July 14th, 2009 in History | 8 Comments »
जैसा कि मैने पहले भी बताया है कि युग व्यवस्था बहुत ही भ्रामक है और अलग अलग विद्वानों ने इसकी व्याख्या अपने तरीके से की है| (पढ़ें- युग-युग की बातें (भारतीय युग सिद्धान्त))इस लेख का उद्देश्य भारतीय युग व्यवस्था पर एक सकारात्मक चर्चा कर उसकी प्रामाणिकता की खोज करनी है| मैं यहाँ पर अपनी कोई व्याख्या न देकर केवल उन विद्वानों की व्याख्या दे रहा हूँ| यह चर्चा पहले भी की जा चुकी है|(पढ़ें- भारतीय युग सिद्धान्त – Indian Yuga Theory: Some Ideas ) आज इसी कड़ी में प्रस्तुत है श्री युक्तेश्वर गिरि के विचार|
श्री युक्तेश्वर गिरि – 1 युग चक्र = 12000 वर्ष
परमहंस योगानन्द के गुरु श्री युक्तेश्वर गिरि के अनुसार हमारा पारम्परिक दृष्टिकोण ज्योतिषियो और खगोलशास्त्रियो के द्वारा किये गये गलत गणनाओ पर आधारित है। अपनी पुस्तक The Holy Science मे वह प्रत्येक युग चक्र को संधिकाल के साथ 12000 वर्षो का बताते हैं। प्रत्येक संधिकाल मुख्य काल का 10% होता है तथा आरम्भ एवं अन्त दोनो मे होता है। उदाहरण के लिये, कलियुग 1000 वर्षो का तथा इसकी 100 वर्षो की दो संधियां, इस प्रकार कुल 1200 वर्षो का होता है। इसी प्रकार द्वापरयुग 2000 वर्षो का तथा इसकी 200 वर्षो की दो संधियां, इस प्रकार कुल 2400 वर्षो का होता है। त्रेतायुग 3600 वर्षो (संधियों सहित) का तथा सत्ययुग 4800 वर्षो (संधियों सहित) का होता है। इस प्रकार कुल 12000 वर्षो का युग चक्र हुआ। श्री युक्तेश्वर गिरि के अनुसार यह युग चक्र भी जोड़ियो मे आते है। पहले अवरोही युगो मे सत्ययुग से त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग, फिर आरोही युगो मे कलियुग से द्वापरयुग, त्रेतायुग, तथा सत्ययुग का आगमन होगा। इन आरोही युगो और अवरोही युगो की संधि 499AD मे हुयी थी। कलियुग का आरोहण सितम्बर 499AD मे आरम्भ हुआ। इस गणना के अनुसार हम सितम्बर 1699AD से द्वापरयुग के आरोहण मे है।
श्री युक्तेश्वर के अनुसार कोई भी विद्वान अवरोही कलियुग के आरम्भ की बुरी घोषणा नही करना चाहता था, अतः वह द्वापर को ही बढ़ाते गये। जैसे ही कलियुग का आरोहण शुरु हुआ, तब उन्हे लगा की काल गणना मे उनसे गलती हो गयी है। समाधान के लिये उन्होने एक नयी व्यवस्था की। कलियुग को 1200 वास्तविक वर्षो के बजाय 1200 दिव्य वर्षो का बताया। प्रत्येक दिव्य वर्ष मे 12 दिव्य महीने और प्रत्येक दिव्य महीना 30 दिव्य दिवसो का होता है। एक दिव्य दिवस पृथ्वी के एक वास्तविक (सौर) वर्ष के बराबर होता है। तो इस प्रकार कलियुग 1200x12x30=432000 वर्षो का हुआ।
श्री युक्तेश्वर बताते है कि जिस प्रकार दिन-रात्रि का चक्र एक celestial गति (पृ्थ्वी का अपने अक्ष पर घूमना) के कारण होता है और मौसमो का चक्र भी एक celestial गति ( पृ्थ्वी का सूर्य के चारो ओर घूमना ) के कारण् होता है, उसी प्रकार युग चक्र भी एक celestial गति के कारण होता है। यह celestial गति हमारे सौर-मण्डल के किसी अन्य बिन्दु के चारो ओर घूमने के कारण होती है। इस मूल-बिन्दु को उन्होने “विष्णुनाभि” कहा है।
परन्तु 12000 वर्षो के चक्र के लिये यह बिन्दु अन्तरिक्ष मे कहां है?
डेविड फ्राले, जो कि एक खगोलशास्त्री और वैदिक परम्परा के बहुत से पुस्तको के लेखक है, भी समान व्याख्या प्रस्तुत करते है। इनकी व्याख्या मनु-संहिता पर आधारित है, जिसमे बहुत छोटे, 2400 वर्षो का युग चक्र बताया गया है। मनु का युग चक्र लगभग उसी लम्बाई का है जैसा कि खगोलशास्त्री Precession of the Equinoxes के लिये बताते है। Precession of the Equinoxes का समय 2580 वर्ष माना जाता है। उनका कहना है कि छोटे युग चक्र के द्वारा हम रामायण और महाभारत तथा अन्य ऎतिहासिक तथ्यो के समय को दूसरे तरीको से बेहतर तरीके से निकाल सकते है। अन्य तरीको से इन घटनाओ का समय लाखो वर्ष पहले निकलता है जो कि धरती पर मानव इतिहास के परिप्रेक्ष्य मे अस्वीकार करने योग्य है।
Proposal of Sri Yukteshwar—
| Ascending Dwapara Yuga proper |
1900 – 3900 AD |
| Satya subyuga |
3100 – 3900 AD |
| Treta subyuga |
2500 – 3100 AD |
| Dwapara subyuga |
2100 – 2500 AD |
| Kali subyuga |
1900 – 2100 AD |
| Dwapara Yuga sandhi |
1700 – 1900 AD |
| Kali Yuga sandhi |
1600 – 1700 AD |
| Ascending Kali Yuga proper |
600 – 1600 AD |
| Satya subyuga |
1200 – 1600 AD |
| Treta subyuga |
900 – 1200 AD |
| Dwapara subyuga |
700 - 900 AD |
| Kali subyuga |
600 - 700 AD |
| Ascending Kali Yuga sandhi |
500 - 600 AD |
| Descending Kali Yuga sandhi |
400 - 500 AD |
| Descending Kali Yuga proper |
600 BCE - 400 AD |
| Kali subyuga |
300 – 400 AD |
| Dwapara subyuga |
100 - 300 AD |
| Treta subyuga |
200 BCE – 100 AD |
| Satya subyuga |
600 – 200 BCE |
| Kali Yuga sandhi |
700 - 600 BCE |
| Dwapara Yuga sandhi |
900 – 700 BCE |
| Descending Dwapara Yuga proper |
2900 – 900 BCE |
| Kali subyuga |
1100 – 900 BCE |
| Dwapara subyuga |
1500 – 1100 BCE |
| Treta subyuga |
2100 – 1500 AD |
| Satya subyuga |
2900 – 2100 BCE |
| Dwapara Yuga sandhi |
3100 – 2900 BCE |
| Treta Yuga sandhi |
3400 – 3100 BCE |
| Descending Treta Yuga proper |
6400 – 3400 BCE |
| Kali subyuga |
3700 – 3400 BCE |
| Dwapara subyuga |
4300 – 3700 BCE |
| Treta subyuga |
5200 – 4300 AD |
| Satya subyuga |
6400 – 5200 BCE |
| Treta Yuga sandhi |
6700 – 6400 BCE |
| Satya Yuga sandhi |
7100 – 6700 BCE |
| Descending Satya Yuga proper |
11,100 – 7100 BCE |
| Kali subyuga |
7500 – 7100 BCE |
| Dwapara subyuga |
8300 – 7500 BCE |
| Treta subyuga |
9500 – 8300 BCE |
| Satya subyuga |
11,100 – 9500 BCE |
[ref: Sri Yukteswar, Swami (1949). The Holy Science. Yogoda Satsanga Society of India.]
Popularity: 6%