानों ने इसकी व्याख्या अपने तरीके से की है| (पढ़ें- युग-युग की बातें (भारतीय युग सिद्धान्त))इस लेख का उद्देश्य भारतीय युग व्यवस्था पर एक सकारात्मक चर्चा कर उसकी प्रामाणिकता की खोज करनी है| मैं यहाँ पर अपनी कोई व्याख्या न देकर केवल उन विद्वानों की व्याख्या दे रहा हूँ| यह चर्चा पहले भी की जा चुकी है|(पढ़ें- भारतीय युग सिद्धान्त – Indian Yuga Theory: Some Ideas ) आज इसी कड़ी में प्रस्तुत है श्री युक्तेश्वर गिरि के विचार|

श्री युक्तेश्वर गिरि – 1 युग चक्र = 12000 वर्ष

Sriyukteswarपरमहंस योगानन्द के गुरु श्री युक्तेश्वर गिरि के अनुसार हमारा पारम्परिक दृष्टिकोण ज्योतिषियो और खगोलशास्त्रियो के द्वारा किये गये गलत गणनाओ पर आधारित है। अपनी पुस्तक The Holy Science मे वह प्रत्येक युग चक्र को संधिकाल के साथ 12000 वर्षो का बताते हैं। प्रत्येक संधिकाल मुख्य काल का 10% होता है तथा आरम्भ एवं अन्त दोनो मे होता है। उदाहरण के लिये, कलियुग 1000 वर्षो का तथा इसकी 100 वर्षो की दो संधियां, इस प्रकार कुल 1200 वर्षो का होता है। इसी प्रकार द्वापरयुग 2000 वर्षो का तथा इसकी 200 वर्षो की दो संधियां, इस प्रकार कुल 2400 वर्षो का होता है। त्रेतायुग 3600 वर्षो (संधियों सहित) का तथा सत्ययुग 4800 वर्षो (संधियों सहित) का होता है। इस प्रकार कुल 12000 वर्षो का युग चक्र हुआ। श्री युक्तेश्वर गिरि के अनुसार यह युग चक्र भी जोड़ियो मे आते है। पहले अवरोही युगो मे सत्ययुग से त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग, फिर आरोही युगो मे कलियुग से द्वापरयुग, त्रेतायुग, तथा सत्ययुग का आगमन होगा। इन आरोही युगो और अवरोही युगो की संधि 499AD मे हुयी थी। कलियुग का आरोहण सितम्बर 499AD मे आरम्भ हुआ। इस गणना के अनुसार हम सितम्बर 1699AD से द्वापरयुग के आरोहण मे है।

श्री युक्तेश्वर के अनुसार कोई भी विद्वान अवरोही कलियुग के आरम्भ की बुरी घोषणा नही करना चाहता था, अतः वह द्वापर को ही बढ़ाते गये। जैसे ही कलियुग का आरोहण शुरु हुआ, तब उन्हे लगा की काल गणना मे उनसे गलती हो गयी है। समाधान के लिये उन्होने एक नयी व्यवस्था की। कलियुग को 1200 वास्तविक वर्षो के बजाय 1200 दिव्य वर्षो का बताया। प्रत्येक दिव्य वर्ष मे 12 दिव्य महीने और प्रत्येक दिव्य महीना 30 दिव्य दिवसो का होता है। एक दिव्य दिवस पृथ्वी के एक वास्तविक (सौर) वर्ष के बराबर होता है। तो इस प्रकार कलियुग 1200x12x30=432000 वर्षो का हुआ।
श्री युक्तेश्वर बताते है कि जिस प्रकार दिन-रात्रि का चक्र एक celestial गति (पृ्थ्वी का अपने अक्ष पर घूमना) के कारण होता है और मौसमो का चक्र भी एक celestial गति ( पृ्थ्वी का सूर्य के चारो ओर घूमना ) के कारण् होता है, उसी प्रकार युग चक्र भी एक celestial गति के कारण होता है। यह celestial गति हमारे सौर-मण्डल के किसी अन्य बिन्दु के चारो ओर घूमने के कारण होती है। इस मूल-बिन्दु को उन्होने “विष्णुनाभि” कहा है।

परन्तु 12000 वर्षो के चक्र के लिये यह बिन्दु अन्तरिक्ष मे कहां है?

डेविड फ्राले, जो कि एक खगोलशास्त्री और वैदिक परम्परा के बहुत से पुस्तको के लेखक है, भी समान व्याख्या प्रस्तुत करते है। इनकी व्याख्या मनु-संहिता पर आधारित है, जिसमे  बहुत छोटे, 2400 वर्षो का युग चक्र बताया गया है। मनु का युग चक्र लगभग उसी लम्बाई का है जैसा कि खगोलशास्त्री Precession of the Equinoxes के लिये बताते है। Precession of the Equinoxes का समय 2580 वर्ष माना जाता है। उनका कहना है कि छोटे युग चक्र के द्वारा हम रामायण और महाभारत तथा अन्य ऎतिहासिक तथ्यो के समय को दूसरे तरीको से बेहतर तरीके से निकाल सकते है। अन्य तरीको से इन घटनाओ का समय लाखो वर्ष पहले निकलता है जो कि धरती पर मानव इतिहास के परिप्रेक्ष्य मे अस्वीकार करने योग्य है।

Proposal of Sri Yukteshwar—

Ascending Dwapara Yuga proper 1900 – 3900 AD
Satya subyuga 3100 – 3900 AD
Treta subyuga 2500 – 3100 AD
Dwapara subyuga 2100 – 2500 AD
Kali subyuga 1900 – 2100 AD
Dwapara Yuga sandhi 1700 – 1900 AD
Kali Yuga sandhi 1600 – 1700 AD
Ascending Kali Yuga proper 600 – 1600 AD
Satya subyuga 1200 – 1600 AD
Treta subyuga 900 – 1200 AD
Dwapara subyuga 700 -   900 AD
Kali subyuga 600 -  700 AD
Ascending Kali Yuga sandhi 500 -  600 AD
Descending Kali Yuga sandhi 400 -  500 AD
Descending Kali Yuga proper 600 BCE -  400 AD
Kali subyuga 300 –   400 AD
Dwapara subyuga 100 -   300 AD
Treta subyuga 200 BCE – 100 AD
Satya subyuga 600  –   200 BCE
Kali Yuga sandhi 700 -   600 BCE
Dwapara Yuga sandhi 900 –   700 BCE
Descending Dwapara Yuga proper 2900 –   900 BCE
Kali subyuga 1100 –   900 BCE
Dwapara subyuga 1500 – 1100 BCE
Treta subyuga 2100 – 1500 AD
Satya subyuga 2900 – 2100 BCE
Dwapara Yuga sandhi 3100 – 2900 BCE
Treta Yuga sandhi 3400 – 3100 BCE
Descending Treta Yuga proper 6400 – 3400 BCE
Kali subyuga 3700 – 3400 BCE
Dwapara subyuga 4300 – 3700 BCE
Treta subyuga 5200 – 4300 AD
Satya subyuga 6400 – 5200 BCE
Treta Yuga sandhi 6700 – 6400 BCE
Satya Yuga sandhi 7100 – 6700 BCE
Descending Satya Yuga proper 11,100 – 7100 BCE
Kali subyuga 7500 – 7100 BCE
Dwapara subyuga 8300 – 7500 BCE
Treta subyuga 9500 – 8300 BCE
Satya subyuga 11,100 – 9500 BCE

[ref: Sri Yukteswar, Swami (1949). The Holy Science. Yogoda Satsanga Society of India.]

Popularity: 6%

युग-युग की बातें (भारतीय युग सिद्धान्त)

कहा जाता है कि बीता हुआ समय वापस नही आता| लेकिन भारतीय समय व्यवस्था मे बीता युग जरुर वापस आता है| हिन्दू ग्रन्थो मे समय की अवधारणा रैखिक नही वरन् चक्रीय है। एक पूर्ण समय चक्र को कल्प कहा गया। प्रत्येक कल्प मे एक हज़ार महायुगो तथा प्रत्येक महायुग मे चार युगो की व्यव्स्था की गयी। सर्वप्रथम सत्ययुग (अथवा कृ्तयुग), तत्पश्चात् त्रेतायुग, द्वापरयुग, तथा कलियुग आते है। कलियुग के पश्चात (अर्थात् एक महायुग पूर्ण होने के पश्चात), पुन: सत्ययुग तथा अन्य युग आते है। यह चक्र चलता रहता है, तथा एक हज़ार महायुगो के पश्चात एक कल्प पूरा हो जाता है। एक कल्प को ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) के एक दिवस के बराबर माना जाता है।

सत्ययुग से कलियुग की यह समय यात्रा धर्म मे एक क्रमिक गिरावट को दर्शाता है। मानव के नैतिक मानदंडों और धार्मिक पुण्यशीलता में भी कमी की बात की गयी है। मनुष्य के आयु की भी कम होता बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि सत्ययुग मे सभी मनुष्यो मे भगवद् चेतना थी; जो कि त्रेतायुग मे गिर कर केवल 75% मनुष्यो मे रह गयी; द्वापरयुग मे यह 50% तथा कलियुग (वर्तमान युग) मे यह केवल 25% मनुष्यो मे बची है। ध्यान देने योग्य बात है कि वर्तमान समय को कलियुग बताया गया है। हम लोग इस समय सबसे खराब समय मे है। अब केवल सुधार ही हो सकता है। कल्पना कीजिये यदि हम किसी और युग मे होते, तो सुधार से पहले स्थितियो को अभी और खराब होना होता। तो यह एक आशावादी व्यवस्था है, कि वर्तमान समय कलियुग है।

भ्रामक स्थिति

आइये जाने इन युगो के काल को। हिन्दू ग्रन्थो मे एक वर्ष 12 महीनो (360 दिन) का होता है। इन संख्याओ को गुणा करने पर मिलता है 360X12=4320. । अब इस संख्या के पीछे उपयुक्त शून्य लगाकर दीर्घ काल-खण्ड बनाये गये। एक महायुग 4,320,000 वर्षो के बराबर होता है। इस प्रकार एक कल्प 4,320,000,000 वर्षो का हुआ। एक कलियुग एक महायुग के दसवे भाग के बराबर होता है।

* 1 कल्प = 1000 X महायुग = 4,320,000,000 वर्ष = ब्रह्मा का एक दिन
* 1 महायुग = 10 X कलियुग = 4,320,000 वर्ष = चार युगो का एक चक्र
* 1 सत्ययुग = 4 X कलियुग = 1728,000 वर्ष
* 1 त्रेतायुग = 3 X कलियुग = 1296,000 वर्ष
* 1 द्वापरयुग = 2 X कलियुग = 864,000 वर्ष
* 1 कलियुग = 432,000 वर्ष

yuga

सूर्य – सिद्धान्त मे कहा गया है कि एक महायुग मे शनि कुल 146,568 कक्षाए पूर्ण करता है। इस प्रकार शनि का कक्षीय काल 29.4743 वर्ष होना चाहिये, जो कि आधुनिक विज्ञान के प्रकाश मे 29.657296 वर्ष निकाला गया है।

ध्यान देने योग्य बात है कि प्रसिद्ध खगोलशास्त्री आर्यभट्ट (जन्म 476AD) कुछ बिन्दूओं पर वैदिक युग सिद्धान्त से अलग जाते है। उन्होने एक कल्प को 1000 महायुगो के बजाय 1008 महायुगो के बराबर लिखा है। 1008 को 7 से पूर्णत: भाग दिया जा सकता है, अत: इस व्यव्स्था मे सभी कल्प सप्ताह के एक ही दिन से आरम्भ होंगे। यह एक दूरदर्शी विचार है। उन्होने एक महायुग को चार बराबर भागो मे विभाजित किया। आर्यभट्ट के सभी युग बराबर काल-खण्ड के है।

प्राचीन भारतीय ही सम्भवत: एकमात्र थे जो कि इतनी बड़ी संख्याओ की बात करते थे। बहुत से विद्वान इन बड़ी संख्याओ और इस प्रकार के ज्योतिष को अस्वीकार करते है। कुछ अनुसंधानकर्ता एक कलियुग की गणना 1200 वर्ष करते है, कुछ अन्य इसे 2160 वर्ष बताते है, जबकि कुछ इसे 2580 वर्ष के बराबर बताते है। पुराणो ने इस भ्रम को और बढ़ाया। पुराणो मे दिये गये इतिहास के अनुसार द्वापरयुग का अन्त समय 950BC बैठता है, जबकि आर्यभट्ट ने इसी समय को 3102BC दिया है। कुछ विद्वान रामायण को लगभग 7200BC पूर्व बताते है और महाभारत को 5500BC पूर्व। यह सभी गणनाएं हिन्दू ग्रन्थो से ही निकाले गये है।

Popularity: 13%

Archives