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आर्यभटीय और गणित (भाग-2)

2.  ज्यामिति और ठोस ज्यामिति

आर्यभट ने sine के मानो की एक पूरी सूची दी जिसमे कि sine के सभी मान 90°/24 = 3° 45′ के अन्तराल पर दिये गये है| इसकी गणना के लिये उन्होने sin(n+1)x – sin nx का sin nx और sin (n-1)x के पदो मे एक सूत्र का प्रयोग किया| उन्होने versine (versin = 1 – cosine) को भी ज्यामिति मे शामिल किया|

वस्तुत: sine का यह नाम भी आर्यभट द्वारा दिये गये नाम का अपभ्रंश है| आर्यभट ने sine को अर्ध्-ज्या कहा, जिसे कि लोगों ने सरलता के लिये केवल ज्या (jya) कहना आरम्भ किया| जब उनके संस्कृत मे लिखी पुस्तक का अरबी मे अनुवाद हुआ तो इसे जिबा (jiba), ध्वन्यात्मक समानता के कारण, लिखा गया| हालांकि अरबी मे स्वरो का उच्चारण हटा दिया गया और इसे ज़्ब (jb) कहा जाने लगा| बाद के लेखको को लगा कि ज़्ब केवल एक लघुरूप है तो उन्होने इसे जाइब (jaib) कहा, क्योकि जिबा (jiba) का अरबी मे कोई अर्थ नहीं होता और जाइब का अर्थ होता है वक्र, अथवा कपड़े मे लिपटा हुआ (bundle, bosom, fold in a garment)| बाद मे 12 शताब्दी मे जब Gherardo of Cremona ने इन अरबी पुस्तकों को लैटिन मे अनुवाद किया तो उन्होने जाइब का लैटिन अनुवाद sinus से किया, जिसका लैटिन मे वही अर्थ होता है जो कि अरबी मे जाइब का| और सबसे अन्त मे लटिन का यह शब्द sinus अंग्रेजी मे sine बन गया| (http://www.etymonline.com/index.php?search=jaib&searchmode=none)

ज्यामिति मे आर्यभट का योगदान यहीं तक सीमित नहीं है| त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने के लिये वह स्पष्ट रूप से सूत्र देते है| गणितपाद मे उन्होने लिखा है-

आर्य२.६क/ त्रि-भुजस्य फल-शरीरम् सम-दल-कोटी-भुजा-अर्ध-संवर्गस्/

(for a triangle, the result of a perpendicular with the half-side is the area.)

आर्यभट ने जो सूत्र त्रिभुज और वृत्त का क्षेत्रफल निकालने के लिये दिये, वे तो पूर्णतः सही है, लेकिन, एक गोले और पिरामिड के आयतन के लिये दिये गये सूत्र को कई विद्वानो ने गलत बताया है| उदाहरण के लिये, गणितपाद (15) मे आर्यभट ने पिरामिड के आयतन के लिये V = Ah/2 सूत्र दिया है, जहाँ V = आयतन, A = त्रिकोणीय आधार का क्षेत्रफल, और, h = उँचाई| सही सूत्र V = Ah/3 है| इसी प्रकार गोले के आयतन के लिये भी उनका दिया सूत्र गलत लगता है| हालांकि, जैसा कि प्रायः होता है, कुछ भी सीधे सीधे नही कह कर, आर्यभट ने सब कुछ सुसज्जित श्लोको के माध्यम से कहा है, और K Elfering के अनुसार,आर्यभट ने सही सूत्र दिया था और उनके गलत होने का भ्रम गलत अनुवाद के कारण है| (K Elfering, The area of a triangle and the volume of a pyramid as well as the area of a circle and the surface of the hemisphere in the mathematics of Aryabhata I, Indian J. Hist. Sci. 12 (2) (1977), 232-236.)

3. बीजगणित: अनिश्चित समीकरण (Indeterminate Equations) -

भारतीय गणित मे प्राचीन काल से ही एक समस्या उच्च प्राथमिकता पर थी, और वह है ax+b=cy के प्रकार के समीकरणो का हल| इन्हे डायोफैंटीय समीकरण (diophantine euations) भी कहते है| Diophantine equation एक ऐसा अज्ञात पदो का बहुपदीय समीकरण है जिसमे पदो का मान केवल पूर्णांक ही हो सकता है| डायोफैंटस नामक यूनानी गणितज्ञ ने, जो संभवत: ईसा के पश्चात् तीसरी शताब्दी में रहा, बहुत से बहुपदीय अनिर्धारित समीकरणों (Undetermined Equations) का अध्ययन किया तथा पूर्णांकों में उनके हलों को ज्ञात किया। नीचे आर्यभटीय पर भास्कर की टिप्पणी का एक उदाहरण दिया गया है-

“ऐसी संख्या ज्ञात करे जिससे कि, जब उसे 8 से भाग दिया जाय तो 5 शेष बचे, और, जब 9 से भाग दिया जाय तो 4 शेष बचे, और, जब 7 से भाग दिया जाय तो 1 शेष बचे|”

उपरोक्त समस्या को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है- N = 8x+5 = 9y+4 = 7z+1. इससे निकाला जा सकता है कि N का छोटा से छोटा से मान 85 है| सामान्यतः डायोफैंटीय समीकरणो को बहुत ही कठिन माना जाता है| इनका भारतीय प्राचीन गणित मे विशेष रूप से अध्ययन किया गया| शुल्व-सूत्रो मे भी इन्हे देखा जा सकता है, जो कि आर्यभट से भी प्राचीन माने जाते है, लगभग 800 BCE के आसपास| आर्यभट ने इन समीकरणो को हल करने के लिये कुक्कुट विधि दी| कुक्कुट का अर्थ होता है छोटे छोटे भागो मे विभक्त करना| यह विधि, आर्यभट के, गणित मे सर्वश्रेष्ठ योगदानो मे से एक है| आर्यभट ने इस विधि का प्रयोग एक घात वाले डायोफैंटीय समीकरणो को हल करने मे किया, जो कि खगोल विज्ञान मे बहुत ही आवश्यक है| यही विधि, 6ठीं शताब्दी मे भास्कर के विस्तार के बाद, आज, डायोफैंटीय समीकरणो को हल करने के लिये संसार मे मानक विधि है, और इसे कई स्थानो पर Aryabhata algorithm (http://en.wikipedia.org/wiki/Aryabhata_algorithm) भी कहा जाता है|

4. खगोल विज्ञान:

ऊपर आर्यभटीय मे दिये गये गणित के बारे मे बताया गया है, परन्तु आर्यभटीय वस्तुतः खगोल विज्ञान का एक ग्रन्थ है, अतः इसमे दिये गये खगोल विज्ञान की भी चर्चा आवश्यक है| हालांकि इसके बारे मे विस्तार से पिछले लेख मे चर्चा की गयी है|
आर्यभट्ट ने अंतरिक्ष मे ग्रहो की स्थिति का एक व्यवस्थित तरीका दिया। उन्होने पृथ्वी की परिधि 24835 मील बताया, जो कि लगभग सही (वास्तविक मान 24902 मील है) बताया| पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष पर घूमती है, यह तथ्य गैलीलियो और कापरनिकस के बहुत पहले ही उन्होने आर्यभटीय मे लिख दिया|

आर्यभट्ट ने ग्रहो की कक्षाओ की त्रिज्याओ को भी पृथ्वी/सूर्य के कक्षा के त्रिज्या के पदो मे निकाल। उनका विश्वास था कि चन्द्रमा और ग्रह परावर्तित सूर्य-किरणो के कारण चमकते है, आश्चर्यजनक रूप से उन्हे विश्वास था कि ग्रहो की कक्षाये दीर्घवृत्त होती है। उन्होने सूर्य और चन्द्र ग्रहण के कारणो की एकदम सही सही व्याख्या की। एक वर्ष का काल उन्होने 365 दिन 6 घण्टे 12 मिनट और 30 सेकेण्ड जो कि अधिगणना थी क्योकि वास्तविक मान 365 दिन 6 घण्टे से कम है।

विरासत:

आर्यभट के कार्यो का भारतीय खगोल वैज्ञानिक परंपरा में काफी प्रभाव पड़ा, और अनुवाद के माध्यम से कई पड़ोसी संस्कृतियों को प्रभावित किया| इस्लामी स्वर्ण युग (ca. 820) के दौरान किया गया अरबी अनुवाद, विशेष रूप से प्रभावशाली था| आर्यभटीय ने दिये गये निष्कर्षो में से कुछ को अल-ख्वारिज्मी द्वारा उद्धृत किया गया, और 10 वीं शताब्दी के अरबी विद्वान अल-बरूनी ने अल-ख्वारिज्मी का संदर्भ लिया है| अल-बरूनी के अनुसार आर्यभट के अनुयायियो का विश्वास था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है| उन्होने sine (ज्या) परिभाषा तो दी ही, साथ ही साथ cosine (कोज्या), versine (उक्रमज्या), invers sine (व्युत्क्रम ज्या) को भी परिभाषित किया| त्रिकोणमिति के जनक आर्यभट ही है| वस्तुतः इसका अंग्रेजी नाम Trigonometry (ट्रिगोनोमेट्रि) संस्कृत शब्द त्रिकोणमिति का ही अपभ्रंश है| वह पहले व्यक्ति थे जिन्होने sine और versine (1-cosX) के 0° से 90° के बीच 3.75° के अन्तराल पर मानो की सूची दी, जो कि दशमलव के 4 स्थानो तक सही है|

आर्यभट्ट की खगोलीय गणनाएं भी बहुत प्रभावशाली थे| त्रिकोणमितीय सूची के साथ, वे व्यापक रूप से इस्लामी दुनिया में इस्तेमाल किया जाने लगे, और कई अरबी खगोलीय सारणी (zijes) की गणना मे प्रयोग किये गये| विशेष रूप से, अरबी स्पेन (स्पेन का वह भाग जो पहले अरब मे था) के वैज्ञानिक अल-ज़ारक़ाली (Al-Zarqali (11th c.)) के द्वारा दी गयी खगोलीय सारणी का लैटिन में अनुवाद किया गया Tables of Toledo (12th c.), और यूरोप मे सदियों तक सबसे सटीक Ephemeris (खगोलीय स्थितियो के लिये कैलेण्डर) माना गया|

आर्यभट्ट और अनुयायियों के द्वारा किये गये कैलेण्डर की गणनायें शताब्दियों से भारत मे पंचांग (हिन्दू कैलेण्डर) के निर्धारण के लिये प्रयुक्त की जाती रही है| ये इस्लामी दुनिया मे भी गये और वहाँ के जलाली कैलेण्डर (Jalali Calendar)का मुख्य आधार बना जिसे 1073 मे ओमर खय्याम (Omara Khayyam) और कुछ अन्य खगोलशास्त्रियो के द्वारा बनाया गया था| इसी के रूप (1925 मे संशोधित) आज ईरान और अफगानिस्तान के राष्ट्रिय कैलेण्डर हैं| जलाली कैलेण्डर मे तिथियाँ वास्तविक सौर पारगमन (solar transit) के आधार पर निकाली गयी है, ठीक उसी प्रकार जैसे आर्यभट्ट के कैलेण्डर(और पहले के सिद्धांत कैलेंडर) मे है| कैलेंडर मे इस प्रकार तिथि की गणना के लिए एक Ephemeris (खगोलीय स्थितियो के लिये कैलेण्डर) की आवश्यकता होती है| हालांकि तिथियों की गण्ना कठिन है, परन्तु मौसम की गणना मे त्रुटि, जलाली कैलेण्डर मे ग्रेगोरियन कैलेण्डर की तुलना मे कम है|

भारत के पहले उपग्रह आर्यभट को यह नाम उनके नाम पर दिया गया था| चंद्रमा गड्ढा आर्यभट्ट (lunar crater Aryabhata) का भी यह नाम उनके सम्मान में है| खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वातावरणीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए भारत मे नैनीताल के निकट संस्थापित एक संस्थान को आर्यभट्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट आफ आब्जर्वेशनल साइंस (Aryabhatta Research Institute of observational sciences (ARIES)) नाम दिया गया|

संदर्भ -

1. http://en.wikipedia.org/wiki/Aryabhata
2. http://www-history.mcs.st-andrews.ac.uk/Biographies/Aryabhata_I.html
3. ARYABHATA I, HIS LIFE AND HIS CONTRIBUTIONS by S. M. Razaullah Ansari
4. http://www.aryabhatta.net/
5. http://www.scribd.com/doc/20912413/The-Aryabhatiya-of-Aryabhata-English-Translation

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शुल्व सूत्र – गणित के अर्वाचीन सूत्र

शुल्व सूत्र हिंदू धार्मिक दस्तावेज़ों का एक संग्रह है, जिसे 800 BCE के बीच 200 BCE लिखा गया। यह पुस्तके गणितीय रुप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। कई विद्वानों का विश्वास है कि ये गणित की सबसे पुरानी पुस्तके हैं। इन पुस्तको मे बहुत से गणितीय सिद्धांत है जो कि हमे बताते है कि प्राचीन भारत में गणित अन्य प्राचीन संस्कृति से भी ज़्यादा अग्रिम था। यहाँ तक कि शुल्व सूत्र में लिखे कुछ प्रमेयो का यूरोपियो द्वारा कई शताब्दियों के बाद आविष्कार किया जा सका।

प्राचीन संस्कृतियों में गणित का प्रारंभिक विकास धार्मिक प्रथाओं और त्योहारो के कारण आवश्यक हो गया था। लोगों को बलि या पूजा के कृत्यों के लिए और कुछ त्योहारों के शुभ समय के सटीक गणना की आवश्यकता थी। उन्हे सूरज और चाँद की उदय और अस्त होने, और सौर और चन्द्र ग्रहण की घटनाओं के सही समय के ज्ञान की भी आवश्यकता थी। इन सभी के लिये खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान आवश्यक है, अर्थात गणित, तल और गोलीय ज्यामिति और त्रिकोणमिति का सही ज्ञान,और संभवतः सरल खगोलीय उपकरणों के निर्माण का भी ज्ञान आवश्यक था। प्रारंभिक चरण में गणित मुख्य रूप से दो व्यापक परंपराओं मे विकसित हुआ- ज्यामितीय और अंकगणित, बीजगणित के मूलभूत विकास सहित। पुरा-यूनानी प्राचीन सभ्यताओं मे, यह भारत ही है कि जहाँ हम गणित की इन दोनों महान धाराओ पर मजबूत जोर देखते है। अन्य प्राचीन सभ्यताओं जैसे बेबीलोन और मिस्र ने मुख्य रूप से अंकीय गणनाओ मे प्रगति की थी।

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वेदांग ज्योतिष मे कहा गया है- “वेदा हि यज्ञार्थयभिप्रवृत्ता “ अर्थात् वेद भी यज्ञों के लिए प्रवृत्त हुए। यज्ञों के लिए भिन्न – भिन्न आकार प्रकार की वेदियां बनाने की आवश्यकता पड़ी जैसे- वर्गाकार, वृत्ताकार, अर्द्धवृत्ताकार, आयताकार, त्रिभुजाकार आदि। ये यज्ञ-कुण्ड प्रतीकात्मक रुप से बहुत महत्वपूर्ण थे, एवं इन्हे परिशुद्धता (accuracy) के साथ बनाना आवश्यक था। इन यज्ञ कुण्डों के निर्माण मे विभिन्न प्रकार के अभिकल्पो (designs) का प्रयोग किया जाता था। जैसे, किसी अभिकल्प में बाज को अपने घुमावदार पंखो के साथ उड़ते दिखाया गया है, किसी अभिकल्प में रथ के पहिये को दिखाया गया है, तो किसी अभिकल्प में कछुए को उसके सिर एवं पैर फैलाये हुए दिखाया गया है। जहाँ उपरोक्त अग्नि-कुण्डो का दैनिक पूजाओं के कृत्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वहीं कुछ अभिलषित वस्तुओं को प्राप्ति के लिए अधिक विस्तृत बलिदान या पूजाएं भी थी। विशिष्ट अग्नि-कुण्ड देवताओ से विशिष्ट उपहारो के साथ सम्बन्धित थे। उदाहरण के लिए, ” जिसे स्वर्ग की इच्छा है, उसके लिए एक बाज के रूप में अग्नि-कुण्ड”, “एक कछुए के रूप में अग्नि-कुण्ड का ब्राह्मण की दुनिया को जीतने के इच्छुक द्वारा का निर्माण किया जाना है” और “जो वर्तमान और भविष्य के शत्रुओं को नष्ट करना चाहते हैं उसे तिर्यग्वर्ग अग्नि-कुण्ड निर्माण करना चाहिए”। [ref:- Plofker, Kim (2007) p. 387़. इन “आग्नि-कुण्डो” के निर्माण करने के लिए कई संदर्भ ऋग्वेद संहिता में उपलब्ध हैं। इस वेदियों के निर्माण का विज्ञान तैत्तरीय संहिता और तैत्तरीय ब्राह्मण में अधिक विस्तार मे है।

मिट्टी के ईंटो से निर्मित यह वेदिया आकृति और आकार में बहुत जटिल है, और प्राय: गणितीय सूत्रो का उपयोग आवश्यक होता था। एक सामान्य उदाहरण एक वर्ग के आकार की एक वेदी (या उसका खंड) बनाना, जिसका क्षेत्रफल किसी वृत्तीय वेदी के बराबर हो, (ऐसा गणित, जिसने गणितज्ञो को वर्षो से परेशान किया)।इस के लिए उन्हे pi का अनुमान, प्रक्रियाओं की गणना, और सटीक निर्माण विधियों की आवश्यकता थी। इन प्रक्रियाओं के लिये त्रिकोण, वर्ग और आयत के गुणो, समरुप आकृतियो के गुणो, वृत्त को वर्ग बनाने तथा इसके विलोम, वर्ग को वृत्त बनाने (अर्थात् वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाने तथा इसके विलोम) जैसी समस्याओ के हल का अच्छा ज्ञान आवश्यक है।

भारतीय गणितज्ञो ने इस क्षेत्र में बहुत काम किया है, जो शुल्व सूत्र के रूप में जाना जाता है। केवल सात शुल्व सूत्र को वर्तमान में जाना जाता है। इन्हे बोधायन (Bodhayana), आपस्तम्ब (Apasthamba), कात्यायन (Katyayana), मानव (Manava), मैत्रियन (Maitrayana), वाराह (Varaha) और वधुला (Vadhula )के नाम से जाना जाता है उन ऋषियो या साधुओ के बाद जिन्होने उन्हें लिखा था। कात्यायन सूत्र वेदों के उस भाग से है, जिसे शुक्ल तजुर्वेद (Shukla Tajurveda) कहते है। जबकि अन्य सभी कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda) से लिये गये है। बोधायन, आपस्तम्ब और कात्यायन सूत्र गणितीय बिंदु से महत्वपूर्ण हैं। मैत्रियन मानव सूत्रो के समान है। एक अन्य शुल्व सूत्र हिरण्यकशिन भी पाया गया है, जो आपस्तम्ब सूत्र के समान है।

शुल्व सूत्रो से कुछ जटिल ज्यामितीय निर्माण के नीचे सूचीबद्ध हैं।

1.    किसी दिए गए वर्ग के अपवर्त्य के बराबर वर्ग की रचना करना
2.    किसी वर्ग के अपवर्तक के बराबर वर्ग की रचना करना
3.    दो विभिन्न वर्गों के योग के बराबर वर्ग की रचना करना
4.    दो विभिन्न वर्गों के अंतर के बराबर वर्ग की रचना करना
5.    आयत के बराबर वर्ग की रचना करना
6.    वर्ग के बराबर आयत की रचना करना
7.    वर्ग के बराबर त्रिभुज की रचना करना
8.    वृत्त के बराबर वर्ग की रचना करना तथा इसका विपरीत
9.    भुजाये ज्ञात होने पर आयत की रचना करना
10.    किसी दी हुई रेखा पर वर्ग की रचना करना
11.    दो भुजाओ और उनके झुकाव दिए रहने पर समांतर चतुर्भुज की रचना करना और इसी प्रकार की अन्य रचनाये एवं रुपान्तरण

ऊपरोक्त केवल कुछ उदाहरण हैं। असल में शुल्व-सूत्र बहुत से जटिल गणितीय निर्माणो से भरे पड़े हैं।

भारतीय गणित के इतिहास पर दृष्टि डालने पर ज्ञात होता है कि “शुल्व काल” या “वेदांग ज्योतिषकाल” (1000BC से 500BC) मे ही रेखागणित की नींव पड चुकी थी। उस काल मे इसे विभिन्न नामो से जाना जाता था, जैसे- शुल्व-गणित, शुल्व-विज्ञान, रज्जु-गणित, रज्जु-संख्यान, रज्जु-क्षेत्रगणित, क्षेत्र समास, क्षेत्र व्यवहार, क्षेत्रमिति, ज्यामिति, और भूमिति नामो से व्यक्त किया गया है। शुल्व का अर्थ है  रज्जु या रस्सी। अत: वह विज्ञान या गणित जो शुल्व की सहायता लेकर विकसित किया गया, उसे शुल्व-विज्ञान या शुल्व-गणित का नाम दिया गया। शुल्व का पर्यायवाची रज्जु होने के कारण इसे रज्जु-गणित भी कहा गया है, जो आगे चल कर रेखागणित मे परिणत हो गया। शुल्व का दूसरा अर्थ यज्ञीय कार्य भी है। चूकि विभिन्न प्रकार की यज्ञ वेदियो के निर्माण मे रज्जु की सहायता से पृ्थ्वी पर अभीष्ट दूरीयाँ मापने के अतिरिक्त कृ्षि योग्य भूमि की माप भी की जाती थी, इसीलिये इस्की सहायता से विकसित गणित का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति, तथा भूमिति भी पड़ गया। क्षेत्र, ज्या, भू, का एक ही अर्थ है- भूमि, तथा, मिति का अर्थ है, मापन। अत गणित की इस शाखा का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति या भूमिति अत्यन्त सार्थक है।

शुल्व-सूत्र वैदिक अवधि से भारतीय गणित का ज्ञान के एकमात्र स्रोत हैं। इस सूत्रो के समय का अनुमान अन्य वैदिक ग्रंथों की शब्दावली के साथ उनके व्याकरण और शब्दावली की तुलना करके किया गया हैं। सबसे पुराना शुल्व-सूत्र बोधायन द्वारा 800 BCE से 600 BCE के आसपास लिखा गया , और सभी सूत्रों की अवधि 800 BCE से 200BCE अनुमान किया गया है लिखा गया था। हालांकि यह वेदों की उत्पत्ति के थोड़ा बाद का समय है,परन्तु इसमें लिखे सिद्धांत वैदिक सभ्यता से पूर्व के है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि शुल्व सूत्र के लेखको ने वेदियों कि उन रचना विधियों को केवल लिखा है जो कि , जो कि प्राचीन काल से ही निर्दिष्ट रूप में थे। वे उन वेदियों के मूल रचनाकार नहीं है।

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