Warning: is_dir() [function.is-dir]: open_basedir restriction in effect. File(/) is not within the allowed path(s): (/home/charchaa:/usr/lib/php:/usr/local/lib/php:/tmp) in /home/charchaa/public_html/wp-includes/functions.php on line 2104

Warning: file_exists() [function.file-exists]: open_basedir restriction in effect. File(/) is not within the allowed path(s): (/home/charchaa:/usr/lib/php:/usr/local/lib/php:/tmp) in /home/charchaa/public_html/wp-includes/functions.php on line 2095

Warning: is_dir() [function.is-dir]: open_basedir restriction in effect. File(/) is not within the allowed path(s): (/home/charchaa:/usr/lib/php:/usr/local/lib/php:/tmp) in /home/charchaa/public_html/wp-includes/functions.php on line 2104
चर्चा » Charchaa » vayam rakshamah

हार्दिक स्वागत है आपका चर्चा मंच पर। यह मंच समर्पित है भारत चर्चा को। भारत से सम्बन्धित किसी भी विषय पर आपके विचार चर्चा के लिये आमन्त्रित हैं। भारत विश्व की सर्वाधिक धनी और प्राचीन सभ्यता का स्थान है, जिसका अस्तित्व सदियो तक रहा है, तथा जिसके प्रमाण हमे आज भी मिलते हैं। प्राचीन भारत को विश्व ज्ञान गुरु कहा जाता है। गणित और विज्ञान की कई विधाओं की जन्म-स्थली है यह भूमि। इस मंच पर आप भारत के स्वर्णिम इतिहास के बारे मे अपने विचार रख सकते हैं। भारत तो अनगिनत विविधताओ से भरा देश है। इसे पूर्णतः जानना तो असंभव प्रतीत होता है, परन्तु एक प्रयास तो हम कर ही सकते हैं। हमारे इस प्रयास मे अपना योगदान दीजिए।

Currently browsing vayam rakshamah

राम सेतु – मानव निर्मित या प्राकृतिक?

इतिहास के तथ्यो को समझने के लिये वैज्ञानिक ज्ञान होना आवश्यक है| इससे ज्ञान आधारित समाज का निर्माण होता है और सर्वस्वीकार्य निष्कर्ष सामने आते है| विज्ञान चमत्कारो को नही मानता है| राम सेतु को भी विज्ञान से दूर केवल एक विश्वास के रूप मे देखने पर इसकी ऐतिहासिकता की व्याख्या ठीक से नही की जा सकती है| आईये देखे कि विज्ञान क्या कहता है राम सेतु के बारे मे|

हिन्दू परम्परा मे ऐसा विश्वास है कि राम-सेतु वास्तव मे एक पुल है जो कि तमिलनाडु के रामेश्वरम द्वीप को श्रीलंका के मन्नार द्वीप से जोड़ता है| हिन्दुओ के धार्मिक पुस्तक “रामायण” मे वर्णन है कि जब राम (जिन्हे विष्णु का अवतार माना जाता है) को लंका जाने के लिये समुद्र पर पुल बनाने की आवश्यकता हुई तो उन्होने समुद्र देवता से अनुमति लेकर अपने वानर सेना की सहायता से यह सौ योजन लम्बा पुल बनाया था| भारत के दक्षिण मे धनुषकोटि तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिम मे पम्बन के मध्य समुद्र मे 30 किमी चौड़ी पट्टी के रूप मे उभरा भू भाग ही वह रामसेतु है, जिसे ईसाईयों ने एडम ब्रिज (Adam’s Bridge) और मुसलमानों ने आदम पुल कहा । हालांकि रामायण मे इस पुल के तकनीकी बातो का वर्णन नही किया गया है|रामेश्वरम मे आज भी प्रभु श्रीराम चन्द्र की शयन मुद्रा मूर्ति है। समुद्र से रास्ता मांगने के लिए यहीं पर रामचंद्र जी ने तीन दिन तक प्रार्थना की थी।

नीदरलैंड मे सन १७४७ मे बने मालाबार बोबन मानचित्र मे रामन कोविल के नाम से रामसेतु को दिखाया गया है। इस मानचित्र का १७८८ का संस्करण आज भी तंजावूर के सरस्वती महल पुस्तकालय मे उपलब्ध है। जोसेफ मार्क्स नाम के ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ता ने इस मानचित्र मे श्रीलंका से जोड़ने वाले रामसेतु को ‘रामार ब्रिज’ कहा है।

अमेरिका के अन्तरिक्ष अनुसंधान संस्थान ‘नासा’ ने उपग्रह से खीचे गए चित्र 1993 मे ने दिल्ली के प्रगति मैदान मे “राष्ट्रीय विज्ञान केन्द्र” की प्रदर्शनी मे उपलब्ध कराये गए थे। इनमे श्रीराम सेतु का उपग्रह से लिया गया चित्र भी था। यह चित्र नासा ने 14 दिसम्बर 1966 को जेमिनी -11 से अन्तरिक्ष से प्राप्त किया था। इसके 22 साल बाद आई.एस.एस 1 ए ने तमिलनाडु तट पर स्थित रामेश्वरम और जाफना द्वीपों के बीच समुद्र के भीतर भूमि पट्टिका का पता लगाया और उसका चित्र लिया। इससे अमेरिकी उपग्रह के चित्र की पुष्टि हुई।

ओ. एच. के. स्पाटे (O H K Spate) “भारत और पाकिस्तान” (India and Pakistan, London,. Pp 727-728) मे लिखते है कि राम सेतु “वस्तुतः एक कोरल रीफ (coral reef) है जो कि सामूहिक रूप से ऊपर उठ कर कोरल रॉक (coral rock) बन गये है| इन्सायक्लोपेडिया ब्रिटेनिका (The Encyclopaedia Britannica, (Volume-1, 1766, p. 129)) मे इस सेतु का वर्णन इस प्रकार है- “आदम का पुल जिसे रामसेतु भी कहा जाता है, जो कि उत्तरी पश्चिमी श्रीलंका तथा भारत के दक्षिणी पुर्वी तट से दूर रामेश्वरम के समीप मन्नार के द्वीपों के मध्य ‘उथले स्थानों की श्रुंखला’ है।“. The Gazettier of India (Indian Union Vol-1 pg 57) मे लिखा है कि उत्तर की खाड़ी मे “भूमि की दो पतली पट्टियाँ, एक भारत की ओर से, दूसरा सिलोन (Ceylon i.e. Sri lanka)से आकर, एक अर्ध-डूबी पठार पट्टी के द्वारा जुड़ती है, एडम ब्रिज (रामसेतु) बनाती है, जो कि समुद्र तल से मुश्किल से चार मीटर नीचे है| यह हिम युग के बाद (post glacial time) समुद्र तल का उठने का प्रमाण है, जो कि भारत और सिलोन के बीच सम्पर्क के डूबने का कारण है|”

उपग्रह चित्र-
ramsetuमिथक अथवा ऐतिहासिक रामसेतु? यह विवाद उस समह गहरा गया जब कुछ साल पहले नासा (NASA) ने उपग्रह से लिये गये इस स्थान के चित्रो को सार्वजनिक किया| इन चित्रो मे समुद्रतल से नीचे एक पट्टी जैसी आकृति दिखायी देती है जो कि एक डूबे हुए पुल का भ्रम पैदा करती है| इस भ्रम से इस विश्वास को बल मिला कि यही मानव-निर्मित वह पुल है जिसे राम ने बनवाया था| हालांकि नासा ने इसका खंडन किया और कहा कि यह प्राकृतिक है और दो द्वीपो के बीच समुद्री लहरो के द्वारा बनी एक भूमि पट्टी है| इसे टोम्बोलो (Tombolo) कहते है| ऐसे टोम्बोलो संसार मे बहुत स्थानो पर मिले है|

Link to NASA Image : http://history.nasa.gov/SP-168/p193a.jpg

दिसम्बर 2002 – मार्च 2003 के बीच भारतीय भूगोल सर्वेक्षण (Geological Survey of India (GSI)) ने एक वैज्ञानिक शोध किया, जिसमे बताया गया कि रामेश्वरम द्वीप 125,000 BP (before present) के आसपास समुद्र से बाहर निकला| रामेश्वरम और थलाई मन्नार 18000 BP से 7000BP तक समुद्र से उपर ही थे और भारत और श्री लंका के बीच एक मार्ग प्रदान करते थे| यह शोध आगे बताता है कि धनुषकोडि और दूसरे द्वीपो के बीच जो मार्ग दिखायी देता है, जिसे राम सेतु माना जाता है, उसके मानव निर्मित होने के कोई प्रमाण नही है|

अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र, अहमदाबाद (The Space Application Centre, Ahmedabad) भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है| उसके अनुसार यह वास्तव मे मूँगा-चट्टानो के 103 छोटे खंड है, जो कि एक सीधी रेखा बनाते है| Journal of the Indian society of Remote Sensing मे छपा एक लेख आदम पुल को न केवल एक मूँगा-चट्टानो की एक श्रृंखला प्रदर्शित करता है, बल्कि भूवैज्ञानिको और पुरातत्त्वविदो की इस धारणा को भी बल देता है कि यह मानव निर्मित नही बल्कि प्राकृतिक है|

भू-विज्ञान विभाग, भारत सरकार, का शोध (मार्च 2007), परन्तु, कुछ मजबूत तर्को के साथ इसे मानव निर्मित बताता है| शोध का सारांश कुछ इस प्रकार है-

यह एक अच्छी तरह से स्थापित वैज्ञानिक तथ्य है कि 18000 BP के आसपास एक प्रमुख हिमयुग (ice age) अपने उच्चतम पर था| संसार के विभिन्न भागो मे अर्धडूबी मूँगा चट्टानों की मदद से इसे देखा गया और इसका विस्तृत अध्ययन किया गया है| उस काल मे समुद्रतल वर्तमान तल से 130 मीटर नीचे था| भारत के पूर्वी और पश्चिमी समुद्रतटों पर इसे प्रमाणो के साथ देखा गया, जहाँ जलमग्न मूँगा चट्टाने केवल 1 से 2 मीटर ही गहराई पर है और वे निकट तटीय क्षेत्र के स्पष्ट संकेत हैं|

राम सेतु रिज एक प्रमुख समुद्री विभाजन है| यह एक मेढ़ की तरह है, और बहुत कुछ “अल्लाबन्द” (Allaband) की तरह है| 19वीं शताब्दी में अरब सागर मे एक बड़े भूकम्प के बाद अल्लाबन्द का निर्माण हुआ था| अल्लाबन्द मे 90 किमी लम्बा और 0.5 से 4 किमी चौड़ा भूखण्ड समुद्र से उपर निकल आया था, और इसका कारण था- पृथ्वी के गर्भ मे प्लेटो का खिसकना, जो कि हर भूकम्प का कारण होता है| लोगों को लगता है कि यह अल्लाह की इच्छा के कारण हुआ है इसलिये इसे अल्लाबन्द के नाम से बुलाया गया|

राम सेतु कुछ इसी प्रकार का है, लेकिन यह बहुत पहले बना है| पिछले हिमयुग (ice age)(18000 years BP) के दौरान सम्पूर्ण भारत से श्रीलंका और आगे दक्षिण और दक्षिण पूर्व के भाग एक ही भूखण्ड थे, क्योकि उस समय समुद्रतल आज के युग से बहुत नीचे था|और जब पहाड़ो और आर्कटिक क्षेत्र से बर्फ का पिघलना शुरु हुआ तो समुद्र स्तर उठना शुरु हो गया| जलमग्न मूँगा चट्टानो के निर्माण प्रक्रिया के अध्ययन के दौरान इस तथ्य को बहुत बार देखा गया| आज से लगभग 7300 साल पहले भारत के दक्षिणी भाग में समुद्र तल वर्तमान स्तर से 3.5मी ऊपर था| यह डॉ. पी.के. बनर्जी ने पाबन (Paban), रामेश्वरम (Rameswaram), और तूतीकोरिन (Tuticorin) इत्यादि स्थानो पर चट्टानो का अध्ययन किया और इस तथ्य को सत्य पाया| इसके बाद समुद्र स्तर नीचे गिरा और आज से 5000 से 4000 साल के बीच वर्तमान से 2 मी उपर था|

रामसेतु के अंतर ज्वारीय क्षेत्रो मे एन आई ओ टी (NIOT) के द्वारा किये गये छिद्रो के भूगर्भीय अध्ययन से बहुत ही रोचक जानकारी का पता चलता है । सभी छिद्रो का शीर्ष भाग ताजी समुद्री रेत से भरा हुआ देखा गया| लगभग सभी छिद्र 4.5 से 7.5m की गहराई पर कठोरता मिलती है, जो कि कैल्शियम युक्त (calcareous) पत्थरो और मूँगा चट्टानो की वजह से है| यहाँ पर ध्यान देने वाली बात यह है कि मूँगा चट्टाने (Coral Rocks) तुलनात्मक रूप से कम कठोर होती है और हल्की होती है, और कही ले जाने के लिये सरल होती है| यह चट्टाने ऊपर की ओर बढती है, और स्थायित्व के लिये इनका ऊपरी भाग अपेक्षाकृत कठोर होता है| इन चट्टानो का समूह स्थिर रहने के लिये ऊपर की ओर बढता है और समुद्र स्तर से हमेशा 1 से 2 मीटर की गहराई बना कर रखता है| इस ऊर्ध्वतर बढने को लक्षद्वीप, अन्दमान और मनार की खाडी मे देखा गया है| इनका निचला भाग भी कठोर पाया गया है|

परन्तु राम सेतु मे मूँगा चट्टाने मुश्किल से 1 से 2.5 मीटर की मिली है, बाकी भाग समुद्री रेत है| ये चट्टाने मूँगे के गोल, छोटे टुकडो जैसे है| ऐसा लगता है कि इन टुकडो को कही और से लाकर यहाँ रखा गया है| चूँकि यह कैल्शियम युक्त रेतीले पत्थर और मूँगा चट्टाने सामान्य चट्टानो से कम कठोर है, सम्भव है कि प्राचीन काल मे लोगो ने इसका प्रयोग भारत और श्रीलंका के बीच सम्पर्क मार्ग बनाने के लिये किया हो|

इन निष्कर्षो के समर्थन मे अन्य बहुत से पुरातत्व और भौगोलिक प्रमाण भारत के दक्षिणी भाग, रामेश्वर के चारो ओर्, तुतीकोरिन्, और श्रीलंका के पश्चिमी भाग मे मिले है| यहाँ पर टेरी (Teri) मिले है, जो कि मध्य पाषाण युग के छोटे पत्थरो से बने औजारो के जैसे है| इससे निष्कर्ष निकलता है कि 8000 BP से 9000 BP और हाल के 4000 BP मे यहाँ पर मानव की बस्तियाँ और और उनकी मजबूत गतिविधियाँ थी| श्रीलंका मे तो मानव और जानवरो के हड्डियो और जीवाश्मो के आधार पर ऐसे संकेत मिले है कि वहाँ मानव बस्तियाँ 13000 BP (late Pleistocene) मे भी थी|

यह सभी बाते एक ही निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि जब भारत और श्रीलंका के बीच समुद्रस्तर जब ठीक सुविधाजनक था, उसी समय राम सेतु के दोनो ओर मानव गतिविधियाँ भी तेज थी| यही वह समय था जब यह सेतु बनाया गया| कुछ विद्वान रामायण का समय भी यही बताते है| सम्भव है कि यही वह पुल हो जिसे राम ने रावण से युद्ध करने के लिये बनाया हो|

Popularity: 6%

वयं रक्षामः

क्या आपने वयं रक्षामः पढ़ी है? यदि नही तो जल्द ही पढिये| अदभुत् और सुन्दर पुस्तक है यह| आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा लिखी यह पुस्तक पौराणिक परिप्रेक्ष्य को नए अंदाज और व्याख्या के साथ प्रस्तुत करती है| रामायण काल के बारे मे लिखी इस पुस्तक मे रक्ष तथा यक्ष संस्कृति के आपसी टकरावों की चर्चा की गयी है| यह पुस्तक वस्तुतः एक उपन्यास है| संस्कृतनिष्ठ हिन्दी मे लिखा गया यह उपन्यास रामायण काल की घटनाओ को रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है| यह उस काल के भारत का चित्रण करती है|यह केवल एक उपन्यास नही वरन भारत के स्वर्णिम इतिहास का एक वृहद अध्ययन है| शास्त्री जी रामायण काल को आज से 7000 वर्ष पूर्व बताते है| श्री शास्त्री इसमे वर्णित घटनाओ की भौगोलिक तथा ऐतिहासिक व्याख्या भी सटीक सन्दर्भो के साथ प्रस्तुत करते है|

सत्य का संधान आसान नही है, और साहित्य मे सत्य का निरुपण तो और भी कठिन है| श्री शास्त्री के शब्दो मे “असल सत्य और साहित्य के सत्य मे भेद है|” धार्मिक सहित्यो मे सत्य है, इसमे सन्देह है| लगभग सभी धार्मिक साहित्य एक पक्षीय है और विजेताओ (देवताओ) के गुणगान मे लिखे गये है| श्री शास्त्री इस परिपाटी से अलग जाते है| इस उपन्यास मे श्री राम के साथ-साथ जगत खलनायक रावण का भी सकारात्मक चित्रण किया गया है| उस साहसी, महाज्ञानी, महात्वाकांक्षी, सप्तद्वीपपति राजा का सकारात्मक पक्ष दिखाना वस्तुतः एक चुनौती ही है| इसके साथ ही उस काल के लगभग सभी संस्कृतियो को दैवीय नही बल्कि वास्तविक

रूप मे प्रस्तुत किया है|स्वयं श्री शास्त्री के शब्दो मे “इस उपन्यास मे प्राग्वैदकालीन नर, नाग्, देव्, दैत्य-दावन, आर्य, अनार्य आदि विविध नृवंशो के जीवन के वे विस्मृत पुरातन रेखाचित्र है, जिन्हे धर्म के रंगीन शीशे मे देखकर सारे संसार ने अन्तरिक्ष का देवता मान लिया था|”

संसार मे संस्कृतियो का संघर्ष सदैव होता रहा है| पुराकाल मे भी देव-दैत्य, आर्य-अनार्य, यक्ष-रक्ष इत्यादि संघर्षो की बाते मिलती है| श्री शास्त्री इन विभिन्न संस्कृतियो का चित्रण इस उपन्यास मे करते है|आर्य संस्कृति के बारे में यह कुछ इस प्रकार बताती है,

‘उन दिनों तक भारत के उत्तराखण्ड में ही आर्यों के सूर्य-मण्डल और चन्द्र मण्डल नामक दो राजसमूह थे। दोनों मण्डलों को मिलाकर आर्यावर्त कहा जाता था। उन दिनों आर्यों में यह नियम प्रचलित था कि सामाजिक श्रंखला भंग करने वालों को समाज-बहिष्कृत कर दिया जाता था। दण्डनीय जनों को जाति-बहिष्कार के अतिरिक्त प्रायश्चित जेल और जुर्माने के दण्ड दिये जाते थे। प्राय: ये ही बहिष्कृत जन दक्षिणारण्य में निष्कासित, कर दिये जाते थे। धीरे-धीरे इन बहिष्कृत जनों की दक्षिण और वहां के द्वीपपुंजों में दस्यु, महिष, कपि, नाग, पौण्ड, द्रविण, काम्बोज, पारद, खस, पल्लव, चीन, किरात, मल्ल, दरद, शक आदि जातियां संगठित हो गयी थीं।’

vayam-rakshamah

रावण ने दक्षिण में जोड़ने के लिए नयी संस्कृति का प्रचार किया। उसने उसे रक्ष संस्कृति का नाम दिया। रावण जब भगवान शिव की शरण में गया तो उसने इसे कुछ इस तरह से बताया,

‘हम रक्षा करते हैं। यही हमारी रक्ष-संस्कृति है। आप देवाधिदेव हैं। आप देखते ही हैं कि आर्यों ने आदित्यों से पृथक् होकर भारतखण्ड में आर्यावर्त बना लिया है। वि निरन्तर आर्यजनों को बहिष्कृत कर दक्षिणारण्य में भेजते रहते हैं। दक्षिणारण्य में इन बहिष्कृत वेद-विहीनव्रात्यों के अनेक जनपद स्थापित हो गये हैं। फिर भारतीय सागर के दक्षिण तट पर अनगिनत द्वीप-समूह हैं, जहां सब आर्य, अनार्य, आगत, समागत, देव, यक्ष, पितर, नाग, दैत्य, दानव, असुर परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध करके रहते हैं। फिर भी सबकी संस्कृति भिन्न है, परन्तु हमारा सभी का एक ही नृवंश है और हम सब परस्पर दायाद बान्धव हैं। मैं चाहता हूं कि मेरी रक्ष-संस्कृति में सभी का समावेश हो, सभी की रक्षा हो। इसी से मैंने वेद् का नया संस्करण किया है और उसमें मैंने सभी दैत्यों-दानवों की रीति-परम्पराओं को भी समावेशित किया है, जिससे हमारा सारा ही नृवंश एक वर्ग और एक संस्कृति के अन्तर्गत वृद्घिगत हो। आप देखते हैं कि गत एक सौ वर्षों में तेरह देवासुर-संग्राम हो चुके, जिनमें इन बस दायाद् बान्धवों ने परस्पर लड़कर अपना ही रक्त बहाया। विष्णु ने दैत्यों से कितने छल किए। देवगण अब भी अनीति करते हैं। काश्यप सागर-तट की सारी दैत्यभूमि आदित्यों ने छलद्घबल से छीनी है। अब सुन रहा हूं कि देवराट् इन्द्र चौदहवें देवासुर-संग्राम की योजना बना रहा है। ये सब संघर्ष तथा युद्घ तभी रोके जा सकते हैं, जब सारा नृवंश एक संस्कृति के अधीन हो इसीलिये मैंने अपनी वह रक्ष-संस्कृति प्रतिष्ठित की है।’

हालांकि अब रक्षो का चित्रण नर रूप मे नही बल्कि कुछ विचित्र, कुरुप और दुर्दान्त प्राणियो के रूप मे होता है, जिसका कोइ वैज्ञानिक प्रमाण नही मिलता है| इस मिथ्या प्रचार मे बुद्धु-बक्से (टेलीविजन) ने कुछ ज्यादा ही भूमिका निभाइ है|

इस पुस्तक के अनुसार रावण ने उत्तर भारत में अपने दो सैन्य सन्निवेश स्थापित किये पहला दण्डकारण्य (वर्तमान मे नासिक) में और दूसरा नैमिषारण्य। दण्डकारण्य का राज्य अपनी बहिन सूर्पनखा को दिया। उसे वहां अपने मौसी के बेटे खर और सेनानायक दूषण को चौदह हजार सुभट राक्षस देकर उसके साथ भेज दिया। दण्डकारण्य में राक्षसों का एक प्रकार से अच्छी तरह प्रवेश हो गया तथा भारत का दक्षिण तट भी उसके लिए सुरक्षित हो गया। लंका में कुबेर को भगा देने के बाद बहुत सारे यक्ष यक्षणी वहीं रूक गये थे। ताड़का भी एक यक्षणी थी। उसने रक्ष संस्कृति स्वीकार कर ली। उसने रावण से कहा,

‘हे रक्षराज, आप अनुमति दें तो मैं आपकी योजनापूर्ति में सहायता करूं। आप मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनिए। मेरा पिता सुकेतु यक्ष महाप्रतापी था। भरतखण्ड में- नैमिषारण्य में उसका राज्य था। उसने मुझे सब शस्त्र-शास्त्रों की पुरूषोचित शिक्षा दी थी और मेंरा विवाह धर्मात्मा जम्भ के पुत्र सुन्द से कर दिया था जिसे उस पाखण्डी ऋषि अगस्त्य ने मार डाला। अब उस वैर को हृदय में रख मैं अपने पुत्र को ले जी रही हूं। जो सत्य ही आप आर्यावर्त पर अभियान करना चाहते हैं, तो मुझे और मेरे पुत्र मारीच को कुछ राक्षस सुभट देकर नैमिषारण्य में भेज दीजिए, जिससे समय आने पर हम आपकी सेवा कर सकें। वहां हमारे इष्ट-मित्र, सम्बन्धी-सहायक बहुत हैं, जो सभी राक्षस -धर्म स्वीकार कर लेंगे।’

रावण ने, ताड़का की यह बात मान ली। उसे राक्षस भटों का एक अच्छा दल दिया जिसका सेनानायक उसी के पुत्र मारीच को बनाया तथा सुबाहु राक्षस को उसका साथी बनाकर नैमिषारण्य में भेज दिया।

विश्वविजय की महात्वाकांक्षा भी पुराकाल से मनुष्यो मे रही है| नेपोलियन्, हिटलर इत्यादि कुछ उदाहरण है| परन्तु प्राचीन भारत से ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते है जिसमे विश्वविजय के लिये समुद्र-यात्रा की गयी हो| आर्य संस्कृति के अनेको पुरोधाओ का सोचना था कि समुद्र अगम्य है| परन्तु रावण की महात्वाकांक्षा को समुद्र भी नही रोक सका|

Popularity: 7%

Categories